अगर आपका बच्चा स्कूल जाने के लिए घर से निकलते ही रास्ते में किसी चीज को देखकर रुक जाता है, हर थोड़ी देर में सवाल पूछता है या किसी एक काम को करते-करते अचानक दूसरी चीज में दिलचस्पी लेने लगता है, तो इसे केवल शरारत समझना सही नहीं हो सकता। कई माता-पिता ऐसी आदतों से परेशान होकर बच्चों को बार-बार टोकते हैं। कुछ मामलों में तो बच्चे के इस व्यवहार को अनुशासन की कमी या ध्यान से जुड़ी समस्या तक मान लिया जाता है।
लेकिन बच्चों के ध्यान को लेकर हुई एक वैज्ञानिक रिसर्च इस व्यवहार को समझने का एक अलग नजरिया सामने रखती है। ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक व्लादिमीर स्लौत्स्की के शोध के मुताबिक, कम उम्र में बच्चों का बार-बार अलग-अलग चीजों की तरफ आकर्षित होना उनके सीखने की प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
यानी जिस व्यवहार को बड़े लोग अक्सर ‘ध्यान भटकना’ कहते हैं, वही किसी बच्चे के लिए आसपास की दुनिया को समझने और नई जानकारी हासिल करने का जरिया भी हो सकता है।
बच्चों का दिमाग हर चीज को क्यों नोटिस करता है?
बचपन में दिमाग लगातार नई जानकारी इकट्ठा करता रहता है। घर, स्कूल, सड़क, खिलौने, आवाजें, लोगों की बातचीत और आसपास होने वाली छोटी-छोटी घटनाएं बच्चे के लिए सीखने का मौका होती हैं। यही वजह है कि बच्चे कई बार उस चीज पर भी ध्यान देने लगते हैं जिसे कोई बड़ा व्यक्ति आसानी से नजरअंदाज कर देता है।
स्लौत्स्की की रिसर्च के मुताबिक, करीब 3 से 8 साल की उम्र के बच्चों में अपने आसपास की चीजों को तलाशने और उनसे नई जानकारी हासिल करने की प्रवृत्ति काफी मजबूत होती है। उनके लिए दुनिया अभी पूरी तरह जानी-पहचानी नहीं होती। इसलिए उनका दिमाग लगातार यह समझने की कोशिश करता रहता है कि आसपास क्या हो रहा है और नई चीजों का क्या मतलब है।
इस उम्र में बच्चा अगर चलते-चलते किसी दुकान, वाहन, जानवर या आवाज की तरफ आकर्षित हो जाता है, तो जरूरी नहीं कि वह जानबूझकर अपना काम टाल रहा हो। संभव है कि उसका दिमाग उस नई जानकारी को समझने की कोशिश कर रहा हो।
बड़ों और बच्चों में ध्यान लगाने का फर्क
बड़े होने के साथ इंसान के दिमाग में ऐसी क्षमता विकसित होती जाती है, जिसकी मदद से वह जरूरी और गैर-जरूरी सूचनाओं के बीच फर्क कर पाता है। उदाहरण के लिए, किसी ऑफिस में काम करते समय व्यक्ति आसपास चल रही बातचीत, आवाजों या दूसरी गतिविधियों को नजरअंदाज करके अपनी स्क्रीन पर मौजूद काम पर ध्यान बनाए रख सकता है।
बच्चों में यह क्षमता अभी विकास के दौर में होती है। उनके लिए यह तय करना उतना आसान नहीं होता कि सामने मौजूद दर्जनों चीजों में से किसे नजरअंदाज करना है और किस पर ध्यान देना है।
रिसर्च में इसे ‘डिस्ट्रिब्यूटेड अटेंशन’ यानी ध्यान का अलग-अलग चीजों में बंटना बताया गया है। बच्चा एक ही समय में कई चीजों को नोटिस कर सकता है। यही वजह है कि वह किसी एक गतिविधि के दौरान अचानक दूसरी चीज के बारे में सवाल करने लगता है।
वर्किंग मेमोरी का भी है बड़ा संबंध
बच्चों के इस व्यवहार को समझने के लिए ‘वर्किंग मेमोरी’ की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वर्किंग मेमोरी को आसान भाषा में दिमाग की उस व्यवस्था के तौर पर समझा जा सकता है, जो थोड़े समय के लिए जरूरी जानकारी को संभालकर रखने और उसी के आधार पर काम करने में मदद करती है।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी वर्किंग मेमोरी और ध्यान को नियंत्रित करने की क्षमता भी विकसित होती है। इससे वह यह समझने लगता है कि किसी काम के दौरान कौन-सी जानकारी उपयोगी है और किन चीजों को फिलहाल नजरअंदाज किया जा सकता है।
छोटे बच्चों में यह फिल्टर अभी उतना मजबूत नहीं होता। इसलिए उनके आसपास मौजूद ज्यादा चीजें उनके लिए आकर्षण का कारण बन सकती हैं। यही कारण है कि कोई बच्चा होमवर्क करते समय पेंसिल से खेलने लगे, पढ़ाई के बीच कोई सवाल पूछ दे या कमरे में रखी किसी वस्तु के बारे में जानना चाहे।
जानकारी मिल जाने के बाद भी बच्चे क्यों नहीं रुकते?
इस रिसर्च का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बच्चों की खोज करने की प्रवृत्ति केवल तब तक सीमित नहीं रहती, जब तक उन्हें किसी सवाल का जवाब नहीं मिल जाता।
साल 2024 में व्लादिमीर स्लौत्स्की और कियानकियान वान ने बच्चों के व्यवहार को लेकर एक अन्य अध्ययन किया था। इसमें यह संकेत मिला कि किसी काम को पूरा करने के लिए जरूरी जानकारी हासिल कर लेने के बाद भी बच्चे आसपास मौजूद दूसरी सूचनाओं को तलाशना जारी रख सकते हैं।
मसलन, अगर बच्चा किसी खिलौने को चलाने का तरीका समझ गया है, तो उसके बाद भी वह उसके दूसरे हिस्सों को देखने, उन्हें छूने या यह पता लगाने की कोशिश कर सकता है कि वह और क्या कर सकता है।
बड़ों को यह व्यवहार कभी-कभी बेवजह की छेड़छाड़ या काम से हटना लग सकता है। लेकिन सीखने की प्रक्रिया के नजरिए से देखा जाए तो बच्चा अपनी जानकारी का दायरा बढ़ा रहा होता है।
बच्चों के लिए गलती करना भी सीखने का हिस्सा
बच्चों में प्रयोग करने की इच्छा बहुत स्वाभाविक होती है। वे किसी वस्तु को छूकर, उसे घुमाकर, खोलकर या अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करके उसके बारे में समझ विकसित करते हैं।
इसीलिए विशेषज्ञों की सलाह है कि सुरक्षित परिस्थितियों में बच्चों को चीजों को खुद आजमाने का अवसर दिया जाना चाहिए। हर छोटी गलती पर तुरंत रोकने या डांटने के बजाय यह देखना ज्यादा जरूरी है कि बच्चा उस अनुभव से क्या सीख रहा है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चे को बिना किसी सीमा के कुछ भी करने दिया जाए। खतरनाक वस्तुओं, सड़क, बिजली, आग या ऐसी दूसरी परिस्थितियों में सुरक्षा संबंधी नियम जरूरी हैं। लेकिन जहां जोखिम नहीं है, वहां बच्चे को प्रयोग करने की थोड़ी आजादी देना उसके सीखने में मदद कर सकता है।
वयस्क भी कभी-कभी बच्चों जैसा व्यवहार क्यों करने लगते हैं?
शोधकर्ताओं ने केवल बच्चों के ध्यान का ही अध्ययन नहीं किया, बल्कि यह भी देखने की कोशिश की कि वयस्कों की ध्यान क्षमता पर दबाव पड़ने पर क्या होता है।
प्रयोगों में जब वयस्कों की वर्किंग मेमोरी पर काफी अधिक मानसिक बोझ डाला गया, तो उनके लिए भी जरूरी जानकारी पर लगातार ध्यान बनाए रखना मुश्किल हुआ। ऐसी स्थिति में उनका ध्यान कई विकल्पों और सूचनाओं की तरफ बंटने लगा।
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ध्यान केंद्रित करना केवल इच्छाशक्ति का मामला नहीं है। दिमाग पर मौजूद मानसिक भार भी यह तय करता है कि व्यक्ति कितनी जानकारी को एक साथ संभाल सकता है।
बच्चों में यह क्षमता अभी पूरी तरह विकसित नहीं होती, जबकि वयस्कों में यह अपेक्षाकृत मजबूत होती है। इसलिए दोनों के व्यवहार में अंतर दिखाई देता है। लेकिन जब वयस्क की मानसिक क्षमता पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ता है, तो उसका ध्यान भी अलग-अलग दिशाओं में जाने लगता है।
हर बार ध्यान भटकने को ADHD मानना सही नहीं
बच्चे का कभी-कभी पढ़ाई से हट जाना, सवाल पूछना, आसपास की चीजों को देखना या रास्ते में किसी नई चीज को देखकर रुक जाना अपने आप में किसी बीमारी या डिसऑर्डर का प्रमाण नहीं है।
ADHD जैसी स्थिति का आकलन केवल एक-दो आदतों के आधार पर नहीं किया जाता। इसके लिए बच्चे के व्यवहार, उसकी उम्र, अलग-अलग परिस्थितियों में उसकी गतिविधियों और विशेषज्ञ द्वारा किए गए मूल्यांकन जैसे कई पहलुओं को देखा जाता है।
इसलिए केवल इसलिए कि बच्चा लंबे समय तक एक जगह शांत नहीं बैठता या बार-बार सवाल करता है, तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। अगर माता-पिता को बच्चे के व्यवहार को लेकर लगातार गंभीर चिंता है, तो योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना ज्यादा सही तरीका है।
माता-पिता बच्चे के साथ कैसे पेश आएं?
रिसर्च से मिलने वाला महत्वपूर्ण संदेश यह है कि बच्चे के सवालों और जिज्ञासा को केवल परेशान करने वाली आदत के रूप में न देखा जाए। जब बच्चा बार-बार ‘क्यों’, ‘कैसे’ और ‘क्या’ पूछता है, तो वह अपने आसपास की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा हो सकता है।
माता-पिता उसके सवालों का जवाब उसकी उम्र के अनुसार देने की कोशिश कर सकते हैं। अगर बच्चा किसी सुरक्षित वस्तु को लेकर उत्सुक है, तो उसे उसे देखने और समझने का अवसर दिया जा सकता है।
बच्चे के लिए ऐसा माहौल उपयोगी हो सकता है, जहां सवाल पूछना गलत न माना जाए और छोटी-छोटी गलतियों से सीखने की गुंजाइश हो। साथ ही, रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए सरल नियम और सीमाएं भी तय की जा सकती हैं।
डांटने के बजाय समझना ज्यादा जरूरी
बच्चे का ध्यान बार-बार बदलना माता-पिता के लिए निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब स्कूल के लिए देर हो रही हो या कोई जरूरी काम पूरा करना हो। ऐसे समय पर बच्चे को निर्देश स्पष्ट और छोटे हिस्सों में देना मददगार हो सकता है।
मसलन, एक साथ कई बातें कहने के बजाय पहले एक काम पूरा करने को कहा जाए और फिर अगला निर्देश दिया जाए। इससे बच्चे को जानकारी समझने और उस पर काम करने में आसानी हो सकती है।
सबसे अहम बात यह है कि हर बार बच्चे के भटकते ध्यान को जिद या बदतमीजी के रूप में देखने के बजाय उसके विकास के संदर्भ में समझने की कोशिश की जाए।
वैज्ञानिकों की यह रिसर्च बताती है कि बचपन में दुनिया को देखने का तरीका बड़ों से अलग होता है। बच्चे जिन चीजों को देख रहे हैं, छू रहे हैं और जिनके बारे में सवाल कर रहे हैं, वे उनके लिए नई जानकारी के स्रोत हो सकते हैं। इसलिए सुरक्षित माहौल में उनकी जिज्ञासा को जगह देना और जरूरत पड़ने पर सही दिशा दिखाना उनके सीखने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
(Photo : AI Generated)




