युवाओं में तेजी से बढ़ रहा माइग्रेन का खतरा, डॉक्टर बोले- बिगड़ी दिनचर्या और खानपान बन रहे सबसे बड़े कारण

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा माइग्रेन का खतरा, डॉक्टर बोले- बिगड़ी दिनचर्या और खानपान बन रहे सबसे बड़े कारण

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में माइग्रेन की समस्या केवल वयस्कों तक सीमित नहीं रह गई है। अब बच्चे, किशोर और युवा भी बड़ी संख्या में इस न्यूरोलॉजिकल समस्या का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अनियमित जीवनशैली, खराब खानपान और बढ़ता मानसिक दबाव इसके पीछे प्रमुख वजहें हैं। समय रहते इन कारणों पर ध्यान देकर माइग्रेन के हमलों की संख्या और उनकी गंभीरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

मणिपाल हॉस्पिटल, भुवनेश्वर में एसोसिएट कंसल्टेंट (न्यूरोलॉजी) डॉ. अमलान तपन महापात्रा के अनुसार माइग्रेन सामान्य सिरदर्द से अलग बीमारी है। यह केवल सिर में दर्द होने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके साथ कई तरह के शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई देते हैं। इसलिए इसे हल्के में लेने के बजाय सही समय पर पहचानना और उचित इलाज कराना जरूरी है।

बदलती लाइफस्टाइल बना रही है स्थिति गंभीर

विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में युवाओं और स्कूली बच्चों की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। देर रात तक जागना, सुबह देर से उठना, घंटों मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करना, बाहर का जंक फूड खाना और शारीरिक गतिविधियों में कमी जैसी आदतें माइग्रेन के मामलों को तेजी से बढ़ा रही हैं।

इसके अलावा पढ़ाई, करियर और प्रतियोगी माहौल का दबाव भी मानसिक तनाव बढ़ाता है, जो माइग्रेन के दौरे को ट्रिगर कर सकता है। डॉक्टरों का मानना है कि अगर शुरुआती उम्र में ही अच्छी दिनचर्या अपनाई जाए तो इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

किन आदतों से बढ़ता है माइग्रेन का खतरा

डॉ. महापात्रा के मुताबिक कई रोजमर्रा की आदतें माइग्रेन को बढ़ावा देती हैं। इनमें सबसे पहले अनियमित नींद शामिल है। जरूरत से कम या बहुत ज्यादा सोना, दोनों ही स्थिति माइग्रेन का कारण बन सकती हैं।

इसके अलावा समय पर भोजन न करना, लंबे समय तक भूखे रहना, शरीर में पानी की कमी होना, लगातार स्क्रीन देखना, तनाव और चिंता, नियमित व्यायाम न करना, कैफीन या एनर्जी ड्रिंक का अत्यधिक सेवन, अचानक कैफीन छोड़ देना, अधिक चीनी और पैकेज्ड फूड खाना, धूम्रपान, शराब का सेवन, तेज रोशनी और अधिक शोर वाले वातावरण में लंबे समय तक रहना भी माइग्रेन के जोखिम को बढ़ाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से कई कारण ऐसे हैं जिन्हें व्यक्ति अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करके नियंत्रित कर सकता है।

माइग्रेन और सामान्य सिरदर्द में क्या अंतर है

बहुत से लोग माइग्रेन को सामान्य सिरदर्द समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि दोनों में स्पष्ट अंतर होता है। डॉक्टर बताते हैं कि साधारण सिरदर्द अक्सर थोड़ी देर में ठीक हो जाता है, लेकिन माइग्रेन कई चरणों में विकसित होने वाली बीमारी है।

माइग्रेन का पहला चरण प्रोड्रोम कहलाता है, जिसमें व्यक्ति को थकान, मूड में बदलाव या कमजोरी जैसी शुरुआती समस्याएं महसूस हो सकती हैं। इसके बाद कुछ मरीजों में ऑरा की स्थिति आती है, जिसमें आंखों के सामने चमक, धुंधलापन या अन्य विजुअल परेशानियां हो सकती हैं। इसके बाद मुख्य सिरदर्द शुरू होता है और अंत में पोस्टड्रोम चरण आता है, जिसमें दर्द कम होने के बावजूद व्यक्ति थका हुआ या सुस्त महसूस कर सकता है।

माइग्रेन के दौरान कौन-कौन से लक्षण दिखाई देते हैं

विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन का दर्द अक्सर सिर के एक हिस्से में होता है। यह धड़कन जैसा महसूस होता है और इसकी अवधि लगभग 4 घंटे से लेकर 72 घंटे तक हो सकती है।

इस दौरान मरीज को मतली या उल्टी की शिकायत हो सकती है। कई लोगों को तेज रोशनी और तेज आवाज बिल्कुल सहन नहीं होती। कुछ मरीजों को सिर हिलाने या सामान्य गतिविधि करने पर भी दर्द बढ़ता हुआ महसूस होता है। यही कारण है कि माइग्रेन के दौरान कई लोग अंधेरे और शांत कमरे में आराम करना पसंद करते हैं।

कौन-कौन सी चीजें माइग्रेन को ट्रिगर करती हैं

हर व्यक्ति में माइग्रेन के ट्रिगर अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य कारण लगभग सभी मरीजों में देखे जाते हैं।

डॉक्टर बताते हैं कि पर्याप्त नींद न लेना या जरूरत से ज्यादा सोना, भोजन छोड़ देना, लंबे समय तक खाली पेट रहना, शरीर में पानी की कमी, मानसिक तनाव, चिंता, तेज रोशनी, तेज आवाज, मौसम में अचानक बदलाव, तेज परफ्यूम या अन्य तीखी खुशबू माइग्रेन के दौरे की वजह बन सकती है।

महिलाओं में हार्मोनल बदलाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से पीरियड्स के दौरान कई महिलाओं को माइग्रेन का दर्द बढ़ जाता है। वहीं भावनात्मक तनाव, अवसाद और चिंता भी इस बीमारी को ट्रिगर कर सकते हैं।

क्या बिना दवा के भी मिल सकती है राहत

विशेषज्ञों का कहना है कि हर बार माइग्रेन के इलाज के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। कुछ गैर-दवा आधारित तरीके भी मरीजों को राहत दिलाने में मददगार साबित हो सकते हैं।

इनमें बायोफीडबैक थेरेपी, कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT), एक्यूपंक्चर और नॉन-इनवेसिव न्यूरोमॉड्यूलेशन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इनका उद्देश्य तनाव कम करना, शरीर की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना और माइग्रेन के हमलों की आवृत्ति घटाना होता है।

हालांकि यदि माइग्रेन बार-बार हो रहा हो या दर्द बहुत अधिक हो तो डॉक्टर की सलाह से दवाएं लेना जरूरी होता है। बिना चिकित्सकीय सलाह के बार-बार दर्द निवारक दवाएं लेने से भविष्य में दूसरी समस्याएं भी हो सकती हैं।

क्या माइग्रेन पूरी तरह खत्म हो सकता है

डॉ. महापात्रा के अनुसार वर्तमान समय में माइग्रेन का ऐसा कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है जिससे इसे पूरी तरह समाप्त किया जा सके। हालांकि सही उपचार और बेहतर जीवनशैली अपनाकर इसे प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।

यदि मरीज पर्याप्त नींद ले, संतुलित भोजन करे, नियमित रूप से पानी पीए, तनाव कम रखे और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं या थेरेपी का पालन करे तो माइग्रेन के हमले कम हो सकते हैं और उनकी तीव्रता भी घट सकती है।

बच्चों और किशोरों में भी दिख रही है समस्या

विशेषज्ञों का कहना है कि पहले माइग्रेन को मुख्य रूप से वयस्कों की बीमारी माना जाता था, लेकिन अब यह बच्चों और किशोरों में भी तेजी से सामने आ रही है। ऑनलाइन पढ़ाई, मोबाइल गेम्स, सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन देखने की आदतों ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है।

अच्छी बात यह है कि कई बच्चों और किशोरों में उम्र बढ़ने के साथ माइग्रेन के लक्षण कम होने लगते हैं। हालांकि कुछ लोगों में यह समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है। ऐसे में नियमित मेडिकल फॉलो-अप और स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखना बेहद जरूरी होता है।

बचाव के लिए अपनाएं ये आसान उपाय

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोजाना एक निश्चित समय पर सोएं और जागें। भोजन कभी न छोड़ें और संतुलित आहार लें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत डालें और लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बचें। बीच-बीच में आंखों और दिमाग को आराम देना भी जरूरी है।

इसके साथ ही रोजाना हल्का व्यायाम या योग करें, तनाव कम करने के लिए मेडिटेशन या रिलैक्सेशन तकनीकों का सहारा लें और धूम्रपान व शराब जैसी आदतों से दूरी बनाए रखें। यदि माइग्रेन के लक्षण बार-बार दिखाई दें तो स्वयं इलाज करने के बजाय न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान, सही इलाज और अनुशासित जीवनशैली के जरिए माइग्रेन के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है, जिससे मरीज सामान्य और बेहतर जीवन जी सकता है।