हाल ही में भारतीय रेलवे की एक फर्स्ट एसी ट्रेन के कूपे से जुड़ा मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का बड़ा विषय बन गया। वायरल वीडियो में दावा किया गया कि एक नवविवाहित दंपति के स्वागत के लिए ट्रेन के कूपे को फूलों और सजावटी सामान से इस तरह तैयार किया गया था, मानो वह किसी होटल का हनीमून सूट हो। वीडियो सामने आने के बाद लोगों ने सवाल उठाए कि क्या रेलवे के कूपे को पूरी तरह निजी स्थान माना जा सकता है और क्या उसमें इस तरह की सजावट या निजी गतिविधियां करना नियमों के अनुरूप है।
मामले ने तूल पकड़ने के बाद रेलवे प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया। प्रारंभिक जांच में सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की आशंका जताई गई और संबंधित चीफ टिकटिंग इंस्पेक्टर (CTI) को निलंबित कर दिया गया। साथ ही पूरे मामले की विस्तृत जांच के आदेश भी दिए गए हैं। रेलवे यह भी पता लगा रहा है कि कूपे की सजावट किसकी अनुमति से कराई गई और क्या इसमें अन्य लोगों की भी भूमिका थी।
बताया जा रहा है कि यह घटना ट्रेन संख्या 11002 बल्हारशाह–मुंबई नांदेड़ग्राम एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी कूपे से जुड़ी है। जानकारी के अनुसार, एक नवविवाहित जोड़ा इस कूपे में यात्रा कर रहा था। सोशल मीडिया पर सामने आए दावों के मुताबिक ऑनलाइन बुकिंग के जरिए एक डेकोरेटर को बुलाकर कूपे के अंदर फूलों और अन्य सजावटी सामग्री से विशेष व्यवस्था कराई गई। हालांकि रेलवे ने इस पूरे घटनाक्रम को सुरक्षा और संचालन संबंधी नियमों के खिलाफ माना है।
इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर ट्रेन का कूपा कितना निजी होता है। कई लोगों का मानना है कि फर्स्ट एसी का बंद कूपा पूरी तरह व्यक्तिगत स्थान होता है, जबकि रेलवे के नियम इससे अलग तस्वीर पेश करते हैं। दरअसल, यात्रियों को कूपे का उपयोग केवल यात्रा के दौरान सुविधा और सीमित गोपनीयता के लिए दिया जाता है। इसका उद्देश्य आरामदायक सफर उपलब्ध कराना है, न कि उसे निजी संपत्ति या होटल के कमरे की तरह इस्तेमाल करने की अनुमति देना।
रेलवे के नियमों के अनुसार, टिकटधारक को उसके आरक्षण के अनुरूप सीट, बर्थ या कूपे का उपयोग करने का अधिकार मिलता है। लेकिन यह अधिकार सीमित होता है। कूपे का दरवाजा बंद किया जा सकता है ताकि यात्री आराम से यात्रा कर सकें, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर टीटीई, रेलवे कर्मचारी, आरपीएफ, सफाई कर्मचारी या अन्य अधिकृत अधिकारी के कहने पर उसे खोलना अनिवार्य होता है। यानी कूपे पूरी तरह निजी क्षेत्र नहीं माना जाता।
यही कारण है कि रेलवे के अंदर सार्वजनिक शालीनता और सुरक्षा से जुड़े सभी नियम लागू रहते हैं। यदि कोई यात्री ऐसी गतिविधि करता है जिससे अन्य यात्रियों को असुविधा हो, सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो या सार्वजनिक मर्यादा का उल्लंघन होता दिखाई दे, तो रेलवे कार्रवाई कर सकता है। इस मामले में केवल कूपे की सजावट ही नहीं, बल्कि बिना अनुमति बाहरी व्यक्ति के ट्रेन के अंदर प्रवेश और रेलवे की व्यवस्था में बदलाव को भी जांच का विषय बनाया गया है।
रेलवे प्रशासन का कहना है कि ट्रेन के डिब्बों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन या अतिरिक्त सजावट बिना अनुमति नहीं कराई जा सकती। यदि कोई व्यक्ति स्वयं या किसी बाहरी एजेंसी की मदद से रेलवे की संपत्ति में बदलाव करता है, तो यह नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है। ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई दोनों संभव हैं।
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि कोई नवविवाहित जोड़ा ट्रेन के कूपे में अपना निजी समय बिताना चाहता है, तो क्या इसे हनीमून मनाना माना जाएगा और क्या यह कानून का उल्लंघन है। विशेषज्ञों के अनुसार, रेलवे के नियमों में “हनीमून” शब्द को लेकर कोई अलग या विशेष प्रावधान मौजूद नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यात्री सार्वजनिक स्थान पर किसी भी प्रकार की गतिविधि करने के लिए स्वतंत्र हैं।
भारतीय कानून दो वयस्कों को आपसी सहमति से संबंध बनाने की अनुमति देता है, लेकिन यह अधिकार निजी स्थान तक सीमित माना जाता है। ट्रेन का कूपा, चाहे वह बंद ही क्यों न हो, कानूनी रूप से सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए वहां होने वाली किसी भी ऐसी गतिविधि, जिसे सार्वजनिक अश्लीलता माना जाए या जिससे किसी अन्य व्यक्ति को आपत्ति हो, उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
यदि किसी यात्री की शिकायत मिलती है या किसी घटना का वीडियो सामने आता है और उसमें सार्वजनिक शालीनता का उल्लंघन दिखाई देता है, तो रेलवे अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है। यह कार्रवाई पूरी तरह मामले की परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और जांच पर निर्भर करती है।
रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 145 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति ट्रेन या रेलवे परिसर में अशोभनीय व्यवहार करता है, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करता है या ऐसा आचरण करता है जिससे अन्य यात्रियों को परेशानी होती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। इस प्रावधान के तहत संबंधित व्यक्ति को ट्रेन से उतारा जा सकता है। इसके अलावा छह महीने तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान भी मौजूद है।
इसी तरह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296 सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकतों से संबंधित मामलों में लागू हो सकती है। यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति की गतिविधि सार्वजनिक मर्यादा के खिलाफ थी, तो तीन महीने तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान किया जा सकता है। हालांकि अंतिम फैसला अदालत उपलब्ध साक्ष्यों और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए करती है।
इससे पहले भी सार्वजनिक परिवहन में इस तरह के मामलों पर कार्रवाई हो चुकी है। पिछले वर्ष नवंबर में नमो भारत ट्रेन के प्रीमियम कोच का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। उस मामले में भी पुलिस ने सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता से संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। हालांकि बताया गया था कि कोच लगभग खाली था, फिर भी कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने यह माना कि ट्रेन का डिब्बा सार्वजनिक स्थान का हिस्सा है और वहां लागू नियमों का पालन करना सभी यात्रियों की जिम्मेदारी है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय कानून में “अश्लीलता” की कोई एक निश्चित और सार्वभौमिक परिभाषा नहीं दी गई है। इसलिए प्रत्येक मामले में अदालत यह देखती है कि घटना की परिस्थितियां क्या थीं, उससे अन्य लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा, किसी ने शिकायत की या नहीं और उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं। यही कारण है कि हर मामले में कार्रवाई का स्वरूप अलग हो सकता है।
रेलवे प्रशासन भी लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि यात्रियों को दी जाने वाली गोपनीयता केवल आरामदायक यात्रा के उद्देश्य से है। इसका मतलब यह नहीं कि रेलवे के डिब्बे निजी संपत्ति बन जाते हैं या वहां सार्वजनिक नियम लागू नहीं होते। ट्रेन देश की सार्वजनिक संपत्ति है और उसमें यात्रा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अन्य यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और सामाजिक मर्यादा का सम्मान करने के लिए बाध्य है।
फिलहाल वायरल कूपे सजावट मामले की जांच जारी है। रेलवे यह पता लगाने में जुटा है कि बिना अनुमति सजावट कैसे कराई गई, सुरक्षा व्यवस्था में किस स्तर पर चूक हुई और नियमों का उल्लंघन करने वालों की क्या जिम्मेदारी बनती है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि संबंधित अधिकारियों, डेकोरेटर या यात्रियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।
पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की निजता और सार्वजनिक शालीनता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रियों को गोपनीयता का सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन यह अधिकार कानून और रेलवे नियमों की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही लागू होता है। ऐसे में ट्रेन के कूपे को होटल का निजी कमरा मानकर मनमर्जी करना न केवल नियमों के विपरीत हो सकता है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार कानूनी कार्रवाई की वजह भी बन सकता है।




