गर्मियों या तेज धूप वाले मौसम में बाहर निकलने के बाद त्वचा का थोड़ा सांवला पड़ना या हल्की लालिमा नजर आना आम बात है। इसे अक्सर लोग सामान्य टैनिंग या गर्मी का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अगर धूप में कुछ समय बिताने के बाद त्वचा पर खुजली, छोटे-छोटे दाने, लाल चकत्ते या जलन जैसी समस्या बार-बार होने लगे, तो मामला सिर्फ टैनिंग का नहीं भी हो सकता है।
कुछ लोगों की त्वचा सूर्य की पराबैंगनी यानी अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। ऐसे मामलों में सूरज की रोशनी के संपर्क में आने के बाद त्वचा पर एक खास तरह की प्रतिक्रिया हो सकती है, जिसे पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (Polymorphous Light Eruption) यानी PMLE कहा जाता है। यह सूर्य की रोशनी से होने वाली आम फोटोसेंसिटिविटी समस्याओं में से एक है।
खास बात यह है कि इस स्थिति में परेशानी हमेशा धूप में निकलते ही दिखाई नहीं देती। कई बार सूर्य की किरणों के संपर्क में आने के कुछ घंटों बाद या अगले दिन त्वचा पर इसके लक्षण उभरते हैं। इसलिए लोग अक्सर इसके कारण को समझ नहीं पाते और इसे सामान्य एलर्जी, पसीने या गर्मी से होने वाले रैश से जोड़ देते हैं।
हर लालिमा टैनिंग नहीं होती
धूप में ज्यादा समय रहने पर त्वचा का रंग गहरा होना सामान्य प्रक्रिया हो सकती है। शरीर सूर्य की UV किरणों से बचाव के लिए मेलेनिन का उत्पादन बढ़ाता है, जिससे त्वचा टैन दिखाई दे सकती है। लेकिन PMLE में समस्या केवल त्वचा के रंग में बदलाव तक सीमित नहीं रहती।
इस स्थिति में धूप के संपर्क में आने के बाद त्वचा पर उभरे हुए छोटे दाने, खुजली, लाल पैच या कभी-कभी छाले भी दिखाई दे सकते हैं। प्रभावित हिस्से में इतनी खुजली हो सकती है कि व्यक्ति बार-बार त्वचा को खुजलाने लगे। इससे त्वचा पर जलन और परेशानी और बढ़ सकती है।
PMLE को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह संक्रमण नहीं है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की सूर्य की UV किरणों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया से जुड़ी स्थिति है।
आखिर क्यों होती है PMLE?
जब सूर्य की UV किरणें त्वचा तक पहुंचती हैं, तो त्वचा में मौजूद कुछ अणुओं में बदलाव हो सकता है। सामान्य परिस्थितियों में शरीर इस बदलाव को लेकर कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं करता। लेकिन कुछ लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली इन बदले हुए अणुओं को नुकसानदायक मान लेती है।
इसके बाद शरीर की इम्यून सिस्टम प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है और परिणामस्वरूप त्वचा पर सूजन तथा अलग-अलग प्रकार के रैश दिखाई दे सकते हैं। इसी वजह से इसे फोटोएलर्जिक या फोटोसेंसिटिविटी से जुड़ी समस्या के तौर पर देखा जाता है।
हर व्यक्ति में इसका रूप एक जैसा नहीं होता। किसी के शरीर पर केवल लाल दाने दिखाई दे सकते हैं, तो किसी को एक्जिमा जैसे पैच, पित्ती या छोटे छाले भी हो सकते हैं। यही वजह है कि इसके नाम में ‘पॉलीमॉर्फस’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है, जिसका अर्थ है कि इसके रैश अलग-अलग रूपों में नजर आ सकते हैं।
किन हिस्सों पर नजर आते हैं निशान?
PMLE के कारण होने वाले रैश आम तौर पर शरीर के उन हिस्सों पर ज्यादा दिखाई देते हैं जो लंबे समय तक ढके नहीं रहते और सीधे सूर्य के संपर्क में आते हैं। इनमें हाथों की बाहें, गर्दन, छाती, पीठ और पैरों के खुले हिस्से शामिल हो सकते हैं।
अगर किसी व्यक्ति की त्वचा कई महीनों तक धूप से कम संपर्क में रही हो और अचानक तेज धूप में अधिक समय बिताना पड़े, तो ऐसे समय में भी समस्या उभर सकती है। इसलिए मौसम बदलने के साथ या छुट्टियों के दौरान ज्यादा समय बाहर बिताने पर कुछ लोगों को इसके लक्षण महसूस हो सकते हैं।
इन संकेतों को पहचानना जरूरी
अगर धूप में रहने के बाद आपकी त्वचा पर बार-बार निम्न समस्याएं दिखाई देती हैं, तो इसे सामान्य टैनिंग मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए:
- त्वचा पर छोटे और उभरे हुए दाने निकलना।
- प्रभावित जगह पर तेज या लगातार खुजली होना।
- लाल या हल्के रंग के चकत्ते दिखाई देना।
- त्वचा पर पित्ती जैसी उभरी हुई संरचना बनना।
- एक्जिमा की तरह सूखे या पैची हिस्से नजर आना।
- कुछ मामलों में छोटे-छोटे छाले बन जाना।
- रैश के आसपास लालिमा और जलन बढ़ना।
इन लक्षणों की तीव्रता हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। कुछ लोगों में रैश हल्के होते हैं और थोड़े समय बाद कम हो जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में खुजली और त्वचा की जलन काफी परेशान कर सकती है।
किसे ज्यादा हो सकती है परेशानी?
PMLE किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन कुछ लोगों में इसका जोखिम अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। खास तौर पर वे लोग जिनकी त्वचा सूर्य की रोशनी के प्रति संवेदनशील होती है, उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए।
युवा महिलाओं में भी यह समस्या अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिल सकती है। विशेष रूप से 20 से 40 वर्ष की उम्र के बीच की ऐसी महिलाओं में इसका खतरा अधिक बताया जाता है जिनकी पहले से धूप के प्रति संवेदनशील त्वचा की हिस्ट्री रही हो।
हालांकि केवल उम्र या लिंग के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति को PMLE होगी या नहीं। अगर हर बार धूप के संपर्क में आने के बाद त्वचा पर असामान्य रिएक्शन होता है, तो इसके कारण की सही पहचान के लिए विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
दिन के किस समय ज्यादा सावधानी जरूरी?
सूर्य की UV किरणों की तीव्रता दिन के अलग-अलग समय में अलग हो सकती है। आम तौर पर दिन के मध्य में सूर्य की किरणें ज्यादा तेज होती हैं। इसलिए तेज धूप के दौरान लंबे समय तक खुले में रहने से बचना त्वचा के लिए मददगार हो सकता है।
विशेष रूप से सुबह करीब 11 बजे से दोपहर बाद 3 बजे के बीच धूप की तीव्रता अधिक हो सकती है। इस दौरान अगर किसी व्यक्ति को पहले भी सूर्य की रोशनी से रैश की समस्या रही है, तो उसे अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
हालांकि केवल समय बदलने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। UV किरणों से बचाव के लिए कपड़ों, छांव और सनस्क्रीन जैसे उपायों को भी दिनचर्या में शामिल करना जरूरी है।
बचाव में सनस्क्रीन की भूमिका
PMLE की समस्या वाले लोगों के लिए सूर्य की UV किरणों से त्वचा को बचाना सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। बाहर निकलने से पहले हाई-SPF और ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन UVA और UVB दोनों तरह की UV किरणों से सुरक्षा देने के लिए बनाई जाती हैं।
सनस्क्रीन लगाने के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर इसे दोबारा लगाने की जरूरत भी हो सकती है, खासकर अगर व्यक्ति लंबे समय तक बाहर रह रहा हो, पसीना आ रहा हो या त्वचा पानी के संपर्क में आ रही हो।
लेकिन केवल सनस्क्रीन को ही सुरक्षा का एकमात्र तरीका नहीं मानना चाहिए। तेज धूप में छांव में रहना और शरीर को कपड़ों से ढकना भी महत्वपूर्ण है।
कपड़ों से करें त्वचा की सुरक्षा
अगर आपकी त्वचा धूप के प्रति संवेदनशील है, तो बाहर जाते समय फुल स्लीव कपड़े पहनना उपयोगी हो सकता है। ऐसे कपड़े शरीर के उन हिस्सों को सीधे UV किरणों के संपर्क में आने से बचाते हैं जहां बार-बार रैश निकलते हैं।
धूप से बचने के लिए टोपी, छाता या अन्य शारीरिक सुरक्षा उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। जितना संभव हो, तेज धूप में सीधे संपर्क का समय कम करना भी फायदेमंद हो सकता है।
क्या PMLE अपने आप ठीक हो सकती है?
कई मामलों में PMLE के कारण होने वाले रैश कुछ समय बाद अपने आप कम हो जाते हैं, खासकर जब व्यक्ति सूर्य के संपर्क से बचता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार होने वाली त्वचा की समस्या को बिना जांच के PMLE मान लिया जाए।
बार-बार होने वाले रैश के पीछे दूसरी त्वचा संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं। इसलिए अगर समस्या लगातार बनी रहती है, बार-बार वापस आती है या लक्षण गंभीर हैं, तो त्वचा विशेषज्ञ से जांच कराना बेहतर विकल्प है।
कुछ मामलों में डॉक्टर लक्षणों की गंभीरता के आधार पर उपचार की सलाह दे सकते हैं। वहीं कुछ लोगों में डॉक्टर की निगरानी में फोटोथेरेपी का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इसका उद्देश्य त्वचा को नियंत्रित तरीके से UV प्रकाश के संपर्क में लाकर उसकी सहनशीलता बढ़ाना होता है। इसे अपने स्तर पर प्राकृतिक या कृत्रिम UV लाइट के जरिए करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
कब डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें?
PMLE आमतौर पर गंभीर बीमारी नहीं मानी जाती, लेकिन हर तरह के रैश को PMLE समझना सही नहीं है। खास तौर पर अगर त्वचा पर रैश के साथ असामान्य या गंभीर लक्षण भी दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी हो जाता है।
यदि दानों या प्रभावित त्वचा में काफी दर्द हो, शरीर का तापमान बढ़ जाए यानी बुखार हो, रैश तेजी से फैल रहा हो या त्वचा की स्थिति सामान्य से ज्यादा खराब दिखाई दे रही हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसे लक्षण किसी दूसरी त्वचा संबंधी समस्या या अधिक गंभीर स्थिति की ओर संकेत कर सकते हैं।
इसी तरह अगर हर बार धूप में निकलने के बाद एक जैसी परेशानी हो रही है और यह आपकी रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित कर रही है, तो त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लेना समझदारी होगी।
टैनिंग और PMLE में अंतर समझें
सबसे जरूरी बात यह है कि धूप के संपर्क के बाद होने वाले हर बदलाव को सामान्य टैनिंग न समझें। अगर त्वचा केवल थोड़ी गहरी हो रही है तो यह टैनिंग हो सकती है, लेकिन इसके साथ खुजली, उभरे हुए दाने, लाल चकत्ते, जलन या छाले बार-बार बन रहे हैं, तो मामला अलग हो सकता है।
PMLE से बचाव का सबसे आसान तरीका UV एक्सपोजर को नियंत्रित करना है। तेज धूप में अनावश्यक रूप से बाहर रहने से बचें, त्वचा को कपड़ों से ढकें और उचित सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें। साथ ही त्वचा पर बार-बार होने वाले असामान्य रिएक्शन को नजरअंदाज करने के बजाय उसके कारण की पहचान कराना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इसलिए अगली बार धूप में निकलने के बाद अगर त्वचा सिर्फ टैन होने के बजाय लाल पड़ने लगे और उसमें खुजली या छोटे-छोटे दाने भी दिखाई दें, तो इसे सामान्य गर्मी का असर मानकर छोड़ने के बजाय ध्यान दें। समय पर सावधानी बरतने और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेने से समस्या को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।
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