G7 शिखर सम्मेलन आज से शुरू, मोदी भी होंगे शामिल; ट्रम्प-मैक्रों की मुलाकात में ईरान समझौते पर चर्चा

G7 शिखर सम्मेलन आज से शुरू, मोदी भी होंगे शामिल; ट्रम्प-मैक्रों की मुलाकात में ईरान समझौते पर चर्चा

फ्रांस के एवियन शहर में दुनिया की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के संगठन G7 का 52वां शिखर सम्मेलन आज से शुरू हो रहा है। दो दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में वैश्विक राजनीति, आर्थिक चुनौतियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मध्य-पूर्व संकट और यूक्रेन युद्ध जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। सम्मेलन में शामिल होने के लिए कई देशों के शीर्ष नेता फ्रांस पहुंच चुके हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने यूरोपीय दौरे के तहत आज एवियन पहुंचेंगे।

सम्मेलन से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। दोनों नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय हालात और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया। इस दौरान मैक्रों ने हाल ही में हुए अमेरिका-ईरान समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम वैश्विक स्थिरता और शांति की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उनके अनुसार इस समझौते से ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी और पारदर्शिता को मजबूती मिलेगी।

G7 सम्मेलन में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम के राष्ट्राध्यक्ष और शासन प्रमुख हिस्सा ले रहे हैं। इसके अलावा कई गैर-सदस्य देशों को भी विशेष आमंत्रण दिया गया है। भारत भी उन्हीं प्रमुख आमंत्रित देशों में शामिल है, जिसकी वैश्विक भूमिका और आर्थिक महत्व को देखते हुए लगातार G7 मंच पर उपस्थिति बनी हुई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में विभिन्न देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों में भी भाग लेंगे। माना जा रहा है कि उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से भी मुलाकात हो सकती है। इसके अलावा वे अन्य सहयोगी देशों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा करेंगे।

मोदी इस समय फ्रांस और स्लोवाकिया की यात्रा पर हैं। 13 जून से शुरू हुआ उनका यह दौरा छह दिनों का है। कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री 18 जून को पेरिस से भारत लौटेंगे। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका 100वां विदेश दौरा माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट के अनुसार, नरेंद्र मोदी ने पिछले 12 वर्षों में कुल 78 देशों की यात्राएं की हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनका पहला विदेशी दौरा जून 2014 में भूटान का था। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने 49 विदेश यात्राएं कीं, जबकि दूसरे कार्यकाल में यह संख्या 27 रही। वर्तमान तीसरे कार्यकाल में फ्रांस और स्लोवाकिया का यह दौरा उनका 24वां अंतरराष्ट्रीय दौरा है।

G7 सम्मेलन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के नेता शामिल होते हैं। G7 का पूरा नाम ‘ग्रुप ऑफ सेवन’ है। इसमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा सदस्य हैं। यह समूह वैश्विक आर्थिक नीतियों, राजनीतिक संकटों और सुरक्षा से जुड़े विषयों पर समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है।

इस संगठन की शुरुआत 1975 में छह देशों के समूह G6 के रूप में हुई थी। अगले वर्ष कनाडा इसके साथ जुड़ गया और यह G7 बन गया। बाद में 1998 में रूस को शामिल कर इसे G8 कहा जाने लगा, लेकिन 2014 में यूक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र पर रूस के नियंत्रण के बाद उसे समूह से बाहर कर दिया गया। इसके बाद संगठन फिर से G7 के नाम से संचालित होने लगा।

हालांकि भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, लेकिन उसकी आर्थिक ताकत और बढ़ते वैश्विक प्रभाव को देखते हुए उसे अक्सर विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार लगातार सातवीं बार G7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं।

मोदी को पहली बार 2019 में फ्रांस के बियारिट्ज शहर में आयोजित G7 सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। इसके बाद 2021 में ब्रिटेन की मेजबानी में आयोजित सम्मेलन में उन्होंने वर्चुअल माध्यम से भाग लिया। वहीं 2022 में जर्मनी, 2023 में जापान, 2024 में इटली और 2025 में कनाडा में आयोजित G7 बैठकों में भी उनकी उपस्थिति रही।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी G7 और G8 सम्मेलनों में कई बार शामिल हो चुके हैं। उन्होंने 2005 से 2013 के बीच पांच अवसरों पर इस मंच में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

इस वर्ष के सम्मेलन का एजेंडा काफी व्यापक माना जा रहा है। यूक्रेन युद्ध की स्थिति, ईरान-इजराइल तनाव, गाजा संकट, लेबनान की सुरक्षा परिस्थितियां और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियां प्रमुख चर्चा के विषय रहेंगे। इसके अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती, व्यापारिक असंतुलन, ऊर्जा सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव पर भी विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे।

फ्रांस इस वर्ष G7 की अध्यक्षता कर रहा है। समूह में अध्यक्षता की जिम्मेदारी हर साल सदस्य देशों के बीच बदलती रहती है। अध्यक्ष देश ही सम्मेलन का आयोजन करता है और प्राथमिक एजेंडा तय करने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

G7 केवल वार्षिक सम्मेलन तक सीमित नहीं है। सदस्य देशों के मंत्री, अधिकारी और नीति-निर्माता पूरे वर्ष विभिन्न बैठकों में हिस्सा लेते हैं। इन बैठकों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रणनीतियां बनाई जाती हैं और कई बार महत्वपूर्ण घोषणाएं भी की जाती हैं।

वर्षों के दौरान G7 ने वैश्विक स्तर पर कई बड़े फैसलों में भूमिका निभाई है। वर्ष 2002 में मलेरिया और एड्स जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए ग्लोबल फंड की स्थापना में इसकी अहम भागीदारी रही। 1998 के एशियाई वित्तीय संकट के दौरान इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देशों को आर्थिक सहयोग देने में भी समूह सक्रिय रहा। हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस पर प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को सहायता प्रदान करने के फैसलों में भी G7 देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अक्सर G7 और G20 की तुलना भी की जाती है। दोनों मंच वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर चर्चा करते हैं, लेकिन उनकी संरचना और उद्देश्य अलग हैं। G7 अपेक्षाकृत छोटे और विकसित देशों का समूह है, जबकि G20 में विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं दोनों को शामिल किया गया है।

G20 की स्थापना 1999 में हुई थी। इसमें भारत, चीन, ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, मैक्सिको, सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया और तुर्किये जैसे देश भी शामिल हैं। इसके साथ ही यूरोपीय संघ भी G20 का सदस्य है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में G20 का दायरा अधिक व्यापक हो गया है क्योंकि इसमें दुनिया की बड़ी आबादी और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व शामिल है। यही कारण है कि कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर G20 की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। यहां तक कि डोनाल्ड ट्रम्प ने भी 2020 में G7 को पुराना ढांचा बताते हुए इसके स्वरूप में बदलाव की आवश्यकता जताई थी।

फिलहाल दुनिया की नजरें फ्रांस में शुरू हो रहे इस सम्मेलन पर टिकी हैं। यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व संकट, वैश्विक अर्थव्यवस्था और AI जैसे विषयों पर होने वाली चर्चाएं आने वाले समय की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक नीतियों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी भी भारत की बढ़ती वैश्विक भागीदारी और कूटनीतिक प्रभाव को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर रेखांकित करेगी।