हरियाणा में लोकायुक्त का पद खाली, नए चेहरे की तलाश तेज; नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका अहम

हरियाणा में लोकायुक्त का पद खाली, नए चेहरे की तलाश तेज; नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार की भूमिका अहम

हरियाणा में भ्रष्टाचार और लोक शिकायतों की जांच से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक पद लोकायुक्त के रिक्त होने के बाद अब नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। सेवानिवृत्त जस्टिस हरिपाल वर्मा का पांच वर्ष का कार्यकाल 10 सितंबर को समाप्त हो गया। उन्होंने 11 सितंबर 2021 को हरियाणा के लोकायुक्त के रूप में शपथ लेकर पदभार संभाला था। कार्यकाल पूरा होने के साथ ही अब इस पद पर नए नाम को लेकर संभावित दावेदारों की चर्चाएं और लॉबिंग शुरू होने की संभावना बढ़ गई है।

लोकायुक्त का पद राज्य में भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जांच और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ आरोपों की पड़ताल के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार के अगले कदम पर नजरें टिक गई हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार किस नाम पर सहमति बनाती है और नियुक्ति की प्रक्रिया किस गति से आगे बढ़ती है।

पांच साल पूरा होते ही खत्म हुआ कार्यकाल

हरियाणा लोकायुक्त अधिनियम, 2002 के अनुसार लोकायुक्त का कार्यकाल पदभार संभालने की तारीख से पांच वर्ष निर्धारित है। इसी प्रावधान के तहत जस्टिस हरिपाल वर्मा का कार्यकाल 10 सितंबर को पूरा हो गया। उन्होंने 11 सितंबर 2021 को पद की शपथ ली थी और उसी दिन से उनका कार्यकाल प्रभावी माना गया।

कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत निवर्तमान लोकायुक्त को पांच वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद नए लोकायुक्त की नियुक्ति तक पद पर बने रहने की अनुमति हो। यानी केवल इसलिए कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति अभी नहीं हुई है, पूर्व लोकायुक्त अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद पद पर बने रहें, ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान अधिनियम में मौजूद नहीं है।

इसी वजह से कार्यकाल समाप्त होते ही पद रिक्त हो गया है और अब सरकार के सामने नए लोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।

नए लोकायुक्त के नाम को लेकर बढ़ी हलचल

लोकायुक्त का पद खाली होने के बाद अब संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारियों के नामों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, सरकार की ओर से अभी किसी संभावित नाम को लेकर औपचारिक संकेत नहीं दिया गया है।

पद की प्रकृति को देखते हुए इसमें नियुक्ति के लिए न्यायिक अनुभव को प्रमुखता दी जाती है। कानून में पात्रता के संबंध में स्पष्ट व्यवस्था है और इसी आधार पर संभावित नामों पर विचार किया जाएगा।

जानकारों के अनुसार जैसे-जैसे नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, संभावित दावेदारों और उनके समर्थकों की सक्रियता भी बढ़ सकती है। चूंकि अंतिम नियुक्ति में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए इस पद के लिए संभावित नामों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी चर्चाएं तेज होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो सकते हैं लोकायुक्त

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार हरियाणा लोकायुक्त अधिनियम में लोकायुक्त के पद के लिए न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को पात्र माना गया है। कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश को लोकायुक्त नियुक्त किया जा सकता है।

इस प्रावधान से स्पष्ट है कि नियुक्ति के लिए सरकार को ऐसे व्यक्ति का चयन करना होगा, जिसके पास उच्च न्यायिक पद पर कार्य करने का अनुभव रहा हो। लोकायुक्त के पद की जिम्मेदारियों को देखते हुए न्यायिक अनुभव को महत्वपूर्ण माना गया है।

हालांकि, अधिनियम में नियुक्ति के लिए अलग से किसी सर्च कमेटी के गठन की व्यवस्था नहीं है। यानी संभावित नामों की तलाश के लिए किसी निर्धारित खोज समिति के जरिए प्रक्रिया चलाने का कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।

सर्च कमेटी नहीं, परामर्श की व्यवस्था

लोकायुक्त की नियुक्ति के संबंध में कानून ने एक अलग व्यवस्था तय कर रखी है। अधिनियम की धारा 3 के तहत लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, लेकिन यह नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर होती है।

मुख्यमंत्री को लोकायुक्त के चयन से पहले कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों से विचार-विमर्श करना होता है। इनमें विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और संबंधित स्थिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश या पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य लोकायुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति से पहले विभिन्न संवैधानिक और न्यायिक स्तरों पर विचार प्राप्त करना है। हालांकि, इस परामर्श को मुख्यमंत्री के लिए बाध्यकारी नहीं बनाया गया है।

चयन में सरकार की पसंद का महत्व

कानूनी प्रावधानों को देखें तो लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया में सरकार की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री को संबंधित लोगों से परामर्श करना होता है, लेकिन उनकी राय को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं है।

इसका अर्थ यह है कि सरकार संभावित नामों पर विचार करने के बाद अपने स्तर पर अंतिम सिफारिश तय कर सकती है। इसके बाद राज्यपाल की ओर से नियुक्ति की जाती है।

यही कारण है कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार के रुख को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार किस न्यायिक अधिकारी के नाम पर विचार करती है और किस नाम की सिफारिश राज्यपाल को भेजती है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

लोकायुक्त की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण

लोकायुक्त संस्था का उद्देश्य सरकारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतों की जांच के लिए एक स्वतंत्र संस्थागत व्यवस्था उपलब्ध कराना है। सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ सामने आने वाली शिकायतों और आरोपों की जांच के लिहाज से यह संस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

ऐसे में नए लोकायुक्त की नियुक्ति सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता के लिहाज से भी इसका महत्व है। पद रिक्त होने के बाद सरकार के सामने जल्द नए लोकायुक्त का चयन करने की चुनौती रहेगी, ताकि संस्था के कामकाज में लंबा व्यवधान न आए।

कार्यकाल को लेकर कानून स्पष्ट

निवर्तमान लोकायुक्त के कार्यकाल के समाप्त होने के बाद एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह भी सामने आया है कि क्या नए लोकायुक्त की नियुक्ति होने तक पूर्व लोकायुक्त पद पर बने रह सकते हैं। उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के अनुसार ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

हरियाणा लोकायुक्त अधिनियम 2002 में कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है। इस अवधि के समाप्त होने के बाद पद पर बने रहने के लिए कानून में किसी विस्तार या अंतरिम व्यवस्था का उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिए जस्टिस हरिपाल वर्मा का कार्यकाल निर्धारित अवधि पूरी होने के साथ ही समाप्त माना गया है।

अब सरकार को नए लोकायुक्त के चयन की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

संभावित दावेदारों की लॉबिंग पर भी नजर

पद रिक्त होने के बाद न्यायिक क्षेत्र से जुड़े संभावित नामों को लेकर चर्चाएं तेज होना तय माना जा रहा है। हालांकि आधिकारिक स्तर पर अभी किसी दावेदार का नाम सामने नहीं आया है, लेकिन इस तरह के महत्वपूर्ण पद के लिए इच्छुक या समर्थित नामों की सक्रियता बढ़ सकती है।

क्योंकि कानून में सर्च कमेटी की व्यवस्था नहीं है और मुख्यमंत्री की सलाह को नियुक्ति प्रक्रिया में प्रमुख स्थान दिया गया है, इसलिए संभावित उम्मीदवारों के लिए सरकार के स्तर पर स्वीकार्यता हासिल करना अहम होगा।

आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री कार्यालय, सरकार और संबंधित संवैधानिक पदाधिकारियों के बीच होने वाली चर्चा से प्रक्रिया की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।

नियुक्ति प्रक्रिया पर टिकी निगाहें

हरियाणा में लोकायुक्त का पद फिलहाल खाली हो चुका है और अब सभी की नजरें सरकार की अगली कार्रवाई पर हैं। एक ओर कानून पात्रता और नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट ढांचा उपलब्ध कराता है, वहीं दूसरी ओर सर्च कमेटी का प्रावधान न होने के कारण नाम तय करने की प्रक्रिया काफी हद तक सरकार के स्तर पर होने वाली कवायद पर निर्भर करेगी।

मुख्यमंत्री को निर्धारित संवैधानिक पदाधिकारियों से विचार-विमर्श करना होगा, लेकिन अंतिम सलाह को लेकर सरकार के पास पर्याप्त भूमिका बनी रहेगी। ऐसे में नए लोकायुक्त का नाम सामने आने तक राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में संभावित चेहरों को लेकर चर्चाएं जारी रहने की संभावना है।

जस्टिस हरिपाल वर्मा का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद अब हरियाणा को नए लोकायुक्त का इंतजार है। सरकार के सामने न केवल उपयुक्त न्यायिक अनुभव वाले व्यक्ति का चयन करने की जिम्मेदारी है, बल्कि इस नियुक्ति के जरिए संस्था की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और प्रभावी कामकाज को लेकर भी एक स्पष्ट संदेश देने की चुनौती है।