पुरी की विश्वप्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का इंतजार देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं। इस बार यह पावन यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार से प्रारंभ होने जा रही है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर निकलने वाली इस भव्य यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक नगर भ्रमण के लिए प्रस्थान करते हैं। इस दौरान तीनों देवताओं के लिए अलग-अलग विशाल रथ तैयार किए जाते हैं, जिन्हें लाखों श्रद्धालु मोटी रस्सियों की सहायता से खींचते हैं। मान्यता है कि इस सेवा में शामिल होने वाले भक्तों पर भगवान विशेष कृपा बरसाते हैं और उनके जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
रथ यात्रा के दौरान पुरी की सड़कों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। इतनी अधिक भीड़ होती है कि कई बार दूर से केवल तीनों विशाल रथ ही दिखाई देते हैं। ऐसे में अधिकांश लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर किस रथ पर भगवान जगन्नाथ विराजमान हैं, किस पर उनके बड़े भाई बलभद्र और किस रथ पर बहन सुभद्रा विराजती हैं। हालांकि तीनों रथों की पहचान के लिए उनके रंग, आकार, पहियों की संख्या और उन पर लगे ध्वज अलग-अलग होते हैं। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर दूर से भी आसानी से यह जाना जा सकता है कि कौन-सा रथ किस देवता का है।
भगवान जगन्नाथ का रथ तीनों में सबसे विशाल और आकर्षक माना जाता है। इसे नंदीघोष के नाम से जाना जाता है। कई स्थानों पर इसे गरुड़ध्वज भी कहा जाता है। इस रथ का प्रमुख रंग लाल और पीला होता है, जो दूर से ही आसानी से पहचान में आ जाता है। इसके ऊपर त्रिलोक्यमोहिनी नामक ध्वज फहराया जाता है और रथ पर हनुमान जी का प्रतीक भी स्थापित रहता है। नंदीघोष रथ में कुल 16 विशाल पहिए लगाए जाते हैं, जो इसे अन्य दोनों रथों से अलग पहचान देते हैं। जब भगवान जगन्नाथ इस रथ पर सवार होकर श्रीमंदिर से निकलते हैं तो श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए घंटों पहले से मार्ग के दोनों ओर खड़े होकर इंतजार करते हैं। लाखों लोगों की भीड़ के बीच लाल और पीले रंग का सबसे बड़ा रथ दिखाई दे तो समझ लेना चाहिए कि उसी पर भगवान जगन्नाथ विराजमान हैं।
भगवान बलभद्र का रथ आकार में भगवान जगन्नाथ के रथ से थोड़ा छोटा होता है, लेकिन उसकी भव्यता भी कम नहीं होती। इस रथ का नाम तालध्वज है। इसका रंग लाल और हरा होता है, जिससे इसकी अलग पहचान बनती है। तालध्वज रथ में कुल 14 पहिए लगाए जाते हैं। इसके ऊपर उनानी ध्वज लगाया जाता है, जिस पर ताड़ के वृक्ष का प्रतीक अंकित होता है। भगवान बलभद्र के भक्त इस रथ के दर्शन को अत्यंत शुभ मानते हैं। लाल और हरे रंग का यह विशाल रथ जैसे ही यात्रा मार्ग पर आगे बढ़ता है, श्रद्धालु जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना देते हैं।
देवी सुभद्रा का रथ तीनों में सबसे छोटा होता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से उसका महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं माना जाता। इस रथ को दर्पदलन कहा जाता है। इसका रंग लाल और काला होता है, जिससे यह अन्य दोनों रथों से अलग नजर आता है। इसमें कुल 12 पहिए लगाए जाते हैं। दर्पदलन रथ के ऊपर नदंबिका ध्वज फहराया जाता है, जिस पर कमल का प्रतीक बना होता है। देवी सुभद्रा अपने इसी रथ पर सवार होकर अपने दोनों भाइयों के साथ गुंडिचा मंदिर तक जाती हैं। श्रद्धालु लाल और काले रंग के इस अपेक्षाकृत छोटे रथ को देखकर आसानी से पहचान सकते हैं कि यह देवी सुभद्रा का रथ है।
रथ यात्रा के दौरान इन तीनों रथों का निर्माण विशेष धार्मिक परंपराओं और निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाता है। हर वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं और उनकी ऊंचाई, आकार, पहियों की संख्या, रंग तथा ध्वज की परंपरा सदियों से लगभग एक जैसी चली आ रही है। यही कारण है कि इनकी पहचान केवल रंगों से ही नहीं बल्कि उनकी बनावट और धार्मिक प्रतीकों से भी की जाती है।
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर्व में शामिल होने के लिए देश के अलग-अलग राज्यों के अलावा विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान पूरा शहर भक्ति, उत्साह और श्रद्धा के रंग में रंग जाता है। सड़कों पर हर ओर भगवान जगन्नाथ के जयकारे सुनाई देते हैं और भक्त अपने आराध्य के दर्शन के लिए घंटों तक इंतजार करते हैं।
मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ वर्ष में एक बार अपने भक्तों के बीच स्वयं आने के लिए श्रीमंदिर से बाहर निकलते हैं। जो लोग किसी कारणवश मंदिर के गर्भगृह में दर्शन नहीं कर पाते, उन्हें रथ यात्रा के दौरान भगवान के साक्षात दर्शन का अवसर मिलता है। यही वजह है कि इस यात्रा का महत्व अत्यंत विशेष माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि रथ यात्रा में भगवान के दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-शांति का वास होता है।
इस विशाल आयोजन की एक विशेष परंपरा रथ खींचने की भी है। मोटी और मजबूत रस्सियों के माध्यम से हजारों श्रद्धालु मिलकर तीनों रथों को खींचते हैं। इसे अत्यंत पुण्यदायी सेवा माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि भगवान के रथ को खींचने वाले भक्तों को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन की अनेक बाधाएं दूर हो जाती हैं। इसी कारण हर वर्ष लाखों लोग इस सेवा में भाग लेने की इच्छा रखते हैं।
इस बार रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी। पहले दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करेंगे। वहां कुछ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे। इसके बाद 24 जुलाई, शुक्रवार को बहुदा यात्रा यानी वापसी की रथ यात्रा निकाली जाएगी। इस दिन तीनों देवता अपने रथों पर सवार होकर पुनः श्रीमंदिर लौटेंगे। वापसी यात्रा भी उतनी ही भव्य होती है जितनी कि मुख्य रथ यात्रा।
रथ यात्रा के अंतिम चरण में 27 जुलाई, सोमवार को नीलाद्री बीजे की परंपरा निभाई जाएगी। इसी अनुष्ठान के साथ भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा पुनः श्रीमंदिर में विराजमान होंगे और वार्षिक रथ यात्रा का विधिवत समापन हो जाएगा। इस दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर अंतिम दर्शन करते हैं और भगवान से सुख, समृद्धि तथा मंगलमय जीवन की कामना करते हैं।
यदि आप भी इस वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, तो तीनों रथों की पहचान पहले से जान लेना आपके लिए उपयोगी रहेगा। सबसे बड़ा लाल-पीला नंदीघोष भगवान जगन्नाथ का, लाल-हरा तालध्वज भगवान बलभद्र का और लाल-काला दर्पदलन देवी सुभद्रा का रथ होता है। भीड़ कितनी भी अधिक क्यों न हो, इन रंगों, पहियों की संख्या और ध्वज के आधार पर दूर से ही तीनों दिव्य रथों की पहचान की जा सकती है और श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन कर आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर सकते हैं।




