कई बच्चों के लिए स्कूल की शुरुआत उत्साह से भरी होती है, लेकिन कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो घर से निकलते ही रोने लगते हैं। स्कूल पहुंचने के बाद भी उनका रोना काफी देर तक जारी रहता है। कुछ बच्चे टीचर या दूसरे बच्चों से बातचीत नहीं करते, किसी गतिविधि में शामिल होने से बचते हैं और हर समय माता-पिता को अपने आसपास देखना चाहते हैं। खासकर 4 से 6 साल की उम्र में ऐसा व्यवहार कई परिवारों के लिए चिंता का कारण बन सकता है।
हालांकि, हर बार स्कूल जाने पर रोना इस बात का संकेत नहीं होता कि बच्चे के साथ कोई बड़ी समस्या है। कई बच्चों के लिए घर से निकलकर एक बिल्कुल नए वातावरण में जाना अपने आप में बड़ा बदलाव होता है। माता-पिता से अलग होना, नए चेहरे, अलग नियम और अनजान जगह उन्हें असहज कर सकती है। सही तरीके से साथ दिया जाए तो ज्यादातर बच्चे धीरे-धीरे इस बदलाव के साथ तालमेल बैठाने लगते हैं।
सबसे पहले समझें कि बच्चा स्कूल से क्यों घबरा रहा है
स्कूल जाने की अनिच्छा के पीछे हर बच्चा की वजह अलग हो सकती है। किसी बच्चे को माता-पिता से दूर होने का डर हो सकता है, तो कोई नया माहौल देखकर झिझक सकता है। कुछ बच्चे स्वभाव से ज्यादा संवेदनशील या शर्मीले होते हैं और उन्हें नए लोगों के बीच घुलने-मिलने में अधिक समय लगता है।
कभी-कभी कोई अप्रिय अनुभव भी बच्चे के मन में स्कूल को लेकर डर पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए, टीचर की डांट, किसी बच्चे का परेशान करना, किसी एक्टिविटी में असफल होने का डर या टॉयलेट जैसी किसी जरूरत को लेकर परेशानी। इसलिए केवल यह मान लेना सही नहीं है कि बच्चा जिद कर रहा है। उसके व्यवहार के पीछे की वजह जानना ज्यादा जरूरी है।
बच्चे के मन में कौन से सवाल चल सकते हैं?
छोटे बच्चे परिस्थितियों को हमेशा उसी तरह नहीं समझते जैसे बड़े लोग समझते हैं। माता-पिता के लिए यह साफ होता है कि वे कुछ घंटों बाद बच्चे को लेने वापस आएंगे, लेकिन बच्चे के लिए यह इंतजार काफी लंबा लग सकता है।
उसके मन में कई तरह के सवाल हो सकते हैं—
- मम्मी-पापा मुझे लेने कब आएंगे?
- अगर मुझे कोई परेशानी हुई तो कौन मदद करेगा?
- यहां मुझे कोई जानता नहीं है।
- अगर मैं रोऊंगा तो क्या होगा?
- क्या मुझे पूरे दिन यहीं रहना पड़ेगा?
- मैं घर वापस कब जाऊंगा?
यही अनिश्चितता बच्चे की चिंता बढ़ा सकती है। इसलिए उसे बार-बार केवल यह कहने के बजाय कि ‘रोना बंद करो’, उसकी चिंता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
कब तक रोना सामान्य माना जा सकता है?
स्कूल शुरू होने के शुरुआती दिनों में बच्चे का रोना या माता-पिता से अलग होने में परेशानी महसूस करना आम व्यवहार हो सकता है। कुछ बच्चों को नए वातावरण में सहज होने में दूसरों की तुलना में ज्यादा समय लगता है।
लेकिन अगर कई सप्ताह बीत जाने के बाद भी बच्चा हर दिन बहुत ज्यादा परेशान रहता है, स्कूल में शांत नहीं हो पाता या किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेता, तो स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जैसे बच्चा स्कूल के नाम से ही बहुत ज्यादा घबराने लगे, लगातार स्कूल जाने से मना करे, घर लौटने के बाद भी उसी चिंता में रहे या स्कूल के दिनों में बार-बार पेट दर्द, सिरदर्द, उल्टी या दूसरी शारीरिक शिकायतें करे। ऐसी स्थिति में माता-पिता को स्कूल से बातचीत करने के साथ जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह भी लेनी चाहिए।
बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करने की शुरुआत घर से करें
स्कूल जाने की आदत केवल स्कूल पहुंचने के बाद नहीं बनती। घर का माहौल और रोज की दिनचर्या भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कोशिश करें कि बच्चे के सोने और जागने का समय लगभग तय रहे। सुबह की तैयारी के लिए पर्याप्त समय रखें ताकि जल्दबाजी में बच्चा तनाव महसूस न करे।
सुबह उठने के बाद तैयार होना, नाश्ता करना, बैग लेना और फिर स्कूल के लिए निकलना—इस पूरी प्रक्रिया को एक नियमित पैटर्न में रखा जा सकता है। जब बच्चे को पहले से पता होता है कि आगे क्या होने वाला है, तो अनिश्चितता कम हो सकती है।
विदाई का समय जितना सरल होगा, उतना बेहतर
स्कूल के गेट पर बच्चे को छोड़ते समय माता-पिता का व्यवहार काफी मायने रखता है। बच्चे को प्यार से गले लगाएं, भरोसा दें और साफ शब्दों में बताएं कि आप उसे लेने वापस आएंगे।
मिसाल के तौर पर कहा जा सकता है ‘तुम सुरक्षित हो। मैं छुट्टी के समय तुम्हें लेने आऊंगा। अब तुम टीचर के साथ अंदर जाओ।’
इसके बाद विदाई को अनावश्यक रूप से लंबा न करें। बार-बार बच्चे के पास लौटना, लगातार उसे समझाते रहना या खुद भावुक होकर रोने लगना उसकी चिंता को और बढ़ा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि बच्चे की भावनाओं को नजरअंदाज करें, बल्कि उसे भरोसा देने के बाद एक स्पष्ट और शांत विदाई दें।
‘बड़े बच्चे नहीं रोते’ जैसी बातें न कहें
बच्चे के रोने पर उसे शर्मिंदा करना समस्या को हल नहीं करता। ‘इतनी सी बात पर क्यों रो रहे हो?’, ‘तुम तो बहुत कमजोर हो’ या ‘दूसरे बच्चे तो नहीं रोते’ जैसे वाक्य उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके बजाय उसकी भावना को स्वीकार करें। आप कह सकते हैं ‘मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हें मुझसे दूर होकर अच्छा नहीं लग रहा। नई जगह पर शुरुआत में ऐसा हो सकता है।’ जब बच्चा महसूस करता है कि उसके डर को समझा जा रहा है, तो वह धीरे-धीरे अपनी बात साझा करने के लिए तैयार हो सकता है।
स्कूल को सजा या डर से जोड़ना बंद करें
कई बार माता-पिता बच्चे को नियंत्रित करने के लिए स्कूल या टीचर का डर दिखाते हैं। जैसे ‘शरारत की तो टीचर डांटेंगी’ या ‘बात नहीं मानी तो स्कूल भेज देंगे।’ ऐसी बातें बच्चे के मन में स्कूल की नकारात्मक छवि बना सकती हैं।
इसके बजाय स्कूल को सीखने, खेलने, नई चीजें जानने और दोस्तों से मिलने वाली जगह के तौर पर प्रस्तुत करें। स्कूल के बारे में बातचीत करते समय सकारात्मक लेकिन वास्तविक भाषा का इस्तेमाल करें।
टीचर को बच्चे का सहयोगी बनाएं
अगर बच्चा स्कूल पहुंचने के बाद भी लंबे समय तक चुप रहता है या रोता है, तो क्लास टीचर से बात करना जरूरी है। माता-पिता उनसे जान सकते हैं कि बच्चा कक्षा में किस समय ज्यादा परेशान होता है और कब सामान्य व्यवहार करने लगता है।
यह भी पूछा जा सकता है कि बच्चा किन गतिविधियों में रुचि लेता है, क्या किसी सहपाठी के साथ वह ज्यादा सहज है और क्या स्कूल में ऐसी कोई परिस्थिति है जिससे वह डर रहा है। अगर घर और स्कूल दोनों जगह बच्चे को एक जैसा सहयोग और भरोसा मिलता है, तो उसके लिए नए वातावरण को स्वीकार करना आसान हो सकता है।
छोटी प्रगति को भी पहचानें
स्कूल जाने की आदत एक दिन में नहीं बनती। अगर बच्चा पहले पूरे समय रोता था और अब कुछ देर बाद शांत हो जाता है, तो यह भी सुधार है। अगर उसने पहली बार टीचर से बात की, किसी बच्चे के साथ खेला या किसी एक्टिविटी में हिस्सा लिया, तो उसकी कोशिश की तारीफ करें।
तारीफ करते समय केवल परिणाम पर जोर न दें। बच्चे से कहें कि उसने कोशिश की और हिम्मत दिखाई। इससे उसे अगली बार नई स्थिति का सामना करने का आत्मविश्वास मिल सकता है।
इन गलतियों से बचें
बच्चे की स्कूल से जुड़ी चिंता को कम करने के लिए कुछ व्यवहारों से बचना जरूरी है—
- हर बार रोने पर उसे स्कूल से वापस घर ले आना।
- दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करना।
- बच्चे को डराना या शर्मिंदा करना।
- अपनी चिंता उसके सामने बार-बार जाहिर करना।
- स्कूल या टीचर को सजा के रूप में पेश करना।
- बच्चे की बात सुने बिना यह मान लेना कि वह सिर्फ जिद कर रहा है।
- ऐसा वादा करना जिसे पूरा करना संभव न हो।
खास तौर पर बार-बार स्कूल से छुट्टी दिलाने से बच्चा यह सीख सकता है कि रोने या विरोध करने से वह उस परिस्थिति से बच सकता है। इसलिए बच्चे की परेशानी को समझते हुए भी स्कूल की नियमितता बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।
कब विशेषज्ञ की सलाह जरूरी हो सकती है?
अगर कई सप्ताह तक लगातार प्रयास करने के बावजूद बच्चे की स्थिति में सुधार नहीं हो रहा है, तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशियन से सलाह ली जा सकती है।
विशेष रूप से तब विशेषज्ञ से संपर्क करना उचित है, जब बच्चा स्कूल जाने से लगातार इनकार करे, बहुत ज्यादा घबराहट दिखाए, नींद या खाने के पैटर्न में बदलाव आए या स्कूल जाने के समय बार-बार शारीरिक शिकायतें करे।
अगर माता-पिता को किसी तरह की बुलिंग, डराने-धमकाने या स्कूल में किसी अप्रिय अनुभव का संदेह हो, तो स्कूल प्रशासन और संबंधित शिक्षकों से भी बात करनी चाहिए।
बच्चे को समय और भरोसा दें
स्कूल में सहज होने की प्रक्रिया हर बच्चे के लिए अलग हो सकती है। किसी बच्चे को कुछ दिन लगते हैं, जबकि किसी दूसरे बच्चे को कई सप्ताह। इसलिए केवल रोने को देखकर उसे जिद्दी या कमजोर समझना उचित नहीं है।
माता-पिता का शांत व्यवहार, नियमित दिनचर्या, शिक्षक के साथ संवाद और बच्चे की भावनाओं को स्वीकार करना इस बदलाव को आसान बना सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे को यह भरोसा महसूस हो कि स्कूल एक नई जगह जरूर है, लेकिन वह वहां अकेला नहीं है और जरूरत पड़ने पर बड़े लोग उसकी मदद के लिए मौजूद हैं।
स्कूल जाने की आदत दबाव से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बने भरोसे और सकारात्मक अनुभवों से मजबूत होती है। इसलिए बच्चे के आंसुओं को केवल रोकने की कोशिश करने के बजाय यह समझना ज्यादा जरूरी है कि उन आंसुओं के पीछे कौन-सी चिंता छिपी है।




