चंडीगढ़ निगम चुनाव में आरक्षण का ‘ड्रा’ बना बड़ा टर्निंग प्वाइंट, कई दिग्गजों की चुनावी जमीन खिसकी

चंडीगढ़ निगम चुनाव में आरक्षण का ‘ड्रा’ बना बड़ा टर्निंग प्वाइंट, कई दिग्गजों की चुनावी जमीन खिसकी

एससी के लिए 7 और सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए 9 वार्ड आरक्षित, मौजूदा पार्षदों के सामने नई सीट खोजने की चुनौती

चंडीगढ़ नगर निगम के दिसंबर में प्रस्तावित चुनाव से पहले वार्डों के आरक्षण ने शहर की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। सेक्टर-6 स्थित यूटी गेस्ट हाउस में शुक्रवार को स्टेट इलेक्शन कमिश्नर विजय देव की निगरानी में आरक्षण का ड्रॉ निकाला गया। ड्रॉ के परिणाम सामने आते ही राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे नेताओं के बीच हलचल तेज हो गई है।

इस बार कुल 16 वार्डों की चुनावी स्थिति आरक्षण के कारण बदल गई है। इनमें सात वार्ड अनुसूचित जाति वर्ग के लिए तथा नौ वार्ड सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इनमें एससी वर्ग के लिए आरक्षित सात सीटों में से तीन सीटें एससी महिला उम्मीदवारों के लिए निर्धारित की गई हैं, जबकि चार सीटों पर एससी वर्ग के महिला और पुरुष दोनों उम्मीदवार चुनाव लड़ सकेंगे।

आरक्षण के इस बदलाव का सबसे सीधा असर उन मौजूदा पार्षदों पर पड़ा है, जो अपने वर्तमान वार्ड से दोबारा चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे थे। अब उन्हें या तो अपनी राजनीतिक रणनीति बदलनी होगी या फिर किसी ऐसे वार्ड की तलाश करनी होगी जहां उनके लिए चुनाव लड़ने की गुंजाइश हो। राजनीतिक दलों के लिए भी यह कवायद आसान नहीं होगी, क्योंकि कई वार्डों में टिकट के पुराने समीकरण बदल गए हैं।

एससी वर्ग के लिए आरक्षित वार्डों में वार्ड नंबर 29, 4, 9, 15, 1, 3 और 32 शामिल हैं। इनमें वार्ड नंबर 29, 3 और 32 को एससी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। वहीं वार्ड नंबर 4, 9, 15 और 1 में एससी वर्ग के महिला और पुरुष दोनों उम्मीदवार चुनाव लड़ सकेंगे।

आरक्षण की यह तस्वीर सामने आने के बाद भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दलों के भीतर संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चा तेज होने की संभावना है। जिन वार्डों में अब महिला या एससी उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं, वहां दलों को नए चेहरों की तलाश करनी होगी। वहीं जिन मौजूदा पार्षदों की सीट आरक्षित हो गई है, वे दूसरे वार्डों में राजनीतिक आधार तलाशने की कोशिश कर सकते हैं।

दलीप शर्मा के सामने सबसे पहले बदलनी होगी रणनीति

वार्ड नंबर 3 का आरक्षण भाजपा के मौजूदा पार्षद दलीप शर्मा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका माना जा रहा है। वार्ड को एससी महिला के लिए आरक्षित किए जाने के बाद उनके लिए यहां से चुनाव लड़ने की संभावना खत्म हो गई है। शर्मा लगातार तीसरी बार चुनाव जीतने की तैयारी में जुटे हुए थे, लेकिन आरक्षण के बाद अब उन्हें नए वार्ड की तलाश करनी होगी।

उनके सामने केवल नई सीट तलाशने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि दूसरे वार्ड में जाकर संगठनात्मक पकड़ और मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता स्थापित करना भी महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा भाजपा के भीतर उस वार्ड से टिकट की दावेदारी रखने वाले अन्य नेताओं के साथ भी उन्हें नए समीकरण बनाने पड़ सकते हैं।

डिप्टी मेयर सुमन शर्मा के लिए भी बदला समीकरण

वार्ड नंबर 4 भी एससी वर्ग के लिए आरक्षित किए जाने से भाजपा की पार्षद और डिप्टी मेयर सुमन शर्मा के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। मौजूदा वार्ड से सामान्य वर्ग की उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का रास्ता आरक्षण के बाद बंद हो गया है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी उन्हें किसी दूसरे वार्ड से चुनाव मैदान में उतारती है या स्थानीय स्तर पर किसी नए चेहरे को मौका देती है। सुमन शर्मा को भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर जल्द रणनीति तय करनी होगी।

बिमला दुबे के लिए फिर बदली चुनावी जमीन

वार्ड नंबर 9 का आरक्षण भाजपा पार्षद बिमला दुबे के लिए भी खासा अहम है। वर्ष 2021 में एससी आरक्षण के कारण उन्हें वार्ड नंबर 7 की जगह वार्ड नंबर 9 से चुनाव लड़ना पड़ा था। अब एक बार फिर वार्ड नंबर 9 के एससी के लिए आरक्षित होने से उनके सामने अपनी अगली चुनावी सीट को लेकर सवाल खड़ा हो गया है।

इस घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट होता है कि नगर निगम चुनाव में आरक्षण किस तरह नेताओं की राजनीतिक रणनीति को प्रभावित करता है। दुबे को अब पार्टी के भीतर उपलब्ध विकल्पों पर विचार करना होगा और ऐसी सीट तलाशनी होगी जहां से वह चुनावी मैदान में उतर सकें।

कांग्रेस में शामिल रामचंद्र यादव के समीकरण भी बदले

वार्ड नंबर 15 का आरक्षण भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस वार्ड से जुड़े रामचंद्र यादव हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं। लेकिन अब वार्ड एससी वर्ग के लिए आरक्षित होने के कारण उनके लिए मौजूदा सीट से चुनाव लड़ने की संभावना प्रभावित हुई है।

यादव के कांग्रेस में शामिल होने के बाद पार्टी के भीतर उनकी भूमिका और आगामी चुनाव को लेकर पहले से ही राजनीतिक चर्चा थी। अब आरक्षण के बाद कांग्रेस को उनके लिए नई रणनीति बनानी पड़ सकती है। पार्टी के सामने यह तय करने की चुनौती होगी कि उन्हें किस वार्ड से मैदान में उतारा जाए और वहां संगठनात्मक समीकरण किस तरह तैयार किए जाएं।

मुन्नवर के सामने भी सीट बदलने की मजबूरी

वार्ड नंबर 29 का आरक्षण आम आदमी पार्टी से चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए मुन्नवर के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस सीट को एससी महिला के लिए आरक्षित किया गया है। ऐसे में मौजूदा वार्ड से उनका चुनाव लड़ना संभव नहीं होगा।

मुन्नवर के सामने अब राजनीतिक दल के भीतर अपनी अगली भूमिका और संभावित चुनावी सीट को लेकर नई रणनीति बनाने की चुनौती है। उनके लिए यह देखना भी अहम होगा कि कांग्रेस किस वार्ड में उन्हें मौका देती है और उस वार्ड में पार्टी की मौजूदा स्थिति क्या है।

सीनियर डिप्टी मेयर जसमानप्रीत सिंह की सीट भी आरक्षित

वार्ड नंबर 32 का आरक्षण भाजपा के सीनियर डिप्टी मेयर जसमानप्रीत सिंह के लिए भी बड़ा बदलाव लेकर आया है। उनका वार्ड एससी महिला के लिए निर्धारित किया गया है। इसका सीधा मतलब है कि इस सीट से अब केवल एससी वर्ग की महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकेगी।

जसमानप्रीत सिंह को भी अब अपने राजनीतिक भविष्य के लिए दूसरी सीट तलाशनी होगी। चंडीगढ़ नगर निगम में वरिष्ठ पद पर रहने के कारण उनकी अगली राजनीतिक रणनीति पर पार्टी के भीतर भी नजर रहेगी। भाजपा के लिए भी यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि उन्हें किस वार्ड से चुनाव मैदान में उतारा जाए।

महिलाओं के लिए आरक्षित नौ सीटों ने भी बदले समीकरण

एससी आरक्षण के अलावा सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए नौ वार्ड आरक्षित किए गए हैं। इनमें वार्ड नंबर 17, 13, 21, 25, 30, 2, 8, 11 और 26 शामिल हैं।

इन वार्डों में मौजूदा पुरुष पार्षदों के लिए अपने वर्तमान वार्ड से दोबारा चुनाव लड़ने का रास्ता बंद हो गया है। अब उन्हें दूसरे वार्ड की तलाश करनी पड़ सकती है। वहीं राजनीतिक दलों के लिए यह मौका महिला नेताओं को आगे लाने का भी है।

भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के सामने अब इन नौ वार्डों के लिए मजबूत महिला चेहरों का चयन करने की चुनौती होगी। टिकट वितरण में स्थानीय पकड़, पार्टी संगठन से जुड़ाव, पिछले चुनावों में सक्रियता और वार्ड स्तर पर स्वीकार्यता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

टिकट वितरण से पहले शुरू होगा नया मंथन

आरक्षण के बाद अब नगर निगम चुनाव की तैयारियां एक नए चरण में प्रवेश कर गई हैं। जिन नेताओं ने महीनों से अपने मौजूदा वार्ड में चुनावी तैयारी की थी, उन्हें अब रणनीति बदलनी पड़ सकती है। दूसरी ओर, जिन महिलाओं और एससी वर्ग के नेताओं को अब आरक्षित वार्डों में चुनाव लड़ने का अवसर मिल सकता है, उनकी राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना है।

राजनीतिक दलों में संभावित उम्मीदवारों की सूची को नए सिरे से तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होगी। कई वार्डों में पुराने दावेदारों के स्थान पर नए नाम सामने आ सकते हैं। टिकट को लेकर पार्टी नेताओं के बीच लॉबिंग भी तेज होने की संभावना है।

आरक्षण से किसे फायदा, किसे नुकसान?

आरक्षण के इस ड्रॉ ने कुछ नेताओं के लिए चुनावी रास्ता कठिन किया है तो कई नए दावेदारों के लिए अवसर भी पैदा किए हैं। खासकर महिला नेताओं के लिए नौ सामान्य वार्ड आरक्षित होने से उन्हें नगर निगम की राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका मिलेगा। वहीं एससी वर्ग के नेताओं और महिला नेताओं के लिए आरक्षित सात वार्डों में भी नए राजनीतिक चेहरों के उभरने की संभावना है।

मौजूदा पार्षदों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपनी राजनीतिक पहचान को नए वार्ड में किस तरह स्थापित करते हैं। किसी दूसरे वार्ड में चुनाव लड़ना केवल टिकट हासिल करने तक सीमित नहीं होगा। वहां स्थानीय संगठन, पुराने पार्षदों के समर्थक, संभावित बागी उम्मीदवार और मतदाताओं के साथ संपर्क जैसे कई कारक चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

दिसंबर के चुनाव की तैयारियां तेज होने के संकेत

वार्ड आरक्षण का ड्रॉ निकलने के बाद दिसंबर में होने वाले नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की उम्मीद है। अब पार्टियों के पास वार्डवार सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों का नया खाका होगा। इसके आधार पर संभावित उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग, स्थानीय नेताओं से फीडबैक और टिकट वितरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

आरक्षण ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आगामी निगम चुनाव में कई पुराने चेहरों को अपने पारंपरिक वार्ड से बाहर निकलकर नई राजनीतिक जमीन तलाशनी होगी। दूसरी ओर, नए उम्मीदवारों के लिए अपनी पहचान बनाने का अवसर खुल गया है।

कुल मिलाकर वार्ड आरक्षण का ड्रॉ चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव से पहले एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में सामने आया है। सात एससी और नौ सामान्य महिला आरक्षित वार्डों ने मौजूदा पार्षदों की योजनाओं को प्रभावित किया है। अब आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इन बदले हुए समीकरणों के बीच किसे टिकट देती हैं और कौन से नेता नई सीट से चुनावी मैदान में उतरने का फैसला करते हैं। दिसंबर के चुनाव से पहले होने वाली यह पूरी कवायद चंडीगढ़ की स्थानीय राजनीति में कई नए चेहरे सामने ला सकती है और कई मौजूदा नेताओं के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय कर सकती है।