देश में महंगाई का दबाव एक बार फिर तेज होता दिखाई दे रहा है। जून महीने में थोक स्तर पर महंगाई (Wholesale Price Index-WPI) बढ़कर 9.87 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो करीब 44 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इससे पहले सितंबर 2022 में थोक महंगाई 10.70 प्रतिशत दर्ज की गई थी। मई महीने में यह दर 9.68 प्रतिशत थी, यानी एक महीने के भीतर इसमें और बढ़ोतरी देखने को मिली है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि खाने-पीने की वस्तुओं और रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामानों की कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है।
महंगाई में इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों का ऊपर जाना माना जा रहा है। इसके साथ ही आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ने से बाजार पर भी असर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रहती है और पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता, तो आने वाले महीनों में कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है। खासतौर पर अमेरिका और ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
थोक महंगाई के साथ-साथ खुदरा महंगाई भी लगातार बढ़ रही है। जून में खुदरा महंगाई (Consumer Price Index-CPI) बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि मई में यह 3.93 प्रतिशत थी। जनवरी में खुदरा महंगाई केवल 2.74 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि बीते छह महीनों से लगातार महंगाई में इजाफा दर्ज किया जा रहा है। खुदरा महंगाई का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है क्योंकि यह उन कीमतों को दर्शाती है जो उपभोक्ता बाजार में ग्राहकों को चुकानी पड़ती हैं।
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार जून महीने में सबसे ज्यादा असर प्राइमरी आर्टिकल्स यानी रोजमर्रा की जरूरी वस्तुओं की कीमतों में देखने को मिला। इस श्रेणी की महंगाई दर मई के 4.99 प्रतिशत से बढ़कर जून में 7.00 प्रतिशत हो गई। यह संकेत देता है कि दैनिक उपयोग की वस्तुएं पहले की तुलना में अधिक महंगी हो चुकी हैं।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई है। फूड इंडेक्स के तहत महंगाई मई में 4.49 प्रतिशत थी, जो जून में बढ़कर 6.14 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसका असर सब्जियों, अनाज, दालों और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। बाजार में कई आवश्यक खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ने से आम परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो सकता है।
हालांकि ईंधन और बिजली से जुड़े क्षेत्र में कुछ राहत देखने को मिली है। फ्यूल एंड पावर श्रेणी की थोक महंगाई मई के 30.33 प्रतिशत से घटकर जून में 27.41 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद यह स्तर अभी भी काफी ऊंचा है और ऊर्जा लागत का असर विभिन्न उद्योगों की उत्पादन लागत पर बना हुआ है। दूसरी ओर, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में महंगाई की दर में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह 7.48 प्रतिशत पर स्थिर रही।
थोक महंगाई सूचकांक मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्सों में बांटा जाता है। इनमें सबसे बड़ा हिस्सा मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का है, जिसका वेटेज 64.23 प्रतिशत है। इसके बाद प्राइमरी आर्टिकल्स की हिस्सेदारी 22.62 प्रतिशत और फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15 प्रतिशत है। प्राइमरी आर्टिकल्स के अंतर्गत खाद्य सामग्री, गैर-खाद्य कृषि उत्पाद, खनिज और कच्चा पेट्रोलियम जैसे उत्पाद शामिल किए जाते हैं।
फूड आर्टिकल्स में अनाज, फल, सब्जियां, दालें और अन्य खाद्य वस्तुएं आती हैं। वहीं नॉन-फूड आर्टिकल्स में तिलहन और अन्य कृषि उत्पाद शामिल होते हैं। इसके अलावा खनिज और कच्चे पेट्रोलियम जैसी वस्तुएं भी प्राइमरी आर्टिकल्स का हिस्सा होती हैं। इन सभी श्रेणियों में कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर कुल थोक महंगाई पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है तो इसका प्रभाव उद्योगों की लागत पर पड़ता है। उत्पादन लागत बढ़ने के बाद कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर डालती हैं। ऐसे में कुछ समय बाद खुदरा महंगाई भी बढ़ने लगती है। यही कारण है कि थोक महंगाई को अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
सरकार के पास थोक महंगाई को नियंत्रित करने के सीमित विकल्प होते हैं। कई बार ईंधन पर लगने वाले करों में कटौती कर कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। अतीत में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर राहत देने का प्रयास किया था। हालांकि करों में कटौती की भी एक सीमा होती है और लगातार ऐसा करना सरकारी राजस्व पर असर डाल सकता है।
थोक महंगाई में मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर और अन्य औद्योगिक उत्पादों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इन क्षेत्रों में लागत बढ़ने का असर निर्माण, ऑटोमोबाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य उद्योगों पर भी दिखाई देता है। यही वजह है कि उद्योग जगत थोक महंगाई के आंकड़ों पर विशेष नजर रखता है।
दूसरी ओर खुदरा महंगाई में तेजी का प्रमुख कारण खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें बताई जा रही हैं। जून महीने के दौरान आलू, अदरक समेत कई जरूरी खाद्य उत्पादों की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई। इससे उपभोक्ताओं को रोजमर्रा की खरीदारी पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ रहा है। लगातार छह महीने तक खुदरा महंगाई बढ़ना इस बात का संकेत है कि बाजार में कीमतों का दबाव अभी पूरी तरह कम नहीं हुआ है।
महंगाई को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में दो अलग-अलग सूचकांकों के जरिए कीमतों का आकलन किया जाता है। पहला है कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI), जिसे खुदरा महंगाई कहा जाता है। यह उन कीमतों पर आधारित होता है जो आम उपभोक्ता बाजार से सामान खरीदते समय चुकाते हैं। दूसरा है होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI), जो थोक बाजार में कारोबारियों के बीच होने वाले लेनदेन की कीमतों को दर्शाता है।
दोनों सूचकांक अर्थव्यवस्था की अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं। यदि थोक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो कुछ समय बाद उसका असर खुदरा बाजार में भी देखने को मिल सकता है। वहीं खुदरा महंगाई सीधे तौर पर आम नागरिकों के घरेलू खर्च और क्रय शक्ति को प्रभावित करती है।
रिटेल महंगाई की गणना में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है। इसके अलावा आवास, ईंधन, बिजली, कपड़े, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, परिवहन और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं को भी इसमें शामिल किया जाता है। दूसरी ओर थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों का योगदान सबसे ज्यादा होता है, जिसके कारण उद्योगों की लागत और उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों का प्रभाव इसमें अधिक दिखाई देता है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में खाद्य आपूर्ति सामान्य रहती है और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण संभव है। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां प्रतिकूल रहीं या आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई, तो कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। फिलहाल जून के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि देश में महंगाई का दबाव बना हुआ है और खाद्य वस्तुओं से लेकर दैनिक उपयोग के सामान तक, कई श्रेणियों में उपभोक्ताओं को पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।




