चंडीगढ़ में हाई मस्ट स्ट्रीट लाइट घोटाले का आरोप, घटिया पोलों पर लाखों का भुगतान; जांच की उठी मांग

चंडीगढ़ में हाई मस्ट स्ट्रीट लाइट घोटाले का आरोप, घटिया पोलों पर लाखों का भुगतान; जांच की उठी मांग

चंडीगढ़ नगर निगम में हाई मस्ट स्ट्रीट लाइट पोल की खरीद और स्थापना को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए हाई मस्ट पोलों की गुणवत्ता, खरीद प्रक्रिया और भुगतान से जुड़े मामलों को लेकर अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद यह विषय प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन गया है। आरोपों में दावा किया जा रहा है कि कुछ परियोजनाओं में उपयोग किए गए पोलों की वास्तविक गुणवत्ता और भुगतान की गई राशि के बीच बड़ा अंतर है, जिससे नगर निगम को आर्थिक नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।

हालांकि इस मामले में अभी तक किसी सक्षम जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है और आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। इसके बावजूद विभिन्न सामाजिक संगठनों, स्थानीय नागरिकों और विपक्षी दलों ने पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच कराने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि यदि सरकारी धन से किए गए किसी भी सार्वजनिक कार्य में गुणवत्ता से समझौता हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

नगर निगम द्वारा शहर में बेहतर रोशनी, सड़क सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से कई स्थानों पर हाई मस्ट लाइटिंग सिस्टम स्थापित किए गए थे। लेकिन अब इन्हीं परियोजनाओं की गुणवत्ता और लागत को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

किन स्थानों पर लगाए गए हैं हाई मस्ट पोल?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार नगर निगम के इंजीनियरिंग विभाग के इलेक्ट्रिकल विंग की निगरानी में शहर के कई प्रमुख स्थानों पर हाई मस्ट स्ट्रीट लाइट पोल लगाए गए। इनमें सेक्टर-34, सेक्टर-35 के स्लो कैरिज-वे, नाइट फूड स्ट्रीट, सेक्टर-48 स्थित ओपन एयर थिएटर सहित अन्य सार्वजनिक स्थल शामिल बताए जा रहे हैं।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य रात के समय बेहतर प्रकाश व्यवस्था उपलब्ध कराना, सड़क सुरक्षा बढ़ाना और सार्वजनिक स्थानों को अधिक सुरक्षित बनाना था। हाई मस्ट लाइटिंग सिस्टम सामान्य स्ट्रीट लाइटों की तुलना में बड़े क्षेत्र को रोशन करने में सक्षम माना जाता है और इसका उपयोग व्यस्त चौराहों, पार्किंग क्षेत्रों, खेल परिसरों और खुले सार्वजनिक स्थलों पर किया जाता है।

खरीद लागत और भुगतान को लेकर उठे सवाल

आरोप है कि जिन हाई मस्ट पोलों की बाजार में अनुमानित कीमत लगभग 40 हजार से 50 हजार रुपये के बीच बताई जा रही है, उनके लिए नगर निगम द्वारा कहीं अधिक राशि का भुगतान किया गया। कुछ मामलों में प्रति पोल लगभग 1.80 लाख रुपये तक के बिल लगाए जाने की चर्चा सामने आई है।

इन दावों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या खरीद प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धी निविदा, तकनीकी मूल्यांकन और लागत का उचित आकलन किया गया था। हालांकि वास्तविक भुगतान, अनुबंध की शर्तें और तकनीकी विनिर्देशों की पुष्टि केवल आधिकारिक दस्तावेजों और जांच के बाद ही संभव होगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी खरीद में केवल उत्पाद की कीमत ही नहीं बल्कि स्थापना, फाउंडेशन, वायरिंग, कंट्रोल सिस्टम, ट्रांसपोर्टेशन, वारंटी और अन्य तकनीकी कार्य भी लागत का हिस्सा होते हैं। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

गुणवत्ता पर भी उठ रहे हैं सवाल

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ स्थानों पर लगाए गए हाई मस्ट पोल अपेक्षाकृत हल्के हैं और उनमें प्रयुक्त धातु की मोटाई निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है। कुछ नागरिकों ने यह भी दावा किया है कि कई पोलों पर स्थापना के कुछ समय बाद ही जंग के निशान दिखाई देने लगे हैं।

यदि किसी सार्वजनिक परियोजना में उपयोग की गई सामग्री गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरती है, तो उसका सीधा प्रभाव परियोजना की आयु, रखरखाव लागत और सार्वजनिक सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसी कारण तकनीकी विशेषज्ञ निष्पक्ष परीक्षण की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं।

हालांकि अभी तक किसी अधिकृत तकनीकी संस्थान द्वारा इन पोलों की गुणवत्ता पर अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

हाई मस्ट पोल में कौन-कौन से उपकरण होते हैं?

हाई मस्ट लाइटिंग सिस्टम केवल एक पोल तक सीमित नहीं होता। इसमें मजबूत स्टील पोल, एलईडी या अन्य प्रकाश उपकरण, विद्युत केबल, कंट्रोल पैनल, पाइपिंग, विंच सिस्टम, फाउंडेशन, अर्थिंग और सुरक्षा उपकरण शामिल होते हैं।

इन सभी घटकों की गुणवत्ता परियोजना की सुरक्षा और कार्यक्षमता के लिए महत्वपूर्ण होती है। यदि इनमें से किसी भी हिस्से की गुणवत्ता मानकों से कम हो, तो भविष्य में तकनीकी खराबी या दुर्घटना का जोखिम बढ़ सकता है।

टेस्टिंग रिपोर्ट को लेकर भी उठे सवाल

आरोपों में यह भी कहा जा रहा है कि कुछ मामलों में उपयोग किए गए उपकरणों की आवश्यक परीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी या दस्तावेजों में पर्याप्त जानकारी दर्ज नहीं की गई।

आम तौर पर सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं में उपयोग होने वाली सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए अधिकृत प्रयोगशालाओं या मान्यता प्राप्त परीक्षण संस्थानों की रिपोर्ट ली जाती है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि उत्पाद निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप है।

यदि किसी परियोजना में परीक्षण संबंधी दस्तावेज अधूरे पाए जाते हैं, तो जांच एजेंसियां संबंधित रिकॉर्ड की विस्तृत समीक्षा कर सकती हैं।

सामग्री चयन और निगरानी प्रक्रिया पर भी चर्चा

सूत्रों के अनुसार परियोजना के दौरान सामग्री चयन, निरीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि संबंधित अधिकारियों ने सामग्री की गुणवत्ता को लेकर पर्याप्त आपत्तियां दर्ज नहीं कीं।

कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि सप्लाई से पहले सामग्री का निरीक्षण करने के लिए अधिकारियों ने दूसरे राज्यों का दौरा किया था, लेकिन चयनित उत्पादों की तकनीकी मंजूरी और मूल्यांकन से संबंधित पूरा रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है।

हालांकि इन दावों की पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच के बाद ही संभव होगी।

नगर निगम की खरीद प्रक्रिया कैसे होती है?

नगर निगम या अन्य सरकारी संस्थाओं में किसी भी सार्वजनिक परियोजना के लिए सामान्यतः निविदा (टेंडर) प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें तकनीकी पात्रता, वित्तीय बोली, गुणवत्ता मानक और कार्य पूरा करने की समयसीमा जैसी शर्तें निर्धारित की जाती हैं।

कार्य आदेश जारी होने के बाद सामग्री की आपूर्ति, निरीक्षण, स्थापना और भुगतान निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है। प्रत्येक चरण का रिकॉर्ड विभागीय फाइलों में सुरक्षित रखा जाता है ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसका ऑडिट किया जा सके।

इसी कारण यदि किसी परियोजना को लेकर विवाद सामने आता है तो निविदा दस्तावेज, निरीक्षण रिपोर्ट, भुगतान रिकॉर्ड और तकनीकी परीक्षण महत्वपूर्ण साक्ष्य माने जाते हैं।

विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने उठाई जांच की मांग

मामले के सामने आने के बाद विभिन्न विपक्षी नेताओं और सामाजिक संगठनों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी परियोजना में सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है या गुणवत्ता से समझौता किया गया है, तो इसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।

संगठनों का यह भी कहना है कि सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए खरीद प्रक्रिया, भुगतान और गुणवत्ता परीक्षण से जुड़े सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

स्वतंत्र तकनीकी जांच की मांग क्यों उठ रही है?

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल प्रशासनिक जांच पर्याप्त नहीं होती। यदि गुणवत्ता संबंधी विवाद सामने आए हैं, तो स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सामग्री, संरचना और सुरक्षा मानकों की जांच अधिक प्रभावी मानी जाती है।

इसी कारण यह मांग की जा रही है कि जांच समिति में इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाए ताकि हाई मस्ट पोल, फाउंडेशन, स्टील की गुणवत्ता, मोटाई, विद्युत उपकरणों और अन्य तकनीकी पहलुओं का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सके।

सुरक्षा मानकों की समीक्षा भी जरूरी

हाई मस्ट पोल सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाते हैं, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग आते-जाते हैं। इसलिए इनकी संरचनात्मक मजबूती, हवा का दबाव सहने की क्षमता, जंगरोधी सुरक्षा और विद्युत सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

यदि किसी भी स्तर पर गुणवत्ता में कमी पाई जाती है, तो भविष्य में दुर्घटना की संभावना बढ़ सकती है। इसी कारण नियमित निरीक्षण, समय-समय पर रखरखाव और तकनीकी ऑडिट को सार्वजनिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

क्या अन्य परियोजनाओं की भी होगी समीक्षा?

इस विवाद के बाद शहर में विभिन्न विभागों द्वारा स्थापित अन्य हाई मस्ट लाइट परियोजनाओं को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी एक परियोजना को लेकर गुणवत्ता संबंधी विवाद सामने आया है, तो अन्य समान परियोजनाओं की भी तकनीकी समीक्षा कराई जानी चाहिए।

इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सभी सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए हाई मस्ट पोल निर्धारित सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हैं तथा भविष्य में किसी प्रकार की तकनीकी समस्या या सुरक्षा जोखिम उत्पन्न न हो।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर बढ़ा जोर

सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं में पारदर्शिता, तकनीकी गुणवत्ता और वित्तीय जवाबदेही को सुशासन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी भी परियोजना को लेकर सवाल उठते हैं, तो समयबद्ध और निष्पक्ष जांच से न केवल वास्तविक स्थिति स्पष्ट होती है बल्कि भविष्य में ऐसी विवादित परिस्थितियों को रोकने में भी मदद मिलती है।

फिलहाल हाई मस्ट स्ट्रीट लाइट पोल परियोजना से जुड़े आरोपों पर अंतिम स्थिति किसी सक्षम जांच या आधिकारिक रिपोर्ट के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी। तब तक पूरे मामले को जांच प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ही देखा जाना उचित माना जा रहा है।