बच्चे की शुरुआती डाइट तय कर सकती है भविष्य की सेहत, 2 साल तक चीनी से बचना फायदेमंद

बच्चे की शुरुआती डाइट तय कर सकती है भविष्य की सेहत, 2 साल तक चीनी से बचना फायदेमंद

बच्चे के जीवन के शुरुआती साल सिर्फ उसकी लंबाई और वजन बढ़ने के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि इसी दौरान उसकी खान-पान की आदतें और शरीर का मेटाबॉलिज्म भी तेजी से विकसित होता है। एक नई स्टडी में सामने आया है कि अगर बच्चे को जीवन के शुरुआती दो वर्षों में ज्यादा चीनी से दूर रखा जाए, तो आगे चलकर कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम कम किया जा सकता है।

शोध में खासतौर पर बच्चों के शुरुआती 1,000 दिनों यानी गर्भावस्था से लेकर करीब दो साल की उम्र तक के खान-पान पर ध्यान दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अवधि में शरीर का विकास बेहद तेजी से होता है। ऐसे में इस दौरान मिलने वाला पोषण बच्चे के भविष्य के स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर डाल सकता है।

स्टडी के निष्कर्षों ने बच्चों की डाइट में अतिरिक्त चीनी को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ाई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, छोटे बच्चों को स्वाद की आदत जल्दी लग जाती है। अगर शुरुआत से ही खाने-पीने की चीजों में अधिक मिठास शामिल कर दी जाए, तो आगे चलकर बच्चा मीठी चीजों को ज्यादा पसंद कर सकता है और उसकी पूरी डाइट प्रभावित हो सकती है।

शुरुआती उम्र में शरीर तेजी से करता है विकास

जन्म के बाद बच्चे के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। उसका दिमाग, इम्यून सिस्टम, पाचन तंत्र और मेटाबॉलिज्म लगातार विकसित हो रहे होते हैं। इस दौरान शरीर को प्रोटीन, फैट, विटामिन, मिनरल्स और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।

ऐसे समय में अगर डाइट का बड़ा हिस्सा चीनी या बहुत मीठे खाद्य पदार्थों से आने लगे, तो बच्चे को जरूरी पोषण पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता। मीठी चीजों से पेट जल्दी भर सकता है, लेकिन इनमें अक्सर वे पोषक तत्व नहीं होते जिनकी बढ़ते शरीर को जरूरत होती है।

यही वजह है कि विशेषज्ञ बच्चों के शुरुआती वर्षों में खाने की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि इस उम्र में बच्चे को प्राकृतिक और पौष्टिक खाद्य पदार्थों की आदत डालना भविष्य में उसके लिए फायदेमंद हो सकता है।

दो साल तक अतिरिक्त चीनी से दूरी क्यों जरूरी?

बच्चों को मिलने वाली चीनी दो तरह की हो सकती है। एक वह जो प्राकृतिक रूप से फलों, दूध और अन्य खाद्य पदार्थों में मौजूद होती है। दूसरी वह चीनी है जिसे स्वाद बढ़ाने के लिए खाने या पीने की चीजों में अलग से मिलाया जाता है।

विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से इसी अतिरिक्त चीनी को लेकर है। मिठाई, चॉकलेट, बिस्किट, केक, मीठे पेय, पैकेज्ड स्नैक्स और कई फ्लेवर्ड उत्पादों में अतिरिक्त चीनी काफी मात्रा में हो सकती है।

छोटे बच्चों को इन चीजों की जरूरत नहीं होती। इसके बजाय उनके भोजन में फल, सब्जियां, दालें, अनाज, दूध या उम्र के अनुसार उपयुक्त अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं।

शोध से जुड़े निष्कर्ष बताते हैं कि शुरुआती जीवन में कम चीनी वाला वातावरण आगे चलकर मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए बेहतर हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि केवल चीनी रोक देने से बच्चा पूरी तरह बीमारियों से सुरक्षित हो जाएगा, लेकिन स्वस्थ डाइट के साथ यह एक महत्वपूर्ण कदम जरूर हो सकता है।

मीठी चीजों की आदत बाद में बन सकती है बड़ी समस्या

बच्चों की पसंद काफी हद तक उनकी शुरुआती खाने की आदतों से बनती है। अगर उन्हें बार-बार मीठे स्वाद वाले खाद्य पदार्थ दिए जाएं, तो वे धीरे-धीरे उसी स्वाद के आदी हो सकते हैं।

इसके बाद सामान्य भोजन उन्हें कम स्वादिष्ट लग सकता है। कई बच्चे फल और सब्जियों की तुलना में मिठाई, चॉकलेट, मीठे बिस्किट या मीठे ड्रिंक को प्राथमिकता देने लगते हैं।

यह आदत आगे चलकर उनकी पूरी डाइट को प्रभावित कर सकती है। ज्यादा मीठे और ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों का नियमित सेवन वजन बढ़ने, मोटापे और शरीर में मेटाबॉलिक बदलाव जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है।

इसी कारण विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि बच्चों को शुरुआत से ही अलग-अलग प्राकृतिक स्वादों से परिचित कराया जाए। उन्हें हर चीज में अतिरिक्त मिठास देने की जरूरत नहीं है।

आगे चलकर किन बीमारियों का खतरा हो सकता है?

अत्यधिक चीनी का सेवन लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा पाया गया है। इनमें मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, दांतों की समस्याएं और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां शामिल हैं।

बचपन में लगातार ज्यादा मीठे खाद्य पदार्थ खाने की आदत शरीर में अतिरिक्त कैलोरी पहुंचा सकती है। अगर शारीरिक गतिविधि कम हो, तो यह अतिरिक्त ऊर्जा शरीर में फैट के रूप में जमा हो सकती है।

वजन बढ़ने के साथ आगे चलकर ब्लड शुगर और इंसुलिन से संबंधित समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है। हालांकि किसी व्यक्ति में बीमारी का होना केवल एक कारण पर निर्भर नहीं करता। जेनेटिक्स, पूरी डाइट, शारीरिक गतिविधि, नींद और जीवनशैली जैसे कई कारक इसमें भूमिका निभाते हैं।

इसलिए स्टडी का संदेश यह नहीं है कि चीनी ही सभी बीमारियों की अकेली वजह है, बल्कि यह है कि शुरुआती उम्र में स्वस्थ खान-पान की नींव रखने से भविष्य में बेहतर स्वास्थ्य की संभावना बढ़ सकती है।

पैकेज्ड फूड और मीठे ड्रिंक पर भी नजर जरूरी

आजकल बाजार में बच्चों के लिए कई तरह के पैकेज्ड फूड उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ उत्पादों को बच्चों के लिए आकर्षक तरीके से पेश किया जाता है। रंगीन पैकेजिंग और मीठा स्वाद बच्चों को आसानी से पसंद आ सकता है।

लेकिन माता-पिता के लिए सिर्फ पैकेट पर लिखे ‘बेबी’, ‘किड्स’ या ‘हेल्दी’ जैसे शब्दों पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। किसी भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ को देने से पहले उसका लेबल देखना जरूरी है।

विशेष रूप से यह जांचना चाहिए कि उसमें अतिरिक्त चीनी, सिरप या अन्य मीठे पदार्थ कितनी मात्रा में मौजूद हैं। मीठे पेय पदार्थों को लेकर भी सावधानी जरूरी है, क्योंकि पेय के रूप में चीनी का सेवन आसानी से ज्यादा हो सकता है।

छोटे बच्चे के लिए पानी और उम्र के अनुसार उपयुक्त दूध या अन्य चिकित्सकीय रूप से सुझाए गए विकल्प आमतौर पर बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

फल मीठे हैं, लेकिन उनसे डरने की जरूरत नहीं

यहां एक बात समझना भी जरूरी है कि हर मीठे स्वाद वाली चीज को नुकसानदायक नहीं माना जा सकता। पूरे फल में प्राकृतिक शुगर के साथ फाइबर, विटामिन, मिनरल्स और दूसरे पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं।

इसलिए बच्चों की डाइट में उम्र के अनुसार पूरे फल शामिल करना और फल के नाम पर अतिरिक्त चीनी वाले पैकेज्ड उत्पाद देना—इन दोनों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।

विशेषज्ञों का जोर मुख्य रूप से ऐसी चीनी को सीमित करने पर है जो भोजन या पेय में अलग से मिलाई जाती है और बच्चे के पोषण में कोई खास अतिरिक्त फायदा नहीं देती।

माता-पिता कैसे बना सकते हैं बेहतर शुरुआत?

बच्चे के शुरुआती वर्षों में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। बच्चे को क्या खिलाना है, कितनी बार देना है और घर में किस तरह का खाना उपलब्ध है, इन सभी चीजों का उसकी खाने की आदतों पर प्रभाव पड़ सकता है।

माता-पिता कोशिश कर सकते हैं कि रोजमर्रा के भोजन में प्राकृतिक और कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दी जाए। बच्चे को केवल स्वाद के लिए भोजन में अतिरिक्त चीनी डालने की आदत न बनाई जाए।

अगर बच्चा किसी चीज को पहली बार पसंद नहीं करता, तो तुरंत उसमें चीनी मिलाने के बजाय कुछ समय बाद दोबारा उस खाद्य पदार्थ को अलग तरीके से दिया जा सकता है। बच्चों को अलग-अलग स्वाद और बनावट से धीरे-धीरे परिचित कराना भी उनकी डाइट को विविध बनाने में मदद कर सकता है।

साथ ही, बच्चे को खाना खिलाने को लेकर दबाव बनाने के बजाय उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार संतुलित तरीके से भोजन देना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

दो साल तक की आदतें लंबे समय तक असर डाल सकती हैं

शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष भविष्य के स्वास्थ्य की मजबूत नींव रखने का समय होते हैं। इस अवधि में शरीर और दिमाग तेजी से विकसित होते हैं और खान-पान की कई आदतें भी इसी समय बनती हैं।

अगर बच्चे को शुरू से ही अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों और पेय से दूर रखा जाए और पौष्टिक भोजन की आदत डाली जाए, तो इससे लंबे समय में स्वस्थ जीवनशैली विकसित करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, माता-पिता को इसे किसी एक खाद्य पदार्थ को पूरी तरह ‘जहर’ मानने के रूप में नहीं लेना चाहिए। बच्चे के लिए संतुलित पोषण सबसे जरूरी है। उम्र, विकास और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार उसकी डाइट तय करना बेहतर होता है।

स्टडी इस बात की ओर इशारा करती है कि बच्चे के पहले दो साल में अतिरिक्त चीनी को जितना संभव हो कम रखना भविष्य के स्वास्थ्य के लिए एक समझदारी भरा कदम हो सकता है। इस उम्र में बनाई गई स्वस्थ खाने की आदतें आगे चलकर वजन, मेटाबॉलिक हेल्थ और संपूर्ण जीवनशैली पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।

(Photo : AI Generated)