बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के प्रस्तावित भारत दौरे से पहले दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत में गंगा जल बंटवारे का मुद्दा प्रमुखता से उभरकर सामने आया है। ढाका अब केवल 1996 की गंगा जल संधि को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह भारत के साथ पानी के बंटवारे को लेकर एक नए समझौते की मांग कर रहा है। बांग्लादेश का कहना है कि नए समझौते में उसके हिस्से के पानी की स्पष्ट और प्रभावी गारंटी होनी चाहिए, खासकर सूखे के मौसम में।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब भारत और बांग्लादेश तारिक रहमान की नवंबर में प्रस्तावित नई दिल्ली यात्रा के लिए बातचीत कर रहे हैं। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों देशों के अधिकारी दौरे का एजेंडा तैयार करने के लिए लगातार संपर्क में हैं। इसी बीच गंगा जल संधि की अवधि भी खत्म होने वाली है। 12 दिसंबर 1996 को हुई यह संधि 30 साल के लिए लागू की गई थी और दिसंबर 2026 में इसकी अवधि पूरी हो जाएगी।
पानी के मुद्दे को लेकर ढाका का रुख क्यों बदला?
बांग्लादेश लंबे समय से खुद को गंगा नदी के निचले तटवर्ती देश के रूप में देखते हुए सूखे के मौसम में पर्याप्त पानी की उपलब्धता की मांग करता रहा है। अब उसकी मौजूदा सरकार चाहती है कि भविष्य की व्यवस्था केवल पुरानी संधि के विस्तार तक सीमित न रहे। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री एमडी शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने सितंबर में कहा कि ढाका भारत के साथ गंगा जल बंटवारे के लिए नया समझौता चाहता है और इसमें गारंटी क्लॉज शामिल करने की मांग करेगा।
ढाका की दलील है कि नई व्यवस्था में उसके राष्ट्रीय हितों और पानी की वास्तविक जरूरतों को बेहतर तरीके से शामिल किया जाना चाहिए। खास तौर पर सूखे के महीनों में नदी के प्रवाह को लेकर गारंटी की मांग की जा रही है। बांग्लादेश ने यह भी संकेत दिया है कि मानसून के दौरान अत्यधिक पानी आने से होने वाले नुकसान को भी भविष्य की व्यवस्था में ध्यान में रखा जाना चाहिए। यानी ढाका की चिंता केवल कम पानी मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि बाढ़ और अत्यधिक प्रवाह से होने वाले नुकसान को भी बातचीत का हिस्सा बनाने की कोशिश है।
1996 की संधि में क्या व्यवस्था थी?
भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे की मौजूदा व्यवस्था 12 दिसंबर 1996 को अस्तित्व में आई थी। इस संधि के तहत फरक्का पर गंगा के उपलब्ध पानी के आधार पर दोनों देशों के हिस्से का निर्धारण किया जाता है। बांग्लादेश के आधिकारिक संयुक्त नदी आयोग के अनुसार यह व्यवस्था हर साल मुख्य रूप से जनवरी से मई के दौरान लागू होती है। मौजूदा संधि 2026 में समाप्त होनी है।
संधि में अलग-अलग जल उपलब्धता के स्तर के हिसाब से पानी बांटने का फार्मूला निर्धारित किया गया है। इसमें कुछ परिस्थितियों में दोनों देशों के लिए 35 हजार क्यूसेक पानी की गारंटी से जुड़ी व्यवस्था भी शामिल है। समझौते में यह भी कहा गया है कि दोनों सरकारें सूखे मौसम में गंगा के प्रवाह को बढ़ाने की दीर्घकालिक समस्या का समाधान खोजने में सहयोग करेंगी।
अब बांग्लादेश इस पूरी व्यवस्था को नए सिरे से देखने की बात कर रहा है। इसलिए दिसंबर की समय-सीमा नजदीक आने के साथ पानी का मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों में महत्वपूर्ण कूटनीतिक विषय बन गया है।
तारिक रहमान की यात्रा से इसे क्यों जोड़ा जा रहा है?
तारिक रहमान के भारत दौरे को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत पहले से चल रही है। रिपोर्टों के अनुसार नवंबर के दूसरे हिस्से में उनके नई दिल्ली आने की संभावना पर काम किया जा रहा है। इससे पहले भी दौरे को लेकर बातचीत हुई थी, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में राजनीतिक मतभेदों के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी थी। अब अधिकारी दोबारा यात्रा का कार्यक्रम और संभावित एजेंडा तैयार कर रहे हैं।
17 सितंबर को ढाका में दोनों देशों के संबंधों और संभावित यात्रा से जुड़े मुद्दों पर उच्चस्तरीय बैठक होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इसके बाद भारत और बांग्लादेश के वरिष्ठ अधिकारी संपर्क में हैं। बांग्लादेश के विदेश सचिव असद आलम सियाम को भारत में नया उच्चायुक्त नियुक्त किया गया है। वह नई दिल्ली में मौजूदा राजनयिक व्यवस्था संभालने वाले हैं, ऐसे में उनकी नियुक्ति को भी दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ाने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है।
यात्रा के एजेंडे में व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों के साथ गंगा जल संधि भी शामिल हो सकती है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों से यह कहना अधिक सटीक है कि ये मुद्दे दौरे की बातचीत में महत्वपूर्ण तत्व बन रहे हैं; यह स्पष्ट नहीं है कि भारत ने पानी की नई संधि को तारिक रहमान की यात्रा की औपचारिक पूर्व शर्त के रूप में स्वीकार किया है।
शेख हसीना का मुद्दा भी बातचीत में अहम
गंगा जल के साथ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत में मौजूदगी भी भारत-बांग्लादेश संबंधों में संवेदनशील विषय बनी हुई है। बांग्लादेश की ओर से पहले ही शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की जा चुकी है। अगस्त में बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने तारिक रहमान की संभावित भारत यात्रा के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की जरूरत बताई थी और शेख हसीना के प्रत्यर्पण समेत अन्य मामलों पर भारत से कार्रवाई की मांग की थी।
इसके बाद भी ढाका ने भारत में शेख हसीना की सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों और बयानों पर आपत्ति जताई है। सितंबर में तारिक रहमान की प्रस्तावित यात्रा से जुड़ी रिपोर्टों में यह मुद्दा फिर सामने आया। ऐसे में पानी और शेख हसीना से संबंधित विषय दोनों देशों के बीच आगामी उच्चस्तरीय बातचीत में संवेदनशील मुद्दे बने हुए हैं।
सिर्फ गंगा नहीं, 54 साझा नदियों का सवाल
भारत और बांग्लादेश के बीच केवल गंगा ही साझा नदी नहीं है। दोनों देशों के बीच 54 साझा नदियां हैं। भारत के विदेश मंत्रालय की उपलब्ध जानकारी के मुताबिक गंगा के लिए 1996 में संधि हुई थी, जबकि तीस्ता और कई अन्य नदियों पर अलग-अलग स्तर पर बातचीत होती रही है।
इसी वजह से बांग्लादेश अब जल प्रबंधन को केवल एक नदी तक सीमित रखने के बजाय व्यापक नदी-तंत्र के नजरिए से देखने की मांग करता रहा है। 2011 के भारत-बांग्लादेश फ्रेमवर्क में भी साझा नदियों के जल संसाधन प्रबंधन को समग्र तरीके से देखने और कॉमन बेसिन मैनेजमेंट की दिशा में काम करने की बात दर्ज की गई थी।
अगर भविष्य में गंगा संधि की जगह कोई ज्यादा व्यापक व्यवस्था तैयार होती है, तो उसमें केवल भारत और बांग्लादेश की केंद्रीय सरकारों की बातचीत ही पर्याप्त नहीं होगी। नदी जल से जुड़े घरेलू हित, सिंचाई, पेयजल, कृषि और बिजली उत्पादन जैसी जरूरतें भी महत्वपूर्ण होंगी।
भारत के लिए राज्यों के हित भी बड़ा मुद्दा
गंगा जल समझौते का असर केवल अंतरराष्ट्रीय सीमा तक सीमित नहीं है। भारत के भीतर भी पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों की जल जरूरतें इस विषय से जुड़ी हैं। सितंबर में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बिहार के जल हितों को ध्यान में रखने की बात कही थी, जबकि केंद्र की ओर से पहले भी पश्चिम बंगाल सहित संबंधित पक्षों से इनपुट लिए जाने की जानकारी सामने आ चुकी है।
यही वजह है कि किसी भी नई व्यवस्था पर बातचीत करते समय भारत के लिए घरेलू जल जरूरतों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा। पानी संविधान के तहत मुख्य रूप से राज्य सूची से जुड़ा विषय है, जबकि अंतरराज्यीय नदियों और नदी घाटियों से संबंधित कुछ पहलुओं पर केंद्र की भूमिका भी है। इसके अलावा अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था मौजूद है।
इस पृष्ठभूमि में किसी नई अंतरराष्ट्रीय जल संधि का स्वरूप तय करते समय केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक होगा। यही कारण है कि गंगा जल समझौते पर होने वाली बातचीत केवल विदेश नीति का विषय नहीं रह जाती, बल्कि इसका सीधा संबंध घरेलू जल प्रबंधन और राज्यों की जरूरतों से भी जुड़ जाता है।
नई संधि में क्या चाह रहा है बांग्लादेश?
बांग्लादेश की मौजूदा मांगों को देखें तो उसका मुख्य जोर तीन बातों पर दिखाई देता है। पहली, वह 1996 की संधि को केवल यथावत आगे बढ़ाने के बजाय नया समझौता चाहता है। दूसरी, वह सूखे मौसम में अपने हिस्से के पानी को लेकर स्पष्ट गारंटी की मांग कर रहा है। तीसरी, वह मानसून के दौरान अत्यधिक जल प्रवाह से होने वाले नुकसान को भी व्यवस्था में शामिल करना चाहता है।
बांग्लादेश के लिए यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी का बड़ा हिस्सा उसके भूभाग में निचले प्रवाह वाले क्षेत्र से होकर गुजरता है। दूसरी तरफ भारत के लिए गंगा बेसिन में कृषि, पेयजल, उद्योग और अन्य जल जरूरतों को संतुलित करना जरूरी है।
अब आगे क्या होगा?
अगला बड़ा पड़ाव तारिक रहमान की संभावित नवंबर यात्रा और दिसंबर में मौजूदा गंगा जल संधि की समाप्ति है। दोनों घटनाएं लगभग एक ही समय-सीमा में होने के कारण पानी का मुद्दा भारत-बांग्लादेश कूटनीति में विशेष महत्व रखता है।
बांग्लादेश की तरफ से नई संधि की मांग स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी है, जबकि भारत की ओर से किसी नए समझौते के अंतिम स्वरूप की घोषणा अभी नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल यह मामला बातचीत और कूटनीतिक विचार-विमर्श के चरण में है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश 1996 की व्यवस्था को किस रूप में आगे बढ़ाते हैं—क्या मौजूदा संधि में संशोधन या नवीनीकरण होता है, या फिर दोनों देश नई शर्तों और गारंटी के साथ अलग समझौते की दिशा में बढ़ते हैं। इसी बातचीत के साथ शेख हसीना से जुड़ा विवाद, व्यापार और अन्य द्विपक्षीय मुद्दे भी भारत-बांग्लादेश संबंधों के व्यापक एजेंडे को प्रभावित करेंगे।




