कश्मीर में फिर लौटी धमकी की गूंज, कौन था मकबूल भट्ट और क्यों जुड़ता है 1989 के आतंक से उसका नाम?

कश्मीर में फिर लौटी धमकी की गूंज, कौन था मकबूल भट्ट और क्यों जुड़ता है 1989 के आतंक से उसका नाम?

जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को कथित तौर पर दी गई धमकी ने घाटी के उन पुराने जख्मों को फिर कुरेद दिया है, जिन्हें 1989-90 के आतंकवाद और उसके बाद हुए पलायन से जोड़ा जाता है। हाल के दिनों में एक ऐसी चिट्ठी सामने आने की बात कही जा रही है, जिसमें कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने की चेतावनी दी गई है। यह पत्र यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल नाम के संगठन से जुड़ा बताया जा रहा है। इसी संगठन का नाम 31 जुलाई को दो प्रवासी मजदूरों की हत्या के मामले में भी सामने आने की खबर है।

धमकी की सूचना के बाद प्रशासन ने अपने अधीन आने वाले विभागों में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने का निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम ने सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ उन लोगों की चिंता भी बढ़ा दी है, जिन्होंने घाटी के हिंसक दौर को करीब से देखा था। सबसे ज्यादा चर्चा उस दौर की हो रही है, जब आतंकवाद ने कश्मीर की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया था।

इसी संदर्भ में एक पुराना नाम फिर चर्चा में है—मकबूल भट्ट। हालांकि यह समझना जरूरी है कि 1989-90 में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुई हिंसा के समय मकबूल भट्ट जीवित नहीं था। उसे 1984 में ही फांसी दी जा चुकी थी। फिर भी उसका नाम कश्मीर के शुरुआती उग्रवादी आंदोलन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट यानी JKLF और बाद के आतंकवादी दौर की विचारधारा से जोड़कर देखा जाता है।

मकबूल भट्ट का कश्मीर की राजनीति में प्रवेश

मोहम्मद मकबूल भट्ट कश्मीर के उन विवादित चेहरों में रहा, जिसने सशस्त्र संघर्ष और अलगाववादी राजनीति को एक अलग दिशा देने की कोशिश की। वह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख संस्थापकों में शामिल था। संगठन का मूल लक्ष्य जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान दोनों से अलग कर एक स्वतंत्र कश्मीर की स्थापना करना था।

मकबूल भट्ट का जीवन सामान्य राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। उसका नाम कई हिंसक घटनाओं और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा। भारतीय न्यायिक व्यवस्था में उसे 1966 में सीआईडी अधिकारी अमर चंद की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया। इसके बाद तत्कालीन सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू ने अगस्त 1968 में उसे मौत की सजा सुनाई।

मौत की सजा के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा। अंततः 11 फरवरी 1984 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में मकबूल भट्ट को फांसी दे दी गई।

उसकी मौत के बाद भी उसका नाम कश्मीर के उग्रवादी आंदोलन में बना रहा। उसके समर्थकों के एक वर्ग ने उसे अलगाववादी संघर्ष का प्रतीक माना, जबकि भारतीय सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था में वह गंभीर आतंकवादी और आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा व्यक्ति था।

1989 के बाद बदले घाटी के हालात

मकबूल भट्ट की फांसी और 1989-90 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन के बीच लगभग पांच साल का अंतर था। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि वह खुद 1989 के घटनाक्रम में प्रत्यक्ष रूप से शामिल था। लेकिन उसके संगठन और उससे जुड़ी विचारधारा का प्रभाव उस समय तक घाटी में मौजूद था।

1989 आते-आते जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां तेजी से बढ़ने लगी थीं। JKLF ने कई हाई-प्रोफाइल हत्याओं और हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया। इस दौरान कश्मीरी पंडित समुदाय से जुड़े कई प्रमुख लोगों को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने घाटी में रह रहे पंडित परिवारों के भीतर असुरक्षा की भावना को और गहरा कर दिया।

14 सितंबर 1989 को भाजपा नेता और प्रमुख कश्मीरी पंडित टीका लाल टपलू की हत्या कर दी गई। यह घटना घाटी में आतंकवाद के बढ़ते प्रभाव का बड़ा संकेत मानी गई। टपलू की हत्या के बाद कश्मीरी पंडित समुदाय के भीतर भय का माहौल और गहरा हुआ।

इसके कुछ ही सप्ताह बाद 4 नवंबर 1989 को श्रीनगर में सेवानिवृत्त जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। गंजू वही न्यायाधीश थे, जिन्होंने मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। इस कारण उनकी हत्या को विशेष रूप से मकबूल भट्ट से जुड़े बदले की भावना के संदर्भ में भी देखा गया।

गंजू की हत्या ने घाटी में एक अलग संदेश दिया। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि आतंकियों के निशाने पर केवल राजनीतिक कार्यकर्ता या सुरक्षा बल ही नहीं, बल्कि ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो पहले किसी आतंकवादी या अलगाववादी गतिविधि से जुड़े मुकदमों में भूमिका निभा चुके थे।

धमकियों का बढ़ता असर

कश्मीर में आतंकवाद के उस दौर में हिंसा के साथ धमकियां भी डर फैलाने का बड़ा माध्यम बनीं। पोस्टर, स्थानीय अखबारों में प्रकाशित संदेश और सार्वजनिक रूप से लगाए गए चेतावनी वाले नारों के जरिए लोगों के बीच भय पैदा होने लगा।

कश्मीरी पंडित परिवारों के लिए यह स्थिति इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि उन्हें अपने भविष्य और सुरक्षा को लेकर लगातार अनिश्चितता महसूस होने लगी थी। जनवरी 1990 के दौरान घाटी में तनाव बेहद बढ़ गया। 19 जनवरी की रात को बड़े पैमाने पर नारेबाजी और धमकियों का माहौल बनने की बात सामने आती है।

इसके बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित परिवार घाटी छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों की ओर जाने लगे। शुरुआती दौर में कई परिवारों ने इसे कुछ समय के लिए सुरक्षित स्थान पर जाने के तौर पर देखा, लेकिन हालात सामान्य न होने के कारण यह पलायन लंबे समय के विस्थापन में बदल गया।

यह केवल घर छोड़ने की कहानी नहीं थी। हजारों परिवारों ने अपनी संपत्ति, रोजगार, सामाजिक नेटवर्क और पीढ़ियों से जुड़े घर-बार पीछे छोड़ दिए। कश्मीर से विस्थापन भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक आंतरिक विस्थापनों में गिना जाता है।

हत्याओं ने बढ़ाया खौफ

आतंकवाद के शुरुआती वर्षों में कई कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई। फरवरी 1990 में दूरदर्शन केंद्र श्रीनगर के निदेशक लस्सा कौल की भी हत्या कर दी गई। बताया जाता है कि उन्हें इससे पहले धमकियां भी मिल चुकी थीं।

वकील और सामाजिक कार्यकर्ता पी. एन. भट सहित कई अन्य कश्मीरी पंडित भी आतंकियों की हिंसा का शिकार बने। लगातार सामने आ रही हत्याओं और धमकियों ने समुदाय के भीतर यह विश्वास कमजोर कर दिया कि वे घाटी में सुरक्षित रह सकते हैं।

हालांकि कश्मीरी पंडितों की हत्याओं की संख्या को लेकर अलग-अलग संस्थाओं और संगठनों के आंकड़ों में अंतर मिलता है। जम्मू-कश्मीर पुलिस की 2008 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1989 के बाद आतंकवादियों ने 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या की थी। इनमें 1990 में 109 हत्याएं दर्ज होने की बात कही गई थी। वहीं कश्मीरी पंडित संगठनों के आंकड़े इससे काफी अधिक रहे हैं।

अब फिर क्यों याद आया 1990 का दौर?

मौजूदा घटनाक्रम में सामने आई कथित धमकी ने पुराने दौर की याद इसलिए भी ताजा कर दी है क्योंकि इसमें फिर कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाए जाने की बात कही जा रही है। प्रशासन द्वारा पंडित कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजने का फैसला भी सुरक्षा को लेकर पैदा हुई चिंता को दर्शाता है।

हालांकि वर्तमान स्थिति को सीधे 1989-90 से जोड़ना जल्दबाजी होगी। उस समय घाटी में आतंकवाद का व्यापक उभार था, जबकि आज सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद विरोधी अभियान और प्रशासनिक ढांचा पहले से काफी अलग है। फिर भी धमकी जैसी घटनाएं उस समुदाय के लिए स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करती हैं, जिसने दशकों पहले हिंसा और विस्थापन का सामना किया था।

मकबूल भट्ट का नाम भी इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण दोबारा चर्चा में आता है। वह 1989 के पलायन का प्रत्यक्ष आरोपी नहीं था, क्योंकि उसकी फांसी पांच साल पहले हो चुकी थी। लेकिन JKLF के शुरुआती सशस्त्र आंदोलन और उसकी विचारधारा ने कश्मीर में अलगाववादी आतंकवाद के विकास पर प्रभाव डाला।

आज जब कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा को लेकर कोई धमकी सामने आती है, तो 1989-90 का इतिहास अपने आप चर्चा में आ जाता है। उस दौर की सबसे बड़ी सीख यही है कि धमकी, हिंसा और डर का असर केवल तत्काल घटना तक सीमित नहीं रहता। यह पूरे समाज के विश्वास, सुरक्षा की भावना और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मौजूदा धमकी की जांच और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।