कर्मचारी एक्ट रद होने और सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद सरकार सक्रिय, मुख्य सचिव ने पात्र कर्मचारियों का ब्योरा जुटाने के दिए निर्देश; वित्तीय बोझ का भी होगा आकलन
शिमला। हिमाचल प्रदेश में अनुबंध आधार पर नियुक्त होकर नियमित हुए कर्मचारियों के लिए वरिष्ठता और वित्तीय लाभ का रास्ता साफ होने के बाद राज्य सरकार ने इस दिशा में प्रशासनिक प्रक्रिया तेज कर दी है। कर्मचारी एक्ट को असंवैधानिक घोषित किए जाने और सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अब सरकार अदालत के आदेशों के अनुरूप लाभ देने की तैयारी में जुट गई है। इसके लिए सभी सरकारी विभागों से ऐसे कर्मचारियों का विस्तृत रिकॉर्ड मांगा गया है, जो अदालत के फैसले के तहत वरिष्ठता और वित्तीय लाभ पाने के पात्र हो सकते हैं।
सरकार फिलहाल इस स्थिति में नहीं है कि वह बता सके कि प्रदेश में कितने कर्मचारी इस फैसले से लाभान्वित होंगे। विभिन्न विभागों में अनुबंध आधार पर अलग-अलग समय और माध्यम से नियुक्तियां हुई थीं। इसके अलावा कर्मचारियों के अनुबंध सेवाकाल, नियमितीकरण की तारीख और नियुक्ति की प्रक्रिया में भी अंतर रहा है। ऐसे में सरकार पहले विभागवार आंकड़े एकत्र करेगी। इसके बाद पात्र कर्मचारियों की संख्या, उन्हें दिए जाने वाले लाभ और सरकारी खजाने पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय भार का आकलन किया जाएगा।
इस महत्वपूर्ण विषय पर मंगलवार को शिमला स्थित राज्य सचिवालय में मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत की अध्यक्षता में बैठक हुई। इसमें प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार, प्रधान सचिव कार्मिक एम. सुधा देवी सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। बैठक में अदालत के आदेशों के अनुपालन, कर्मचारियों की पात्रता निर्धारित करने और लाभ देने की प्रक्रिया को लेकर विस्तार से चर्चा की गई।
विभागों को नियुक्ति से लेकर नियमितीकरण तक का रिकॉर्ड तैयार करने के निर्देश
बैठक में मुख्य सचिव ने सभी विभागों को निर्देश दिए कि वे अपने यहां कार्यरत और पूर्व में अनुबंध आधार पर नियुक्त रहे प्रभावित कर्मचारियों का पूरा सेवा रिकॉर्ड तैयार करें। इसमें कर्मचारी की नियुक्ति किस माध्यम से हुई, उसने अनुबंध आधार पर कितने वर्ष सेवाएं दीं, उसे किस तारीख को नियमित किया गया और वर्तमान में उसकी सेवा स्थिति क्या है, इन सभी जानकारियों को शामिल करना होगा।
सरकार के लिए यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अलग-अलग नियुक्ति प्रक्रियाओं के माध्यम से भर्ती हुए कर्मचारियों की सेवा शर्तें एक जैसी नहीं रही हैं। कुछ कर्मचारियों की नियुक्ति राज्य चयन आयोग या लोक सेवा आयोग के माध्यम से हुई, जबकि कुछ की भर्ती साक्षात्कार और बैचवाइज प्रक्रिया के आधार पर की गई। वहीं, कुछ कर्मचारी ऐसे भी हैं, जो पहले अस्थायी या अन्य आधार पर नियुक्त हुए और बाद में निर्धारित कार्यकाल पूरा करने के बाद अनुबंध व्यवस्था में शामिल किए गए।
विभागों से रिकॉर्ड मिलने के बाद कार्मिक और वित्त विभाग संयुक्त रूप से पात्रता तथा वित्तीय देनदारियों का आकलन करेंगे। इसके आधार पर सरकार आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तैयार करेगी।
सभी विभागों में लाभ देने के लिए एक समान नीति बनाने की तैयारी
सरकार की कोशिश है कि अदालत के फैसले के तहत कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों की प्रक्रिया सभी विभागों में एक समान रहे। इसके लिए कार्मिक विभाग को सामान्य दिशा-निर्देश तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। इन दिशा-निर्देशों में पात्रता के मानदंड, सेवा अवधि की गणना और लाभ देने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाएगा।
बैठक में यह भी तय किया गया कि दिशा-निर्देश तैयार करने से पहले विधि विभाग से परामर्श लिया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारियों को लाभ देने की प्रक्रिया अदालत के आदेशों के अनुरूप हो और भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी अड़चन पैदा न हो।
सरकार इस मामले में जल्दबाजी के बजाय सभी पहलुओं की जांच करके निर्णय लेना चाहती है। विभागवार रिकॉर्ड में किसी प्रकार की विसंगति रहने पर कर्मचारियों की पात्रता और लाभों की गणना प्रभावित हो सकती है। इसलिए नियुक्ति और नियमितीकरण से संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन भी महत्वपूर्ण रहेगा।
अनुबंध कर्मचारियों को तीन श्रेणियों में बांटकर जुटाया जाएगा ब्योरा
बैठक में अनुबंध कर्मचारियों के अलग-अलग भर्ती माध्यमों को ध्यान में रखते हुए उन्हें तीन श्रेणियों में विभाजित कर रिकॉर्ड तैयार करने पर चर्चा हुई।
पहली श्रेणी में वे कर्मचारी शामिल होंगे, जिनकी नियुक्ति राज्य चयन आयोग और हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से हुई थी। दूसरी श्रेणी में साक्षात्कार और बैचवाइज आधार पर भर्ती किए गए कर्मचारी रखे जाएंगे। तीसरी श्रेणी में वे कर्मचारी शामिल होंगे, जो शुरुआत में अस्थायी या किसी अन्य माध्यम से नियुक्त हुए थे और बाद में निर्धारित कार्यकाल पूरा करने के बाद अनुबंध आधार पर सेवाएं देने लगे।
इन तीनों श्रेणियों का अलग-अलग रिकॉर्ड तैयार करने से सरकार को यह समझने में आसानी होगी कि किन कर्मचारियों पर अदालत के फैसले का प्रभाव पड़ेगा। साथ ही, नियुक्ति के अलग-अलग माध्यमों के कारण पात्रता तय करने में आने वाली संभावित जटिलताओं को भी दूर किया जा सकेगा।
2003 से शुरू हुई थी अनुबंध आधार पर भर्ती की व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2003 के बाद सरकारी विभागों में अनुबंध आधार पर भर्तियों की व्यवस्था शुरू हुई थी। इसके बाद समय-समय पर अनुबंध नीति में बदलाव किए जाते रहे। शुरुआत में अनुबंध कर्मचारियों को नियमित होने के लिए आठ वर्ष तक सेवाएं देनी पड़ती थीं। बाद में इस अवधि को घटाकर दो वर्ष कर दिया गया।
अनुबंध से नियमित होने की अवधि में हुए बदलाव के कारण अलग-अलग वर्षों में नियुक्त कर्मचारियों के सेवा लाभों को लेकर विवाद पैदा होते रहे। कर्मचारियों की मांग रही है कि उनकी वरिष्ठता और वित्तीय लाभ की गणना नियुक्ति की वास्तविक तिथि और अनुबंध सेवाकाल के आधार पर की जाए। उनका तर्क रहा है कि नियमितीकरण से पहले दी गई सेवाओं को नजरअंदाज करने से उन्हें वरिष्ठता और आर्थिक लाभ के मामले में नुकसान उठाना पड़ता है।
इसी मुद्दे को लेकर कर्मचारियों और राज्य सरकार के बीच कानूनी विवाद शुरू हुआ। मामला विभिन्न अदालतों तक पहुंचा और अंततः सरकार ने वित्तीय देनदारियों को सीमित रखने के उद्देश्य से कानून बनाने का रास्ता अपनाया।
2024 में सरकार ने विधानसभा से पारित करवाया था कर्मचारी एक्ट
राज्य सरकार ने वित्तीय देनदारियों और अनुबंध कर्मचारियों के सेवा लाभों से जुड़े विवादों को नियंत्रित करने के लिए हिमाचल प्रदेश रिक्रूटमेंट एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ गवर्नमेंट एम्प्लाइज एक्ट, 2024 विधानसभा से पारित करवाया था।
इस कानून में प्रावधान किया गया था कि अनुबंध कर्मचारियों पर नियमित नियुक्ति से संबंधित प्रावधान लागू नहीं होंगे। सरकार ने इस एक्ट को पिछली तारीख से प्रभावी किया था। इसका उद्देश्य अनुबंध सेवाकाल को नियमित सेवा के लाभों की गणना में शामिल किए जाने से रोकना था।
हालांकि, कर्मचारियों ने इस कानून को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि इस कानून के माध्यम से उनके पहले से अर्जित सेवा संबंधी अधिकारों और वित्तीय लाभों को प्रभावित किया जा रहा है। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 25 अप्रैल को इस एक्ट को असंवैधानिक करार दे दिया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया। सरकार की ओर से विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई को इसे खारिज कर दिया। इस तरह हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहा।
सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने पर पुनर्विचार याचिका भी खारिज
सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी खारिज होने के बाद राज्य सरकार ने फैसले पर पुनर्विचार के लिए याचिका दायर की थी। सरकार को उम्मीद थी कि पुनर्विचार के माध्यम से अदालत के आदेश में राहत मिल सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को भी खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने वित्तीय लाभों के भुगतान के लिए चार महीने का समय दिया था। पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद अब सरकार के सामने अदालत के आदेशों के अनुरूप आगे बढ़ने का विकल्प रह गया है। इसी के तहत मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बैठक बुलाकर सभी विभागों से पात्र कर्मचारियों का रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
अब कर्मचारियों की संख्या और वित्तीय भार का इंतजार
सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि अदालत के फैसले से वास्तव में कितने कर्मचारी लाभान्वित होंगे और उन्हें वरिष्ठता तथा वित्तीय लाभ देने पर सरकारी खजाने पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। चूंकि अनुबंध नियुक्तियों का सिलसिला वर्ष 2003 से शुरू हुआ था और विभिन्न विभागों में अलग-अलग समय पर भर्तियां हुई थीं, इसलिए पात्र कर्मचारियों की संख्या काफी महत्वपूर्ण होगी।
विभागों से पूरा ब्योरा मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने कर्मचारियों की वरिष्ठता दोबारा निर्धारित करनी होगी और वित्तीय लाभों की गणना किस आधार पर की जाएगी। इसके साथ ही कार्मिक विभाग की ओर से जारी किए जाने वाले दिशा-निर्देश इस पूरी प्रक्रिया का आधार बनेंगे।
कर्मचारी संगठनों की नजर भी अब सरकार के अगले कदम पर है। लंबे समय से अनुबंध सेवाकाल को वरिष्ठता और वित्तीय लाभों में शामिल करने की मांग कर रहे कर्मचारियों को उम्मीद है कि अदालत के फैसले के बाद उन्हें राहत मिलेगी। वहीं, सरकार के लिए कानूनी अनुपालना के साथ वित्तीय प्रबंधन बनाए रखना भी अहम होगा।
फिलहाल विभागों से रिकॉर्ड जुटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद अब सबकी निगाहें सरकार की अगली कार्ययोजना पर टिकी हैं। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रदेश के उन कर्मचारियों की वास्तविक संख्या सामने आएगी, जिन्हें इस फैसले का लाभ मिल सकता है।




