संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पर फिर आमने-सामने भारत-पाकिस्तान, पाकिस्तान ने दोहराया अपना पुराना रुख

संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पर फिर आमने-सामने भारत-पाकिस्तान, पाकिस्तान ने दोहराया अपना पुराना रुख

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को लेकर तीखी कूटनीतिक बहस देखने को मिली। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने-अपने आधिकारिक रुख को दोहराते हुए एक-दूसरे के दावों का जवाब दिया। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों का हवाला देते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय विवाद बताया, जबकि भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

यह बहस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक आरिया फॉर्मूला (Arria Formula) बैठक के दौरान सामने आई। इस बैठक में विभिन्न पक्षों ने अपने विचार रखे, जिसके बाद भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच कश्मीर को लेकर लंबे समय से चले आ रहे मतभेद एक बार फिर सार्वजनिक रूप से दिखाई दिए।

भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को लेकर दशकों से अलग-अलग आधिकारिक दृष्टिकोण रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में हुई यह ताजा बहस भी इसी लंबे कूटनीतिक और राजनीतिक विवाद का एक नया अध्याय मानी जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में क्या हुआ?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आरिया फॉर्मूला के तहत आयोजित अनौपचारिक बैठक में कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हुई। इसी दौरान पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया और कहा कि यह विषय अब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एजेंडे में शामिल है।

इसके जवाब में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ा विषय भारत का आंतरिक मामला है और इस पर किसी बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। भारत ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

दोनों देशों ने अपने-अपने पुराने आधिकारिक रुख को दोहराया और एक-दूसरे के दावों को स्वीकार करने से इनकार किया।

पाकिस्तान ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि असीम इफ्तिखार अहमद ने अपने संबोधन में कहा कि पाकिस्तान की दृष्टि में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा अभी भी सुरक्षा परिषद के एजेंडे का हिस्सा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों को लागू करने के प्रति इच्छुक नहीं है और इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग नहीं कर रहा।

पाकिस्तानी प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर के अंतिम राजनीतिक दर्जे का प्रश्न अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 से जुड़े प्रावधानों और महासचिव की मध्यस्थता संबंधी व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया।

उनका कहना था कि पाकिस्तान स्वयं को इस विवाद का पक्ष मानता है और उसका मानना है कि इस विषय का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप होना चाहिए।

भारत ने दिया स्पष्ट जवाब

भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने पाकिस्तान के दावों का जवाब देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा।

उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है तथा इस मामले में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है।

भारतीय प्रतिनिधि ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के मंच का उपयोग किसी सदस्य देश के विरुद्ध राजनीतिक अभियान चलाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

भारत लंबे समय से यह आधिकारिक रुख अपनाता रहा है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े सभी मुद्दों का समाधान भारत के संवैधानिक ढांचे के भीतर ही किया जाएगा।

सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों पर भारत की टिप्पणी

अपने संबोधन के दौरान भारतीय प्रतिनिधि ने सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों और जनादेशों की समीक्षा की आवश्यकता पर भी विचार रखा।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र अपनी 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं की समीक्षा कर रहा है। ऐसे में सुरक्षा परिषद के पुराने जनादेशों और ऐतिहासिक संदर्भों की समीक्षा पर भी विचार किया जा सकता है।

भारत का तर्क रहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां समय के साथ बदलती हैं और संस्थाओं को भी बदलते वैश्विक परिदृश्य के अनुरूप स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 का उल्लेख

बैठक के दौरान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय-6 का भी उल्लेख हुआ।

यह अध्याय मुख्य रूप से देशों के बीच विवादों के शांतिपूर्ण समाधान से संबंधित प्रावधानों की चर्चा करता है। इसमें बातचीत, मध्यस्थता, समझौता और अन्य शांतिपूर्ण उपायों का उल्लेख किया गया है।

पाकिस्तान ने अपने वक्तव्य में इन प्रावधानों का हवाला दिया, जबकि भारत ने कहा कि इन व्यवस्थाओं को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए और बदलते समय के अनुसार समीक्षा भी आवश्यक हो सकती है।

आरिया फॉर्मूला क्या है?

इस बैठक के दौरान सबसे अधिक चर्चा जिस शब्द की हुई, वह था आरिया फॉर्मूला (Arria Formula)

आरिया फॉर्मूला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक अनौपचारिक बैठक व्यवस्था है। इसकी शुरुआत वेनेजुएला के राजनयिक डिएगो अरिया के नाम पर हुई थी।

इस व्यवस्था के तहत सुरक्षा परिषद के सदस्य औपचारिक बैठक से अलग किसी विषय पर विशेषज्ञों, संगठनों या संबंधित पक्षों से चर्चा कर सकते हैं।

ऐसी बैठकों का उद्देश्य विचार-विमर्श और जानकारी साझा करना होता है।

क्या आरिया फॉर्मूला बैठक के निर्णय बाध्यकारी होते हैं?

आरिया फॉर्मूला के तहत आयोजित बैठकें औपचारिक सुरक्षा परिषद बैठकें नहीं मानी जातीं।

इन बैठकों में कोई आधिकारिक प्रस्ताव पारित नहीं किया जाता और न ही इनके आधार पर सुरक्षा परिषद का बाध्यकारी निर्णय माना जाता है।

इसी कारण इस तरह की बैठकों में हुई चर्चा को सदस्य देश अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं।

भारत और पाकिस्तान दोनों ने भी इस बैठक के बाद अपनी-अपनी आधिकारिक व्याख्याएं सामने रखीं।

भारत का आधिकारिक रुख

भारत लगातार यह कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ था।

भारत का आधिकारिक दृष्टिकोण है कि जम्मू-कश्मीर पूरी तरह भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है तथा वहां से जुड़े प्रशासनिक, संवैधानिक और विकास संबंधी विषय भारत के आंतरिक मामले हैं।

भारत यह भी कहता है कि किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे का समाधान दोनों देशों के बीच सीधे संवाद के माध्यम से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।

पाकिस्तान का आधिकारिक रुख

दूसरी ओर पाकिस्तान का आधिकारिक रुख लंबे समय से अलग रहा है।

पाकिस्तान लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बताता रहा है।

वह विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाता रहा है और अपने दृष्टिकोण के समर्थन में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला देता है।

भारत इन दावों को लगातार अस्वीकार करता रहा है।

कश्मीर मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर क्यों चर्चा में रहता है?

भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर का विषय दोनों देशों के संबंधों का सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक माना जाता है।

1947 में दोनों देशों के स्वतंत्र होने के बाद से इस क्षेत्र को लेकर कई बार तनाव, संघर्ष और युद्ध की स्थिति भी बनी।

समय-समय पर विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस विषय पर चर्चा होती रही है, हालांकि दोनों देशों के आधिकारिक दृष्टिकोण आज भी अलग-अलग बने हुए हैं।

भारत की विकास संबंधी दलील

भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं, प्रशासनिक सुधार, विकास परियोजनाएं और जनकल्याणकारी योजनाएं भारतीय संविधान के तहत संचालित हो रही हैं।

भारत का तर्क है कि वर्तमान परिस्थितियों का मूल्यांकन वर्तमान प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर किया जाना चाहिए।

भारतीय प्रतिनिधियों का कहना रहा है कि क्षेत्र में विकास, बुनियादी ढांचे और शासन व्यवस्था में निरंतर सुधार किए जा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक बयानबाजी

संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर सदस्य देशों द्वारा अपने आधिकारिक दृष्टिकोण रखना सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है।

भारत और पाकिस्तान दोनों समय-समय पर विभिन्न वैश्विक मंचों पर अपने-अपने रुख को दोहराते रहे हैं।

हालांकि ऐसी बहसों के बावजूद दोनों देशों की आधिकारिक नीतियों में किसी बड़े बदलाव के संकेत नहीं दिखाई देते।

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र विश्व स्तर पर शांति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने वाली संस्था है।

सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर चर्चा करने वाला प्रमुख निकाय है।

हालांकि किसी भी विषय पर सुरक्षा परिषद की औपचारिक कार्रवाई और अनौपचारिक चर्चा में अंतर होता है। आरिया फॉर्मूला जैसी बैठकों का उद्देश्य मुख्य रूप से विचार-विमर्श और जानकारी साझा करना होता है, न कि बाध्यकारी निर्णय लेना।

मौजूदा बहस का व्यापक महत्व

संयुक्त राष्ट्र में हुई इस हालिया बहस ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के आधिकारिक रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया है।

पाकिस्तान ने अपने वक्तव्य में सुरक्षा परिषद के ऐतिहासिक प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का उल्लेख किया, जबकि भारत ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का अभिन्न हिस्सा है तथा यह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है।

यह कूटनीतिक बहस केवल दो देशों के बीच मतभेदों को ही नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी बताती है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विभिन्न देश अपने-अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं। भविष्य में भी संयुक्त राष्ट्र सहित अन्य वैश्विक मंचों पर इस विषय पर दोनों देशों की ओर से अपने-अपने आधिकारिक रुख दोहराए जाने की संभावना बनी रह सकती है।