चंडीगढ़। नगर निगम चुनाव के लिए वार्डों के आरक्षण को लेकर जारी किए गए ड्राॅ के बाद विवाद गहराने लगा है। वार्डों को आरक्षित करने के लिए वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया गया है, लेकिन बीते करीब डेढ़ दशक में शहर की जनसंख्या के साथ-साथ वार्डों की सामाजिक और भौगोलिक संरचना में भी बड़ा बदलाव आया है। कई बस्तियां हट चुकी हैं, हजारों परिवारों का पुनर्वास दूसरी जगह किया जा चुका है और इसके चलते अनुसूचित जाति की आबादी का वितरण भी बदल गया है। ऐसे में पुराने आंकड़ों के आधार पर मौजूदा वार्डों का आरक्षण तय किए जाने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
वार्ड-32 के सीनियर डिप्टी मेयर जसमनप्रीत सिंह ने आरक्षण के ड्राॅ के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने कहा है कि वह इस मामले को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देंगे और इसके लिए जनहित याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। जसमनप्रीत सिंह के मुताबिक यह फैसला उन्होंने अपने स्तर पर नहीं, बल्कि वार्ड के लोगों के आग्रह के बाद लिया है। उनका कहना है कि जब किसी वार्ड की आबादी और वहां रहने वाले लोगों की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव हो चुका है तो करीब 15 वर्ष पुराने जनगणना आंकड़ों को आधार बनाकर वर्तमान समय में आरक्षण तय करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
रविवार को वार्ड के लोगों ने इस मुद्दे को लेकर बैठक भी की। बैठक में बड़ी संख्या में वार्डवासी शामिल हुए और आरक्षण के ड्राॅ को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। चर्चा के दौरान माहौल भावुक भी हो गया। वार्डवासियों ने जसमनप्रीत सिंह से मामले को अदालत में उठाने और वार्ड के हित में कानूनी कदम उठाने की मांग की। इसके बाद जसमनप्रीत सिंह ने स्पष्ट किया कि वह नियमों और तथ्यों के आधार पर इस फैसले का विरोध करेंगे तथा न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।
जसमनप्रीत सिंह का मुख्य तर्क वार्ड-32 में अनुसूचित जाति की मौजूदा आबादी को लेकर है। उन्होंने कहा कि वार्ड से कालोनी नंबर-5 को हटाए जाने के बाद यहां अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी बेहद कम रह गई है। उनके अनुसार वर्तमान स्थिति में करीब 12 हजार की आबादी वाले वार्ड में अनुसूचित जाति वर्ग के 100 मतदाता भी मुश्किल से बचे होंगे। इसके बावजूद पुराने आंकड़ों के आधार पर वार्ड-32 को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया है।
उनका कहना है कि वर्ष 2011 की जनगणना के समय वार्ड की परिस्थितियां अलग थीं। उस समय यहां बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रहते थे, जो अनुसूचित जाति वर्ग से संबंधित थे। बाद में कालोनी हटाए जाने और वहां रहने वाले परिवारों के पुनर्वास के कारण वार्ड की सामाजिक संरचना बदल गई। ऐसे में वर्तमान स्थिति को नजरअंदाज कर केवल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर आरक्षण तय करना कई सवाल खड़े करता है।
कालोनी नंबर-5 हटने से बदल गया वार्ड का पूरा गणित
वार्ड-32 में आरक्षण को लेकर विवाद की सबसे बड़ी वजह कालोनी नंबर-5 का हटाया जाना है। यह चंडीगढ़ की सबसे बड़ी स्लम बस्तियों में शामिल थी। वर्ष 2013 में इस कालोनी को हटाकर यहां रहने वाले परिवारों का पुनर्वास किया गया। करीब 6110 परिवारों को धनास में पुनर्वास आवास उपलब्ध करवाकर बसाया गया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद वार्ड-32 की आबादी और सामाजिक समीकरण में बड़ा बदलाव आया।
कालोनी नंबर-5 में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति वर्ग के परिवार रहते थे। कालोनी हटने के बाद इन परिवारों के धनास चले जाने से वार्ड-32 में अनुसूचित जाति की आबादी काफी कम हो गई। दूसरी ओर आरक्षण तय करने के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने के कारण उस समय दर्ज अनुसूचित जाति की आबादी के आंकड़े अभी भी आरक्षण के निर्धारण में प्रभावी रहे। यही स्थिति अब विवाद का प्रमुख आधार बन गई है।
जसमनप्रीत सिंह का कहना है कि यदि किसी वार्ड की वह आबादी ही वहां मौजूद नहीं है, जिसके आधार पर उसे आरक्षित किया गया है, तो ऐसे आरक्षण की प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी है। उनका तर्क है कि जनगणना के आंकड़े किसी विशेष समय की स्थिति को दर्शाते हैं, जबकि वार्डों की मौजूदा भौगोलिक सीमाओं और आबादी में बाद के वर्षों में हुए बदलावों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
धनास में पुनर्वास के बाद उलटा दिख रहा आरक्षण का समीकरण
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कालोनी नंबर-5 से हटाए गए परिवारों को जिस धनास क्षेत्र में बसाया गया, वहां अनुसूचित जाति की आबादी पहले की तुलना में काफी बढ़ गई। यानी एक तरफ वार्ड-32 से अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी कम हो गई, वहीं दूसरी तरफ पुनर्वास स्थल पर इसी वर्ग की आबादी बढ़ गई।
इसके बावजूद आरक्षण के ड्राॅ में वार्ड-32 को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया, जबकि धनास का संबंधित वार्ड सामान्य वर्ग के लिए खुला रखा गया है। यही विरोधाभास अब सवालों के घेरे में है। जसमनप्रीत सिंह और वार्डवासियों का कहना है कि यदि आरक्षण का उद्देश्य वर्तमान आबादी के अनुपात और प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखना है तो फिर बदली हुई आबादी के आंकड़ों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है।
एक नहीं, कई वार्डों में बदली है आबादी की तस्वीर
आरक्षण को लेकर उठे सवाल केवल वार्ड-32 तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2011 के बाद शहर में कई बड़े पुनर्वास और विस्थापन अभियान हुए हैं। कई कालोनियों को हटाकर वहां रहने वाले परिवारों को दूसरी जगह बसाया गया। इसके कारण कई वार्डों में अनुसूचित जाति समेत विभिन्न सामाजिक वर्गों की आबादी का वितरण बदल गया।
इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 स्थित कालोनी नंबर-4 और संजय कालोनी भी ऐसी ही बस्तियों में शामिल हैं, जिन्हें बाद के वर्षों में हटाया गया। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को दूसरे स्थानों पर पुनर्स्थापित किया गया। कालोनी नंबर-4 के मतदाताओं को मलोया कालोनी में बसाया गया। इससे पुराने वार्डों में रहने वाली आबादी कम हुई, जबकि पुनर्वास वाले क्षेत्रों में आबादी बढ़ी।
ऐसे में पुराने जनगणना आंकड़ों के आधार पर तैयार आरक्षण सूची को लेकर कई वार्डों में असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है। स्थानीय प्रतिनिधियों का मानना है कि वर्ष 2011 से अब तक हुए जनसंख्या परिवर्तन, पुनर्वास और वार्ड सीमाओं में आए बदलावों का अध्ययन किए बिना आरक्षण का सही आकलन करना मुश्किल है।
हाईकोर्ट में जनहित याचिका से उठेगा मामला
जसमनप्रीत सिंह ने संकेत दिया है कि वह इस मामले को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष ले जाएंगे। इसके लिए जनहित याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है। याचिका में मुख्य रूप से यह मुद्दा उठाया जा सकता है कि क्या वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर ऐसे वार्डों को आरक्षित किया जाना उचित है, जहां पिछले वर्षों में बड़े स्तर पर आबादी का पुनर्वास हो चुका है।
उनका कहना है कि वह किसी वर्ग के आरक्षण का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि आरक्षण निर्धारित करने की प्रक्रिया और उसके आधार पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि किसी वार्ड की मौजूदा स्थिति 2011 के मुकाबले पूरी तरह बदल चुकी है तो केवल पुराने आंकड़ों के आधार पर उसे आरक्षित करने से वास्तविक प्रतिनिधित्व का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
वार्डवासियों ने भी जसमनप्रीत सिंह के इस निर्णय का समर्थन किया है। रविवार की बैठक में लोगों ने कहा कि आरक्षण का निर्धारण पारदर्शी और मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी क्षेत्र से हजारों परिवार स्थानांतरित हो चुके हैं तो उनकी पुरानी जनसंख्या को उसी वार्ड में मानकर आरक्षण तय करना व्यवहारिक सवाल पैदा करता है।
अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि जसमनप्रीत सिंह की ओर से हाईकोर्ट में दायर की जाने वाली याचिका पर अदालत क्या रुख अपनाती है। यदि अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करती है तो इससे केवल वार्ड-32 ही नहीं, बल्कि उन अन्य वार्डों के आरक्षण पर भी चर्चा शुरू हो सकती है, जहां 2011 के बाद बड़े स्तर पर आबादी का स्थानांतरण हुआ है। इससे नगर निगम चुनाव से पहले आरक्षण की पूरी प्रक्रिया को लेकर नई कानूनी और राजनीतिक बहस छिड़ने की संभावना है।




