पितृपक्ष शुरू होते ही देशभर में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण कर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। हिंदू धार्मिक परंपरा में इन दिनों को पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का समय माना जाता है। कई परिवार अपने घरों में ही श्राद्ध कर्म करते हैं, जबकि कुछ लोग धार्मिक और तीर्थ स्थलों पर जाकर पिंडदान और तर्पण की परंपरा निभाते हैं। मध्य प्रदेश का उज्जैन भी ऐसे प्रमुख धार्मिक स्थानों में गिना जाता है, जहां क्षिप्रा नदी के तट पर लंबे समय से पितृ कर्म किए जाने की परंपरा चली आ रही है।
उज्जैन को आमतौर पर महाकाल की नगरी के नाम से जाना जाता है। यहां स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। हालांकि, उज्जैन की धार्मिक पहचान केवल महाकाल मंदिर तक सीमित नहीं है। क्षिप्रा नदी के किनारे मौजूद कई प्राचीन तीर्थ और धार्मिक स्थल शहर को पितृ कर्मों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। इन्हीं स्थानों में सिद्धवट और रामघाट का विशेष उल्लेख मिलता है।
सिद्धवट में क्यों किया जाता है पितृ कर्म?
उज्जैन शहर से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर क्षिप्रा नदी के किनारे सिद्धवट स्थित है। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इसे पवित्र तीर्थ माना जाता है। उज्जैन जिला प्रशासन की जानकारी के अनुसार, सिद्धवट को पापमोचन तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान की पहचान यहां मौजूद प्राचीन वट वृक्ष से भी जुड़ी हुई है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस वट वृक्ष की स्थापना माता पार्वती ने की थी और उन्होंने इसकी पूजा भी की थी। इसी मान्यता के कारण सिद्धवट का धार्मिक महत्व श्रद्धालुओं के बीच लंबे समय से बना हुआ है। पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में धार्मिक कर्मकांड करते हैं।
सिद्धवट पर श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त पिंड अर्पित करते हैं और जल से तर्पण करते हैं। धार्मिक विश्वास के मुताबिक, पितृपक्ष में किए गए ऐसे कर्म पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम हैं।
रामघाट का भगवान राम से क्या संबंध है?
उज्जैन की पितृ परंपरा में रामघाट का भी खास धार्मिक संदर्भ बताया जाता है। क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित यह स्थान शहर के प्रसिद्ध घाटों में शामिल है। इसके साथ एक प्रचलित मान्यता जुड़ी हुई है कि भगवान राम ने अपने माता-पिता के लिए इसी स्थान पर पिंडदान किया था।
इसी धार्मिक कथा के आधार पर रामघाट को पितृ कर्मों से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, भगवान राम द्वारा यहां पिंडदान किए जाने की बात धार्मिक मान्यता के रूप में प्रचलित है। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान आज भी तर्पण और पिंडदान की परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।
उज्जैन में क्षिप्रा नदी, रामघाट, सिद्धवट और महाकालेश्वर जैसे धार्मिक केंद्र एक व्यापक तीर्थ परंपरा का हिस्सा हैं। यही कारण है कि पितृपक्ष के समय उज्जैन में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं और लोग अपने पूर्वजों के निमित्त विभिन्न कर्मकांड करने के लिए इन स्थानों का रुख करते हैं।
पिंडदान और तर्पण में क्या किया जाता है?
पिंडदान की परंपरा में पूर्वजों के नाम से पिंड अर्पित किए जाते हैं। वहीं तर्पण में जल अर्पित कर पितरों का स्मरण किया जाता है। हिंदू मान्यताओं में पितृपक्ष को ऐसा समय माना गया है जब परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करता है।
कई परिवार उस तिथि पर श्राद्ध करते हैं, जिस तिथि को उनके परिवार में किसी पूर्वज का निधन हुआ था। इसके लिए पितृपक्ष की संबंधित तिथि को महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी विशेष कारण से नहीं हो पाया हो, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसी वजह से पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि का धार्मिक महत्व होता है और अलग-अलग दिनों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार श्राद्ध कर्म किए जाते हैं।
इस साल 15 दिनों में होंगी 16 श्राद्ध तिथियां
साल 2026 के पितृपक्ष की एक खास बात यह है कि इस बार 15 दिनों के भीतर 16 तिथियों के श्राद्ध होंगे। सामान्य तौर पर पितृपक्ष को 16 दिनों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस वर्ष तिथियों के क्रम में बदलाव के कारण इसकी अवधि 15 दिनों की रहेगी।
इसका कारण चतुर्थी और पंचमी तिथि का एक ही दिन पड़ना है। दोनों तिथियों का श्राद्ध 30 सितंबर को किया जाएगा। तिथि के इस प्रकार एक ही दिन समाहित होने को तिथि क्षय से जोड़ा जाता है। इसलिए इस बार 16 तिथियों के श्राद्ध कर्म 15 दिनों में पूरे होंगे।
पितृपक्ष की शुरुआत 27 सितंबर से हुई है और इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस दौरान लोग अपनी पारिवारिक परंपरा और पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं।
2026 में किस दिन कौन सा श्राद्ध?
पितृपक्ष के दौरान अलग-अलग तिथियों के श्राद्ध की तारीखें इस प्रकार हैं:
27 सितंबर, रविवार – प्रतिपदा श्राद्ध
पितृपक्ष के आरंभ के साथ प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा।
28 सितंबर, सोमवार – द्वितीया श्राद्ध
इस दिन द्वितीया तिथि के अनुसार पितरों का श्राद्ध कर्म होगा।
29 सितंबर, मंगलवार – तृतीया श्राद्ध और महाभरणी
तृतीया श्राद्ध के साथ इस दिन महाभरणी का भी धार्मिक महत्व रहेगा।
30 सितंबर, बुधवार – चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध
इस वर्ष की विशेष स्थिति के कारण चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों के श्राद्ध इसी दिन होंगे।
1 अक्टूबर, गुरुवार – षष्ठी श्राद्ध
पितृपक्ष के क्रम में षष्ठी तिथि का श्राद्ध इस दिन होगा।
2 अक्टूबर, शुक्रवार – सप्तमी श्राद्ध
सप्तमी तिथि से संबंधित श्राद्ध कर्म शुक्रवार को किया जाएगा।
3 अक्टूबर, शनिवार – अष्टमी श्राद्ध
इस दिन अष्टमी तिथि का श्राद्ध होगा।
4 अक्टूबर, रविवार – नवमी श्राद्ध
नवमी तिथि के अनुसार पितरों का श्राद्ध रविवार को किया जाएगा।
5 अक्टूबर, सोमवार – दशमी श्राद्ध
दशमी तिथि का श्राद्ध इस दिन निर्धारित है।
6 अक्टूबर, मंगलवार – एकादशी श्राद्ध
एकादशी तिथि के लिए श्राद्ध कर्म मंगलवार को होगा।
7 अक्टूबर, बुधवार – द्वादशी और मघा श्राद्ध
इस दिन द्वादशी के साथ मघा नक्षत्र से संबंधित श्राद्ध का भी उल्लेख है।
8 अक्टूबर, गुरुवार – त्रयोदशी श्राद्ध
त्रयोदशी तिथि का श्राद्ध इस दिन किया जाएगा।
9 अक्टूबर, शुक्रवार – चतुर्दशी श्राद्ध
पितृपक्ष के अंतिम चरण में चतुर्दशी श्राद्ध होगा।
10 अक्टूबर, शनिवार – सर्वपितृ अमावस्या
सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस वर्ष के पितृपक्ष का समापन होगा। जिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
उज्जैन में पितृपक्ष की अलग धार्मिक पहचान
उज्जैन का धार्मिक महत्व महाकालेश्वर मंदिर और क्षिप्रा नदी के कारण पहले से ही व्यापक है। इसके साथ सिद्धवट और रामघाट जैसे स्थानों की पितृ कर्म से जुड़ी परंपराएं इस नगरी को एक अलग पहचान देती हैं। पितृपक्ष के दौरान यहां श्रद्धालु अपने पूर्वजों को याद करते हुए तर्पण और पिंडदान की परंपरा निभाते हैं।
सिद्धवट से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं, रामघाट से संबंधित भगवान राम के पिंडदान की कथा और क्षिप्रा नदी का धार्मिक महत्व मिलकर उज्जैन को पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के प्रमुख स्थलों में शामिल करते हैं। यही वजह है कि पितृपक्ष के दिनों में इस प्राचीन धार्मिक नगरी का महत्व श्रद्धालुओं के बीच और बढ़ जाता है।
(Photo : AI Generated)




