शिमला: हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति से संबंधित कानून को हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इस निर्णय को प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार ऐसे कानून बनाने में जल्दबाजी कर रही है, जो न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
जयराम ठाकुर ने शिमला से जारी बयान में कहा कि विधानसभा में बहुमत के आधार पर कानून पारित कर देना सरकार के लिए संभव है, लेकिन कोई भी कानून संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार बार-बार ऐसे प्रावधान लेकर आ रही है, जिन्हें अदालत में चुनौती मिलने के बाद निरस्त कर दिया जाता है। उनके मुताबिक, इससे सरकार की कानूनी तैयारी और विधायी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि विपक्ष विधानसभा के भीतर कई बार सरकार को आगाह करता रहा है कि ऐसे कानून नहीं बनाए जाने चाहिए, जो संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक समीक्षा की कसौटी पर टिक न पाएं। इसके बावजूद सरकार ने विपक्ष की आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले के बाद अब सरकार को आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आखिर कानून बनाने की प्रक्रिया में लगातार ऐसी खामियां क्यों रह रही हैं।
जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री पर भी निशाना साधते हुए कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं को कानून का जानकार बताते हैं, लेकिन उनकी सरकार द्वारा विधानसभा में पारित किए जा रहे कई कानून अदालत में टिक नहीं पा रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत विश्वविद्यालय से की थी और शायद इसी कारण वह विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि बनाए गए कानून संविधान और मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप हों। उन्होंने कहा कि यदि कोई कानून शुरू से ही संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है तो उसे विधानसभा में बहुमत के बल पर पारित करना समाधान नहीं हो सकता।
कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति से जुड़े मामले का उल्लेख करते हुए जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार ने जिस प्रकार विश्वविद्यालय की नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, उस पर न्यायालय का फैसला महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और नियुक्तियों की निर्धारित प्रक्रिया को राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप से प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय का फैसला सरकार के लिए एक संदेश है कि विधायी शक्तियों का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर ही किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि भविष्य में किसी भी कानून का मसौदा तैयार करते समय उसके संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की गंभीरता से जांच की जाए।
जयराम ठाकुर ने इस मामले को सरकार की कथित गलत कानूनी प्रक्रिया की अकेली घटना नहीं बताया। उन्होंने पूर्व विधायकों की पेंशन से जुड़े कानून का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि सरकार ने पूर्व विधायकों की पेंशन समाप्त करने के लिए कानून बनाया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने अवैध करार दिया।
उन्होंने कहा कि यह घटनाक्रम भी बताता है कि सरकार द्वारा तैयार किए जा रहे कानूनों को अदालत की संभावित समीक्षा के संदर्भ में पर्याप्त तरीके से नहीं परखा जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष के मुताबिक, विधानसभा में विपक्ष की ओर से समय-समय पर सरकार को इस तरह के कदमों के संभावित कानूनी परिणामों को लेकर चेताया जाता रहा है।
उन्होंने कर्मचारियों के प्रमोशन के अधिकार से जुड़े मामले का भी जिक्र किया। जयराम ठाकुर के अनुसार, कर्मचारियों के पदोन्नति संबंधी अधिकारों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया था, लेकिन न्यायालय ने सरकार के इस कदम को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के सेवा अधिकारों से जुड़े मामलों में भी सरकार को कानून बनाने से पहले मौजूदा संवैधानिक और न्यायिक प्रावधानों का ध्यान रखना चाहिए।
पंचायत चुनावों से जुड़े मामलों को लेकर भी जयराम ठाकुर ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि पंचायत चुनावों के संबंध में सरकार को न्यायालय से लगातार प्रतिकूल फैसलों का सामना करना पड़ा है। उनका कहना है कि इन घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में देखने के बजाय सरकार को अपनी विधायी और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान सभी संस्थाओं के लिए सर्वोच्च है और विधानसभा में बहुमत रखने वाली सरकार भी संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाकर कानून नहीं बना सकती।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहुमत सरकार को कानून पारित करने की शक्ति देता है, लेकिन न्यायपालिका के पास यह जांचने का अधिकार है कि वह कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि कोई कानून संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है। इसलिए सरकार को विधायी प्रक्रिया में संवैधानिक मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए।
जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार को विपक्ष की आपत्तियों को राजनीतिक विरोध मानकर नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। यदि विपक्ष किसी प्रस्तावित कानून के संवैधानिक पहलुओं पर सवाल उठाता है तो सरकार को विशेषज्ञों से कानूनी राय लेकर उसकी समीक्षा करनी चाहिए। इससे विधानसभा में कानून पारित होने के बाद अदालत में उसके निरस्त होने की स्थिति से बचा जा सकता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार खुद को कानून और संविधान का जानकार बताती है, लेकिन व्यवहार में उसके फैसले बार-बार न्यायिक जांच के दायरे में आ रहे हैं। उनके मुताबिक, इससे न केवल सरकार की किरकिरी होती है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी अनावश्यक दबाव पड़ता है और सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल मुकदमों में होता है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अदालत से किसी कानून के रद्द होने का सीधा असर उन लोगों पर भी पड़ सकता है, जिनके लिए सरकार ने वह कानून बनाया था। ऐसे में कानून बनाते समय जल्दबाजी के बजाय व्यापक विचार-विमर्श जरूरी है।
जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री और सरकार से आग्रह किया कि वे अदालत के फैसलों को राजनीतिक हार या जीत के नजरिए से देखने के बजाय उन्हें संवैधानिक व्यवस्था के हिस्से के रूप में स्वीकार करें। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका द्वारा किसी कानून को निरस्त किया जाना इस बात का संकेत है कि कानून की वैधानिकता पर पर्याप्त विचार करने की आवश्यकता थी।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार को अब तक के ऐसे मामलों से सीख लेते हुए अपनी कानूनी और विधायी प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए। कानून का मसौदा तैयार करने से पहले संवैधानिक विशेषज्ञों की राय, मौजूदा न्यायिक फैसलों और संबंधित कानूनों के प्रावधानों का अध्ययन किया जाना चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की जनता सरकार से प्रभावी प्रशासन की उम्मीद करती है। यदि सरकार बार-बार ऐसे कानून बनाएगी जिन्हें अदालत में चुनौती मिलेगी और बाद में उन्हें निरस्त किया जाएगा, तो इससे प्रशासनिक निर्णयों में अनिश्चितता पैदा होगी। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी स्थिति से बचने के लिए अधिक जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ काम करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों और अन्य संवैधानिक या वैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को बनाए रखना आवश्यक है। नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों में नियमों तथा स्थापित प्रक्रियाओं का पालन होना चाहिए। सरकार को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि संस्थागत स्वतंत्रता किसी भी राजनीतिक सरकार की सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण है।
जयराम ठाकुर के बयान से स्पष्ट है कि कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति से जुड़े कानून को हाईकोर्ट द्वारा रद्द किए जाने का मामला अब राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। विपक्ष इसे सरकार की विधायी प्रक्रिया की कमजोरी के उदाहरण के रूप में पेश कर रहा है और पहले के कई न्यायिक मामलों को जोड़कर सरकार पर दबाव बना रहा है।
फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम के बाद राज्य की राजनीति में कानून और संविधान की मर्यादा को लेकर बहस तेज होने की संभावना है। जयराम ठाकुर ने जहां सरकार पर लगातार संवैधानिक कसौटी पर विफल होने वाले कानून बनाने का आरोप लगाया है, वहीं उनका जोर इस बात पर है कि विधानसभा का बहुमत संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने सरकार से भविष्य में कानून बनाते समय संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक समीक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की मांग की है।




