हिमाचल के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का संकट गहराया, 4,956 पद खाली; पीजीटी में सबसे ज्यादा मार

हिमाचल के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का संकट गहराया, 4,956 पद खाली; पीजीटी में सबसे ज्यादा मार

शिमला। हिमाचल प्रदेश सरकार प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता सुधार और सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के दावे कर रही है, लेकिन विभागीय आंकड़े स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी की दूसरी तस्वीर सामने रख रहे हैं। राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के विभिन्न कैडर के हजारों पद लंबे समय से खाली हैं। खास तौर पर टीजीटी, प्रवक्ता और प्रधानाचार्य के पदों की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। इन तीन प्रमुख कैडर में ही कुल 4,956 पद रिक्त बताए गए हैं।

शिक्षा विभाग में शिक्षकों की कमी लगभग सभी प्रमुख श्रेणियों में दिखाई दे रही है। प्राथमिक स्तर पर जेबीटी शिक्षकों की उपलब्धता सुधारने के लिए सरकार ने युक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू की है, जिसके तहत शिक्षकों की जरूरत और विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर तैनाती को व्यवस्थित करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर टीजीटी, पीजीटी और प्रधानाचार्यों की रिक्तियों का आंकड़ा यह बताता है कि समस्या केवल प्राथमिक कक्षाओं तक सीमित नहीं है।

प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक यानी टीजीटी कैडर में कुल 16,730 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 15,078 पदों पर शिक्षक तैनात हैं, जबकि बड़ी संख्या में पद अभी भी खाली हैं। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के अनुसार टीजीटी के 1,185 पद रिक्त हैं। विषयवार स्थिति देखें तो आर्ट्स स्ट्रीम में सबसे ज्यादा कमी देखने को मिल रही है।

टीजीटी आर्ट्स के कुल 8,493 स्वीकृत पदों में से 653 पद खाली हैं। इसका सीधा असर सरकारी स्कूलों में सामाजिक विज्ञान, भाषा और मानविकी से जुड़े विषयों की पढ़ाई पर पड़ सकता है। कई स्कूलों में विद्यार्थियों को नियमित विषय अध्यापन उपलब्ध कराने के लिए मौजूदा शिक्षकों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी डालनी पड़ सकती है।

टीजीटी नॉन मेडिकल स्ट्रीम में भी शिक्षकों की कमी बनी हुई है। इस स्ट्रीम में कुल 5,170 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 298 पद रिक्त हैं। वहीं टीजीटी मेडिकल के कुल 3,067 स्वीकृत पदों में से 234 पद खाली हैं। इससे स्पष्ट है कि विज्ञान और गणित जैसे महत्वपूर्ण विषयों में भी शिक्षकों की उपलब्धता पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो पाई है।

सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए केवल विद्यार्थियों और शिक्षकों के अनुपात को देखना पर्याप्त नहीं है। किसी स्कूल में पर्याप्त शिक्षक संख्या होने के बावजूद यदि किसी खास विषय का शिक्षक उपलब्ध नहीं है तो विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि विषयवार रिक्तियों को लेकर शिक्षक संगठन भी लगातार सरकार से जल्द भर्ती और पदोन्नति प्रक्रिया पूरी करने की मांग कर रहे हैं।

टीजीटी के बाद स्कूल प्रधानाचार्यों के पदों की स्थिति भी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। प्रदेश में स्कूल प्रधानाचार्यों के 393 पद रिक्त हैं। जिला स्तर पर देखें तो सबसे अधिक रिक्तियां शिमला में हैं, जहां 91 प्रधानाचार्य पद खाली बताए गए हैं। इसके बाद सिरमौर में 54 और चंबा में 46 पद रिक्त हैं। मंडी में 28 और कांगड़ा में 19 प्रधानाचार्य पद खाली हैं।

कुल्लू में प्रधानाचार्यों के 17 पद रिक्त हैं, जबकि जनजातीय जिला लाहुल-स्पीति में 16 पद खाली हैं। किन्नौर में 12 पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं। सोलन, बिलासपुर और हमीरपुर में दो-दो तथा ऊना में एक प्रधानाचार्य पद रिक्त बताया गया है। इसके अलावा 112 पदों से संबंधित अन्य विवरण भी विभागीय जानकारी में दर्ज हैं।

प्रधानाचार्य किसी भी स्कूल की शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। प्रधानाचार्य का पद लंबे समय तक खाली रहने पर स्कूल के प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ शिक्षकों की निगरानी, विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ सकता है। कई मामलों में वरिष्ठ शिक्षकों को अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाना पड़ता है, जिससे उनकी अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी प्रभावित हो सकती हैं।

सबसे गंभीर स्थिति प्रवक्ता यानी पीजीटी कैडर में सामने आ रही है। शिक्षा विभाग में पीजीटी के 3,378 पद खाली बताए गए हैं। वरिष्ठ माध्यमिक कक्षाओं में विद्यार्थियों की बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिहाज से इन पदों का महत्व और बढ़ जाता है। विषय विशेषज्ञों की कमी का सीधा असर विद्यार्थियों की तैयारी और स्कूलों के अकादमिक प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

पीजीटी कैडर में सबसे अधिक संकट इन्फॉर्मेटिक्स प्रैक्टिस यानी आईटी से जुड़े विषय में है। इस विषय के 984 पद रिक्त हैं। मौजूदा दौर में स्कूल शिक्षा में कंप्यूटर, डिजिटल लर्निंग और सूचना प्रौद्योगिकी का महत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में आईटी विषय के इतने बड़े पैमाने पर पद खाली होना शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती माना जा सकता है।

वाणिज्य विषय में पीजीटी के 330 पद खाली हैं, जबकि राजनीति शास्त्र के 321 पद रिक्त हैं। हिंदी विषय में 285 और अंग्रेजी में 271 पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं। इतिहास के 245 पद खाली हैं। अर्थशास्त्र में 211, गणित में 142, जीवविज्ञान में 135, रसायन विज्ञान में 132 और भौतिक विज्ञान में 100 पद रिक्त बताए गए हैं।

इसके अलावा संस्कृत के 84, भूगोल के 52, समाजशास्त्र के 33 और संगीत के 31 पद खाली हैं। गृह विज्ञान के 10, लोक प्रशासन के नौ और मनोविज्ञान के तीन पद भी रिक्त हैं। विषयवार आंकड़ों से पता चलता है कि भाषा, सामाजिक विज्ञान, कॉमर्स, विज्ञान और तकनीकी विषयों में शिक्षकों की जरूरत पूरी तरह पूरी नहीं हुई है।

एक तरफ शिक्षा विभाग में हजारों पद खाली हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर से छात्र-शिक्षक अनुपात को लेकर राज्य की स्थिति बेहतर बताई जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश में छात्र-शिक्षक अनुपात यानी पीटीआर 14 है, जबकि देश का औसत पीटीआर 24 बताया गया है। यानी कुल विद्यार्थियों की तुलना में उपलब्ध शिक्षकों की संख्या के आधार पर हिमाचल की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है।

हालांकि, शिक्षक संगठनों का मानना है कि केवल पीटीआर के आंकड़े से शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आती। विषयवार शिक्षक उपलब्धता, स्कूल स्तर पर रिक्तियां और दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षकों की तैनाती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में शिक्षक पर्याप्त हैं, लेकिन किसी महत्वपूर्ण विषय का पद खाली है, तो उस विषय की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।

शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए सरकार की ओर से विभिन्न स्तरों पर प्रक्रियाएं चल रही हैं। जेबीटी शिक्षकों की उपलब्धता को संतुलित करने के लिए युक्तिकरण की प्रक्रिया अपनाई गई है। इसका उद्देश्य उन स्कूलों में शिक्षकों की तैनाती करना है जहां विद्यार्थियों की संख्या और जरूरत के अनुसार अधिक शिक्षकों की आवश्यकता है। लेकिन माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर रिक्त पदों को भरने के लिए भर्ती के साथ-साथ पदोन्नति भी महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है।

टीजीटी कला संघ के महासचिव विजय हीर ने सरकार से मांग की है कि शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए। उनका कहना है कि पदोन्नति के माध्यम से बड़ी संख्या में खाली पद भरे जा सकते हैं। उन्होंने शिक्षकों को लंबे समय तक पूल में रखने के बजाय जरूरत वाले स्कूलों में तैनात करने की मांग भी उठाई है।

विजय हीर के अनुसार, विभाग में उपलब्ध शिक्षकों का प्रभावी इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि पात्र शिक्षक पदोन्नति के इंतजार में हैं और दूसरी ओर स्कूलों में पद खाली पड़े हैं तो इस स्थिति को लंबे समय तक जारी रखना विद्यार्थियों के हित में नहीं है। उनका कहना है कि पदोन्नति प्रक्रिया पूरी होने के बाद शिक्षकों की उपलब्धता में सुधार आएगा और कई स्कूलों में चल रही कमी को दूर किया जा सकेगा।

शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक किसी भी सुधार कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, आधुनिक पाठ्यक्रम और नई तकनीक उपलब्ध कराने के साथ पर्याप्त और विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति भी जरूरी है। सरकारी स्कूलों में यदि लंबे समय तक पद खाली रहते हैं तो इससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के प्रयासों को अपेक्षित परिणाम हासिल करने में कठिनाई हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में यह समस्या और चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कई स्कूल दुर्गम और दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित हैं। ऐसे इलाकों में शिक्षकों की उपलब्धता और नियमित तैनाती अपने आप में बड़ा प्रशासनिक मुद्दा है। कई बार शिक्षक उपलब्ध होने के बावजूद विषयवार असंतुलन या तैनाती व्यवस्था के कारण स्कूलों में जरूरत के मुताबिक शिक्षक नहीं पहुंच पाते।

ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे रिक्त पदों को भरने के लिए भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया तेज करनी होगी, वहीं दूसरी ओर पहले से कार्यरत शिक्षकों की तैनाती को भी जरूरत के अनुसार व्यवस्थित करना होगा। जेबीटी स्तर पर शुरू की गई युक्तिकरण प्रक्रिया को इसी दिशा में एक प्रयास माना जा रहा है, लेकिन टीजीटी और पीजीटी स्तर पर बड़ी रिक्तियों को देखते हुए व्यापक कदम उठाने की आवश्यकता बनी हुई है।

खासकर पीजीटी के 3,378 रिक्त पद यह संकेत देते हैं कि वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा स्तर पर विशेषज्ञ शिक्षकों की भारी जरूरत है। वहीं 393 प्रधानाचार्य पदों की रिक्ति प्रशासनिक नेतृत्व की कमी को दर्शाती है। टीजीटी के 1,185 खाली पदों के साथ इन तीनों कैडर की कुल 4,956 रिक्तियां शिक्षा विभाग के सामने मानव संसाधन की बड़ी चुनौती पेश कर रही हैं।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार इन रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती, पदोन्नति और युक्तिकरण की प्रक्रियाओं को किस गति से आगे बढ़ाती है। छात्र-शिक्षक अनुपात में हिमाचल का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत से बेहतर होने के बावजूद विषयवार और स्कूलवार शिक्षकों की कमी दूर करना जरूरी है। शिक्षक संगठनों की मांग है कि सरकार उपलब्ध मानव संसाधन का बेहतर उपयोग करने के साथ लंबे समय से खाली पड़े पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरे, ताकि सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।