रात में बार-बार खुल जाती है आंख? कहीं यह नींद की बीमारी आपके दिमाग को तो नुकसान नहीं पहुंचा रही

रात में बार-बार खुल जाती है आंख? कहीं यह नींद की बीमारी आपके दिमाग को तो नुकसान नहीं पहुंचा रही

कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, तेज खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस होने को सामान्य मान लेते हैं। लेकिन कई बार ये संकेत शरीर में छिपी एक गंभीर समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं। अगर सोते समय सांस रुकने की वजह से बार-बार नींद खुलती है, तो यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) का लक्षण हो सकता है। यह नींद से जुड़ी ऐसी समस्या है जिसमें सोने के दौरान सांस की नली बार-बार संकरी या बंद हो जाती है, जिससे शरीर और खासकर दिमाग तक ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा नहीं पहुंच पाती।

स्लीप एपनिया सिर्फ खर्राटों तक सीमित समस्या नहीं है। लंबे समय तक इसका इलाज न होने पर यह दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त, सोचने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, रात में बार-बार सांस रुकने से शरीर में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है और यह प्रक्रिया दिमाग के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

सोते समय दिमाग पर पड़ता है ऑक्सीजन की कमी का असर

हमारा दिमाग शरीर का सबसे ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल करने वाला अंग है और इसे लगातार काम करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन की जरूरत होती है। स्लीप एपनिया में जब सांस लेने में रुकावट आती है, तो खून में ऑक्सीजन का स्तर कुछ समय के लिए कम हो जाता है। इस स्थिति को इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया कहा जाता है।

बार-बार होने वाली यह ऑक्सीजन की कमी दिमाग की कोशिकाओं पर दबाव डाल सकती है। खासतौर पर दिमाग के वे हिस्से प्रभावित हो सकते हैं जो याददाश्त, ध्यान केंद्रित करने और निर्णय लेने की क्षमता से जुड़े होते हैं।

कई शोधों में पाया गया है कि लंबे समय तक स्लीप एपनिया से जूझने वाले लोगों में हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे हिस्सों में बदलाव देखे गए हैं। ये हिस्से सीखने, जानकारी याद रखने और सही फैसले लेने में अहम भूमिका निभाते हैं।

यही कारण है कि ऐसे लोगों को अक्सर चीजें याद रखने में परेशानी, काम पर ध्यान लगाने में दिक्कत, मानसिक थकान और सोचने की गति धीमी होने जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

बार-बार टूटने वाली नींद दिमाग की रिकवरी रोक देती है

रात की अच्छी नींद केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं होती, बल्कि इस दौरान दिमाग खुद को दोबारा व्यवस्थित और रिकवर करता है। लेकिन स्लीप एपनिया में सांस रुकने की हर घटना दिमाग को थोड़ी देर के लिए जगाने का कारण बनती है। कई बार व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलता, लेकिन नींद बार-बार टूटती रहती है। इससे गहरी नींद और REM (रैपिड आई मूवमेंट) नींद का चक्र प्रभावित हो जाता है।

गहरी नींद के दौरान दिमाग दिनभर की जानकारी को व्यवस्थित करता है, यादों को मजबूत करता है और मानसिक थकान को कम करता है। वहीं REM नींद भावनाओं को नियंत्रित करने और सीखने की प्रक्रिया में मदद करती है। जब यह प्रक्रिया लगातार बाधित होती है तो व्यक्ति दिन में सुस्ती, चिड़चिड़ापन, मूड में बदलाव और काम करने की क्षमता में कमी महसूस कर सकता है।

कई मरीजों को सुबह उठने के बाद भी ऐसा लगता है कि उन्होंने पूरी नींद नहीं ली। दिनभर नींद आने और ध्यान न लग पाने की समस्या उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।

दिमाग की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है सीधा असर

स्लीप एपनिया सिर्फ दिमाग में ऑक्सीजन की कमी नहीं करता, बल्कि शरीर में कई ऐसे बदलाव भी पैदा करता है जो लंबे समय में दिमाग के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। ऑक्सीजन का बार-बार कम होना और फिर सामान्य होना शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन), ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और नर्वस सिस्टम की अधिक सक्रियता को बढ़ा सकता है।

इन बदलावों का असर रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है और हाई ब्लड प्रेशर, धमनियों में कमजोरी और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। चूंकि दिमाग तक खून पहुंचाने वाली नसें भी इससे प्रभावित होती हैं, इसलिए सोचने और समझने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। समय के साथ यह स्थिति स्ट्रोक के खतरे को भी बढ़ा सकती है। दिमाग में रक्त प्रवाह प्रभावित होने पर वैस्कुलर डिमेंशिया जैसी समस्याओं की संभावना बढ़ सकती है, जिसमें याददाश्त और मानसिक क्षमता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।

क्या स्लीप एपनिया से अल्जाइमर का खतरा बढ़ सकता है?

कुछ नए शोधों में स्लीप एपनिया और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के बीच संबंध की बात सामने आई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लंबे समय तक खराब नींद दिमाग की सफाई प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। नींद के दौरान दिमाग में जमा होने वाले कुछ अपशिष्ट पदार्थों को हटाने की प्रक्रिया तेज होती है। इनमें बीटा-एमिलॉयड जैसे प्रोटीन भी शामिल हैं, जिनका संबंध अल्जाइमर जैसी बीमारियों से जोड़ा जाता है।

हालांकि इस विषय पर अभी और अध्ययन की जरूरत है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि स्लीप एपनिया की समय पर पहचान और इलाज दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?

जिन लोगों को तेज खर्राटे आते हैं, रात में सांस रुकने जैसा महसूस होता है, सुबह सिरदर्द रहता है या दिनभर बहुत ज्यादा नींद आती है, उन्हें इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके अलावा मोटापा, बढ़ती उम्र, गर्दन के आसपास ज्यादा फैट, हाई ब्लड प्रेशर और जीवनशैली से जुड़ी कुछ आदतें स्लीप एपनिया का खतरा बढ़ा सकती हैं। कई बार परिवार के सदस्य सबसे पहले इस समस्या को नोटिस करते हैं क्योंकि मरीज खुद रात में होने वाली सांस की रुकावट को महसूस नहीं कर पाता।

इलाज से सुधर सकती है नींद और दिमाग की सेहत

अच्छी खबर यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है और सही समय पर उपचार शुरू करने से इसके गंभीर प्रभावों को कम किया जा सकता है। डॉक्टर अक्सर मरीज की स्थिति के अनुसार इलाज की सलाह देते हैं। इसमें CPAP (कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो सोते समय सांस की नली को खुला रखने में मदद करती है।

इसके अलावा वजन कम करना, नियमित व्यायाम, सोने की आदतों में सुधार, शराब या धूम्रपान जैसी आदतों से दूरी और कुछ मामलों में ओरल डिवाइस का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है। स्लीप एपनिया का समय पर इलाज न सिर्फ रात की नींद बेहतर करता है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और पूरे शरीर की सेहत को भी सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।

अगर रात में बार-बार नींद टूटती है, तेज खर्राटे आते हैं या दिनभर थकान रहती है, तो इसे केवल नींद की परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह शरीर की ओर से दिया गया एक संकेत हो सकता है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है।

(Photo : AI Generated)