हिमाचल के जंगलों के लिए केंद्र से बड़ी सौगात, वन संरक्षण योजनाओं पर खर्च होंगे 32.24 करोड़ रुपये

हिमाचल के जंगलों के लिए केंद्र से बड़ी सौगात, वन संरक्षण योजनाओं पर खर्च होंगे 32.24 करोड़ रुपये

शिमला। हिमाचल प्रदेश में वन क्षेत्रों के संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने और वन्यजीवों की सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं को अब अतिरिक्त वित्तीय मजबूती मिलने जा रही है। केंद्र सरकार ने प्रदेश को कैंपा (CAMPA) फंड के तहत 32.24 करोड़ रुपये की राशि जारी करने को मंजूरी प्रदान कर दी है। यह धनराशि राज्य में जंगलों, वन्यजीवों और वन भूमि से जुड़े विभिन्न संरक्षण कार्यों पर खर्च की जाएगी। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस संबंध में हिमाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र भेजकर राशि जारी करने की प्रक्रिया से अवगत कराया है।

केंद्र की ओर से मंजूर की गई यह राशि वर्ष 2025 के दौरान कैंपा खाते में जमा कराई गई रकम के आधार पर राज्य को मिलने वाले हिस्से के रूप में जारी की जा रही है। दरअसल, हिमाचल प्रदेश में विभिन्न विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए वन भूमि का इस्तेमाल करने वाली उपयोगकर्ता एजेंसियों को निर्धारित पर्यावरणीय और वन संबंधी दायित्वों के तहत कैंपा खाते में राशि जमा करवानी होती है। इसी प्रक्रिया के तहत 1 जनवरी से 31 अक्टूबर 2025 के बीच प्रदेश के कैंपा खाते में कुल 35.82 करोड़ रुपये जमा किए गए थे।

कैंपा के निर्धारित वित्तीय प्रावधानों के अनुसार इस राशि का एक हिस्सा राष्ट्रीय स्तर पर रखा जाता है, जबकि बड़ा हिस्सा संबंधित राज्य को उपलब्ध कराया जाता है। नियमों के तहत जमा रकम का 10 प्रतिशत राष्ट्रीय निधि में जाता है, जबकि 90 प्रतिशत राशि राज्य निधि के हिस्से में आती है। इसी व्यवस्था के आधार पर हिमाचल प्रदेश को 35.82 करोड़ रुपये में से 90 प्रतिशत के बराबर 32.24 करोड़ रुपये का राज्य हिस्सा जारी करने की मंजूरी दी गई है।

केंद्र से मिलने वाली इस राशि का इस्तेमाल सामान्य विकास कार्यों में नहीं, बल्कि वन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े निर्धारित कार्यों में किया जाएगा। कैंपा फंड का उद्देश्य उन वन क्षेत्रों की पर्यावरणीय क्षति की भरपाई करना है, जिनका उपयोग विभिन्न परियोजनाओं के लिए किया गया है। इसके तहत पौधरोपण, प्रतिपूरक वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्रों के उपचार और वन प्रबंधन जैसी गतिविधियों को वित्तीय सहायता दी जाती है।

मंजूर की गई राशि में सबसे बड़ा हिस्सा वन भूमि के नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) के लिए निर्धारित किया गया है। इसके लिए 14.99 करोड़ रुपये रखे गए हैं। एनपीवी के माध्यम से वन भूमि के उपयोग से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और उससे जुड़े दायित्वों की भरपाई के लिए धन उपलब्ध कराया जाता है। हिमाचल जैसे पहाड़ी और वन बहुल राज्य के लिए यह मद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के साथ पर्यावरणीय प्रभावों को संतुलित करना लगातार बड़ी चुनौती बना हुआ है।

इसके बाद सबसे बड़ी राशि प्रतिपूरक वनीकरण के लिए निर्धारित की गई है। इस मद में 10.90 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। प्रतिपूरक वनीकरण का उद्देश्य वन भूमि के उपयोग से होने वाली वन क्षति की भरपाई के लिए उपयुक्त क्षेत्रों में नए पौधे लगाना और हरित क्षेत्र विकसित करना है। हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए इस राशि का इस्तेमाल प्राकृतिक वन क्षेत्रों की बहाली और नए पौधरोपण को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

कैंपा राशि में 1.87 करोड़ रुपये कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट प्लान के लिए रखे गए हैं। जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण का सीधा संबंध मिट्टी, पानी और वन क्षेत्र की सुरक्षा से है। पहाड़ी इलाकों में बारिश और भूस्खलन के कारण मिट्टी का कटाव, जल स्रोतों पर दबाव और प्राकृतिक ढलानों को नुकसान जैसी समस्याएं सामने आती रहती हैं। ऐसे क्षेत्रों में उपचारात्मक कार्यों के जरिए जल संरक्षण, मिट्टी कटाव रोकने और वनस्पति को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से भी यह राशि महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार ने इंटीग्रेटेड वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट प्लान के लिए 2.37 करोड़ रुपये निर्धारित किए हैं। इस धनराशि का उपयोग वन्यजीवों के आवास, उनके संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने से जुड़े कार्यों में किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में विभिन्न प्रकार के वन्यजीव और जैव विविधता वाले क्षेत्र मौजूद हैं। ऐसे में उनके प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखना राज्य के पर्यावरणीय संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।

मंजूर की गई राशि में 2.09 करोड़ रुपये ब्याज मद में भी शामिल हैं। यानी कैंपा खाते में जमा रकम से अर्जित ब्याज का हिस्सा भी राज्य को उपलब्ध कराया जा रहा है। केंद्र ने हिमाचल सरकार को निर्देश दिया है कि मंजूर की गई पूरी राशि को तत्काल राज्य के समर्पित स्टेट प्रतिपूरक वनीकरण फंड में जमा किया जाए।

केंद्र की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह धनराशि सार्वजनिक खाते में नॉन-लैप्सेबल रहेगी। इसका मतलब है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के साथ इस राशि की उपयोगिता खत्म नहीं होगी और रकम स्वतः लैप्स नहीं करेगी। इससे वन विभाग को लंबी अवधि की संरक्षण योजनाएं तैयार करने और निर्धारित परियोजनाओं के लिए चरणबद्ध तरीके से धन खर्च करने में सुविधा मिलेगी।

इस फंड पर केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार वार्षिक ब्याज भी मिलेगा। इससे संरक्षण गतिविधियों के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों में आगे और वृद्धि हो सकती है। हालांकि, राशि का इस्तेमाल निर्धारित नियमों और स्वीकृत कार्ययोजनाओं के अनुसार ही करना होगा।

हिमाचल प्रदेश में वन क्षेत्र राज्य की प्राकृतिक पहचान के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। राज्य का बड़ा हिस्सा पहाड़ी भूभाग में आता है और यहां जंगल जल स्रोतों, मिट्टी संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वन भूमि से जुड़ी परियोजनाओं के लिए मिलने वाली कैंपा राशि को पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय साधन माना जाता है।

राज्य में सड़कों, बिजली परियोजनाओं, जलविद्युत योजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए कई बार वन भूमि के इस्तेमाल की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी परियोजनाओं के कारण वन क्षेत्र प्रभावित होने की स्थिति में उपयोगकर्ता एजेंसियों से निर्धारित राशि वसूल कर कैंपा खाते में जमा कराई जाती है। इसके बाद नियमानुसार राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर राशि का वितरण होता है। हिमाचल को मिलने वाली 32.24 करोड़ रुपये की राशि इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

वन विभाग के लिए इस फंड का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि राज्य में वन संरक्षण से जुड़े कई कार्य नियमित रूप से वित्तीय संसाधनों की मांग करते हैं। जंगलों में नए पौधे लगाना, पुराने वन क्षेत्रों का पुनर्जीवन, वन्यजीव आवासों का संरक्षण, जलग्रहण क्षेत्रों में सुधार, मिट्टी और नमी संरक्षण तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष वाले क्षेत्रों में प्रबंधन जैसी गतिविधियों के लिए लगातार निवेश की जरूरत होती है।

कैंपा राशि के माध्यम से होने वाले पौधरोपण और प्रतिपूरक वनीकरण से केवल वन क्षेत्र बढ़ाने में ही मदद नहीं मिलेगी, बल्कि इससे भविष्य में जल स्रोतों के संरक्षण, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और स्थानीय पारिस्थितिकी को मजबूत करने में भी लाभ मिल सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों का मजबूत होना भूस्खलन और मिट्टी कटाव जैसी प्राकृतिक समस्याओं को नियंत्रित करने में भी सहायक माना जाता है।

वन्यजीव प्रबंधन के लिए निर्धारित 2.37 करोड़ रुपये का उपयोग जैव विविधता संरक्षण की दिशा में भी अहम माना जा रहा है। हिमाचल में कई संरक्षित वन क्षेत्र और वन्यजीव आवास हैं, जहां विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए लगातार निगरानी और प्रबंधन की जरूरत रहती है। मानव बस्तियों के विस्तार के कारण वन्यजीवों और लोगों के बीच टकराव की घटनाएं भी कई क्षेत्रों में चिंता का विषय बनी रहती हैं। ऐसे में एकीकृत वन्यजीव प्रबंधन योजनाओं के जरिए इन चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

केंद्र की मंजूरी के बाद अब राज्य सरकार और वन विभाग के सामने इस राशि का प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी। राशि को निर्धारित मदों में खर्च करने के साथ-साथ परियोजनाओं की निगरानी और उनके परिणामों का मूल्यांकन भी महत्वपूर्ण होगा। यदि धन का उपयोग वैज्ञानिक तरीके से और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है तो इसका दीर्घकालिक लाभ हिमाचल के जंगलों और पर्यावरण को मिल सकता है।

कुल मिलाकर, केंद्र से मंजूर 32.24 करोड़ रुपये की कैंपा राशि हिमाचल प्रदेश के वन और वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता है। इसमें एनपीवी, प्रतिपूरक वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र उपचार और वन्यजीव प्रबंधन जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। राशि के नॉन-लैप्सेबल रहने और उस पर सालाना ब्याज मिलने से राज्य को दीर्घकालिक संरक्षण योजनाओं को आगे बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। अब देखना होगा कि वन विभाग इस राशि को किस तरह जमीन पर उतारता है और इससे प्रदेश के जंगलों, जल स्रोतों, जैव विविधता तथा वन्यजीवों के संरक्षण को कितना वास्तविक लाभ मिलता है।