आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पंजाब के कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। चीमा ने आरोप लगाया कि इतनी महत्वपूर्ण नियुक्ति की प्रक्रिया में पंजाब सरकार से किसी तरह का परामर्श नहीं किया गया, जबकि संबंधित प्रक्रिया में राज्य सरकार की राय लिए जाने का प्रावधान है। उन्होंने इस पूरे मामले को पंजाब के संवैधानिक अधिकारों और देश के संघीय ढांचे से जोड़ते हुए केंद्र से जवाब मांगा है।
जालंधर में रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि पंजाब सरकार को नियुक्ति को अंतिम रूप दिए जाने से पहले अपनी राय रखने का अवसर मिलना चाहिए था। उनके साथ आप नेता तरनप्रीत सिंह सन्नी भी मौजूद रहे। चीमा ने कहा कि सवाल जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसके तहत राज्य सरकार को कथित तौर पर विश्वास में नहीं लिया गया।
चीमा ने कहा कि भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन करता है। ऐसे में किसी संवेदनशील संवैधानिक प्रक्रिया में राज्य सरकार की भूमिका को नजरअंदाज किए जाने से संघीय व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि पंजाब की निर्वाचित सरकार प्रदेश के करोड़ों लोगों के जनादेश का प्रतिनिधित्व करती है और उसे महत्वपूर्ण मामलों में अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए।
कैबिनेट मंत्री ने दावा किया कि मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति से संबंधित मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर में संबंधित राज्य सरकार के विचारों को ध्यान में रखने की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि पंजाब के राज्यपाल की ओर से 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान को भेजे गए पत्र और केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के पत्र में भी इस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था।
चीमा ने सवाल उठाया कि जब प्रक्रिया में राज्य सरकार के विचारों को महत्व देने की बात कही गई है तो पंजाब सरकार से नियुक्ति से पहले सलाह-मशविरा क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि सरकार इस विषय को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देख रही है, बल्कि इसे राज्य के अधिकारों और संघीय ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे के तौर पर उठा रही है।
उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता ने मौजूदा सरकार को अपना जनादेश दिया है और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान प्रदेश के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक विषय पर निर्वाचित सरकार को पूरी तरह प्रक्रिया से बाहर रखना लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। चीमा के अनुसार, राज्य सरकार की अनदेखी का अर्थ पंजाब की जनता के जनादेश की अनदेखी भी है।
हरपाल सिंह चीमा ने इस मौके पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस जीएस संधावालिया से जुड़े पुराने घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस संधावालिया को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी। चीमा के अनुसार, इस सिफारिश के बावजूद उनकी नियुक्ति को दो महीने से अधिक समय तक लंबित रखा गया और बाद में उन्हें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
चीमा ने केंद्र से सवाल किया कि यदि कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद जस्टिस संधावालिया की नियुक्ति में देरी हुई थी, तो उसके पीछे क्या कारण थे। उन्होंने इसी संदर्भ में पूछा कि दूसरी ओर जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करते समय पंजाब सरकार से राय लेने की आवश्यकता क्यों नहीं समझी गई।
आप नेता ने स्पष्ट किया कि उनकी आपत्ति किसी न्यायाधीश के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि मुद्दा नियुक्ति की प्रक्रिया और उसमें राज्य सरकार की भूमिका का है। उन्होंने कहा कि यदि नियमों में राज्य सरकार के विचार लेने का प्रावधान मौजूद है तो उसका पालन किया जाना चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन और आपसी सम्मान बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है।
चीमा ने कहा कि पंजाब सरकार इस मामले पर चुप नहीं बैठेगी। उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा राज्यों को दिए गए अधिकारों की रक्षा करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों का संतुलन संघीय व्यवस्था की बुनियाद है और किसी भी स्तर पर इसे कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
मंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इस मामले पर चर्चा के लिए रविवार शाम चार बजे आपात कैबिनेट बैठक बुलाई है। बैठक में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति से जुड़े घटनाक्रम और राज्य सरकार की आपत्तियों पर चर्चा की जाएगी। साथ ही आगे की रणनीति को लेकर भी फैसला लिया जा सकता है।
चीमा ने कहा कि पंजाब सरकार यह जानना चाहती है कि जब संबंधित प्रक्रिया में राज्य सरकार की राय का प्रावधान है तो उसे अपनी बात रखने का अवसर क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच किसी भी संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर संवाद और परामर्श की व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पंजाब लंबे समय से अपने संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। ऐसे में राज्य सरकार किसी भी ऐसे कदम का विरोध करेगी जिससे उसे लगे कि उसके अधिकारों या संघीय ढांचे की भावना को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार संविधान में निर्धारित दायरे में रहते हुए पंजाब के हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगी।
चीमा ने कहा कि संघीय ढांचा केवल केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन नहीं है, बल्कि यह एक-दूसरे के अधिकारों और संवैधानिक भूमिका के सम्मान पर भी आधारित है। उनके अनुसार, केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल के लिए जरूरी है कि महत्वपूर्ण विषयों पर संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिले।
उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करती है, लेकिन साथ ही राज्य के अधिकारों और निर्धारित प्रक्रियाओं को लेकर भी पूरी तरह सजग है। उन्होंने दोहराया कि उनकी आपत्ति नियुक्त व्यक्ति को लेकर नहीं, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया में पंजाब सरकार को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने को लेकर है।
इस पूरे मामले में अब पंजाब कैबिनेट की बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में सरकार इस मुद्दे पर विस्तार से विचार कर सकती है और आगे की कार्रवाई की दिशा तय कर सकती है। यदि सरकार इस मामले को आगे संवैधानिक या अन्य उपयुक्त मंच पर उठाने का फैसला करती है तो पंजाब और केंद्र के बीच इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।
हरपाल सिंह चीमा ने अंत में कहा कि पंजाब सरकार प्रदेश के संवैधानिक अधिकारों और संघीय व्यवस्था की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने केंद्र से यह सुनिश्चित करने की मांग की कि राज्य सरकारों को संविधान और संबंधित प्रक्रियाओं के तहत प्राप्त अधिकारों और भूमिका का सम्मान मिले। अब इस मामले में पंजाब सरकार के अगले कदम और केंद्र की प्रतिक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हैं।



