बीजिंग में नेपाल ने उठाया सीमा विवाद का मुद्दा, चीन ने कहा- भारत से बातचीत कर सुलझाएं मतभेद

बीजिंग में नेपाल ने उठाया सीमा विवाद का मुद्दा, चीन ने कहा- भारत से बातचीत कर सुलझाएं मतभेद

नेपाल ने एक बार फिर कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख से जुड़े सीमा विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए चीन के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। बीजिंग में हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की और उन समझौतों पर सवाल खड़े किए, जो भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के उपयोग को लेकर किए गए हैं।

बैठक में खनाल ने स्पष्ट किया कि नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा मानता रहा है। उन्होंने चीन से जानना चाहा कि भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग को लेकर जो व्यवस्थाएं बनाई गई हैं, उनकी कानूनी और कूटनीतिक आधारशिला क्या है। नेपाल का कहना है कि जिस क्षेत्र पर वह अपना दावा करता है, उससे जुड़े किसी भी फैसले में उसकी सहमति आवश्यक होनी चाहिए।

हालांकि चीन ने इस मामले पर तटस्थ रुख अपनाया। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख से जुड़ा विवाद मूल रूप से भारत और नेपाल के बीच का विषय है। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसे मुद्दों का समाधान संबंधित देशों के बीच प्रत्यक्ष वार्ता और कूटनीतिक संवाद से ही संभव है। चीन ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस विवाद में किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान का पक्षधर है।

नेपाल ने बैठक के दौरान दोहराया कि विवादित इलाका उसकी संप्रभु सीमा का हिस्सा है। काठमांडू का तर्क है कि उसकी मंजूरी के बिना इस क्षेत्र से जुड़े किसी भी समझौते को वैध नहीं माना जा सकता। यही वजह है कि नेपाल पहले भी भारत और चीन दोनों को औपचारिक विरोध दर्ज करा चुका है।

दरअसल, भारत और चीन ने वर्ष 2020 में लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमापार व्यापार को सुचारु रूप से संचालित करने पर सहमति जताई थी। दोनों देशों ने इस मार्ग को धार्मिक यात्रा और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयोग करने का निर्णय लिया था। उस समय नेपाल ने इस व्यवस्था का कड़ा विरोध किया था और कहा था कि जिस क्षेत्र से यह मार्ग गुजरता है, वह उसके दावे वाले इलाके में आता है।

नेपाल का कहना था कि उससे बिना परामर्श किए किसी तीसरे पक्ष द्वारा इस क्षेत्र के उपयोग पर समझौता करना उसकी संप्रभुता की अनदेखी है। विरोध स्वरूप नेपाल ने भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक नोट भेजे थे। इसके बावजूद भारत और चीन के बीच इस मार्ग का उपयोग जारी रहा और कैलाश मानसरोवर यात्रा समेत कई गतिविधियां इसी रास्ते से संचालित होती रहीं।

दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में जब नेपाल के विदेश मंत्री भारत दौरे पर आए थे, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे को प्रमुखता से नहीं उठाया था। नई दिल्ली में उनकी मुलाकात भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई थी, लेकिन दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्त बयान में कालापानी, लिंपियाधुरा या लिपुलेख विवाद का कोई उल्लेख नहीं किया गया।

यही कारण है कि बीजिंग में इस विषय को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल एक संतुलित विदेश नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। वह भारत और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन सीमा विवाद जैसे मुद्दों को भी पूरी तरह छोड़ना नहीं चाहता।

विश्लेषकों के अनुसार, नेपाल की रणनीति यह हो सकती है कि वह विवाद को जीवित रखे ताकि भविष्य में सीमा निर्धारण की किसी भी प्रक्रिया में उसके दावों को नजरअंदाज न किया जा सके। साथ ही वह ऐसा कोई कदम भी नहीं उठाना चाहता जिससे दोनों बड़े पड़ोसियों के साथ उसके रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा हो।

इसी बीच भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से व्यापारिक गतिविधियां फिर से शुरू होने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य संघर्ष के बाद इस मार्ग से व्यापार लगभग ठप हो गया था। अब करीब छह साल बाद दोनों देशों के बीच इस रास्ते से व्यापार बहाल करने की तैयारियां तेज हो गई हैं।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से सैकड़ों व्यापारियों के नाम संबंधित अधिकारियों को भेजे गए हैं। इन व्यापारियों को विशेष व्यापारिक अनुमति पत्र के आधार पर तिब्बत के तकलाकोट बाजार तक पहुंचने की सुविधा मिल सकती है। इसके लिए पारंपरिक वीजा व्यवस्था के बजाय विशेष ट्रेड पास का उपयोग किया जाएगा।

व्यापारियों के लिए इस बार सबसे बड़ा बदलाव बुनियादी ढांचे में आया सुधार है। पहले सीमा तक पहुंचने और सामान ढोने के लिए घोड़ों तथा खच्चरों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब सड़क संपर्क बेहतर होने से वाहन सीमा तक पहुंच सकेंगे। इससे व्यापार की लागत कम होगी और समय की भी बचत होगी।

लिपुलेख दर्रा सदियों से भारत और तिब्बत के बीच व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग रहा है। ऐतिहासिक रूप से तिब्बती व्यापारी ऊन, नमक और बोरेक्स जैसे उत्पाद लेकर भारत आते थे, जबकि भारतीय व्यापारी कपड़ा, मसाले और खाद्यान्न तिब्बत पहुंचाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह मार्ग बंद हो गया था, लेकिन बाद में दोनों देशों के बीच समझौते के तहत इसे फिर खोला गया।

विवाद की जड़ दरअसल सीमा निर्धारण से जुड़ी है। भारत, नेपाल और चीन की सीमाओं के समीप स्थित इस क्षेत्र में महाकाली या काली नदी का उद्गम क्षेत्र मौजूद है। यही नदी भारत और नेपाल के बीच सीमा निर्धारण का आधार मानी जाती है। लेकिन दोनों देशों के बीच इस बात पर सहमति नहीं है कि काली नदी की वास्तविक उद्गम धारा कौन-सी है।

साल 1816 में ब्रिटिश शासन और नेपाल के तत्कालीन गोरखा शासकों के बीच हुए सुगौली समझौते में काली नदी को दोनों देशों की सीमा माना गया था। समझौते के अनुसार नदी के पश्चिम का इलाका भारत और पूर्व का क्षेत्र नेपाल के हिस्से में माना गया था।

समस्या तब पैदा हुई जब नदी के वास्तविक स्रोत को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आईं। भारत का मानना है कि पूर्वी दिशा की धारा काली नदी का मूल स्रोत है। दूसरी ओर नेपाल पश्चिमी धारा को असली उद्गम मानता है। इसी अलग-अलग व्याख्या के कारण कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख क्षेत्र पर दोनों देशों के दावे टकराते हैं।

यही विवाद आज भी दोनों देशों के बीच समय-समय पर चर्चा और तनाव का कारण बनता है। नेपाल का ताजा कदम इस बात का संकेत है कि वह इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विमर्श में बनाए रखना चाहता है, जबकि चीन फिलहाल इसे भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय मामला मानते हुए दूरी बनाए हुए है।