भाद्रपद अमावस्या इस बार दो दिन, 10 सितंबर को कुशग्रहणी और 11 को स्नान-दान: पितरों के लिए दोपहर में करें धूप-ध्यान

भाद्रपद अमावस्या इस बार दो दिन, 10 सितंबर को कुशग्रहणी और 11 को स्नान-दान: पितरों के लिए दोपहर में करें धूप-ध्यान

हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को विशेष धार्मिक महत्व दिया गया है। इस दिन पूर्वजों का स्मरण करने, उनके निमित्त तर्पण करने और जरूरतमंद लोगों को दान देने की परंपरा रही है। इस बार भाद्रपद मास की अमावस्या को लेकर तिथि दो दिनों में पड़ रही है। पंचांग के अनुसार अमावस्या 10 सितंबर की सुबह 10 बजकर 33 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन यानी 11 सितंबर की सुबह 8 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। तिथि के इसी समय के कारण दोनों दिनों के धार्मिक कार्य अलग-अलग माने जा रहे हैं।

10 सितंबर को कुशग्रहणी अमावस्या मनाई जाएगी, जबकि 11 सितंबर को स्नान-दान की अमावस्या के रूप में धार्मिक कार्य किए जाएंगे। भाद्रपद अमावस्या को कई स्थानों पर पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं परिवार की खुशहाली और संतान के अच्छे स्वास्थ्य तथा दीर्घायु की कामना से व्रत और पूजा करती हैं।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या से जुड़ी कई धार्मिक परंपराएं प्राचीन समय से चली आ रही हैं। इनमें कुशा घास का संग्रह करना भी प्रमुख है। पूजा-पाठ, तर्पण, श्राद्ध और दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का उपयोग महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वजह से इस अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या कहा गया।

कुशग्रहणी अमावस्या पर कुशा घास जुटाने की परंपरा

सनातन परंपरा में कुशा घास को पवित्र माना गया है। धार्मिक अनुष्ठानों में इसका इस्तेमाल आसन से लेकर तर्पण और श्राद्ध कर्म तक अलग-अलग कार्यों में किया जाता है। मान्यता है कि कुशा के बिना कई तरह के धार्मिक कर्म पूरे नहीं माने जाते।

पुराने समय में जब लोगों को वर्षभर पूजा-पाठ और पितरों से संबंधित कर्मकांड के लिए कुशा की जरूरत पड़ती थी, तब वे भाद्रपद मास की अमावस्या के दिन ही इसे एकत्र करके सुरक्षित रखते थे। वर्षभर होने वाले धार्मिक कार्यों में इसी कुशा का उपयोग किया जाता था। धीरे-धीरे इस परंपरा के कारण भाद्रपद अमावस्या को कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से पहचान मिलने लगी।

इस दिन श्रद्धालु धार्मिक नियमों का पालन करते हुए कुशा एकत्र करते हैं। इसका इस्तेमाल बाद में होने वाले तर्पण, श्राद्ध और पूजा-पाठ में किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को शुद्ध और पवित्र रखना महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए कुशा का विशेष स्थान बताया गया है।

दोपहर में पितरों का स्मरण करना माना जाता है शुभ

अमावस्या का दिन पूर्वजों को समर्पित कर्मों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन परिवार के लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हैं और उनके लिए जल अर्पित करते हैं। श्रद्धा के साथ किया गया तर्पण पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम माना जाता है।

अमावस्या की दोपहर में घर में पितरों का ध्यान करके धूप-ध्यान किया जा सकता है। इस दौरान पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त प्रार्थना करने की परंपरा है। मान्यता है कि पितरों के प्रति श्रद्धा रखने और उनके नाम से किए गए पुण्य कार्यों से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

इस अवसर पर जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना, वस्त्र देना अथवा उनकी जरूरत की दूसरी वस्तुएं उपलब्ध कराना भी शुभ माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। दान करते समय दिखावे के बजाय श्रद्धा और सेवा की भावना को प्राथमिकता देने की परंपरा है।

पवित्र स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य

भाद्रपद अमावस्या पर स्नान का भी विशेष महत्व बताया गया है। जिन श्रद्धालुओं के लिए संभव हो, वे किसी पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थस्थल में स्नान कर सकते हैं। गंगा, यमुना, नर्मदा और शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने की धार्मिक परंपरा है।

स्नान के बाद सूर्यदेव को जल चढ़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है। श्रद्धालु तांबे के पात्र में जल लेकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं और परिवार के स्वास्थ्य एवं सुख की कामना करते हैं।

जो लोग किसी नदी या तीर्थस्थल तक नहीं जा सकते, वे घर पर ही स्नान कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर इसे पवित्र भाव से किया जा सकता है। इसके बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देकर पूजा-अर्चना की जाती है।

जरूरतमंदों को इन चीजों का कर सकते हैं दान

अमावस्या के दिन दान-पुण्य करने की परंपरा भी काफी पुरानी है। इस दिन अपनी क्षमता के अनुसार गरीब और जरूरतमंद लोगों की सहायता की जा सकती है। भोजन, अनाज और कपड़े जैसी उपयोगी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन काले तिल, सरसों का तेल, वस्त्र, अनाज, जूते-चप्पल, छाता और कंबल जैसी चीजें जरूरतमंद लोगों को दी जा सकती हैं। मौसम और जरूरत के हिसाब से किसी व्यक्ति को उपयोगी वस्तु देना भी सेवा का अच्छा माध्यम माना जाता है।

पितरों के नाम पर किया गया दान विशेष रूप से श्रद्धा से जोड़ा जाता है। परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार किसी जरूरतमंद को भोजन करा सकता है या उसके लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा सकता है।

पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने की परंपरा

अमावस्या पर पीपल की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं। यह कार्य श्रद्धा के साथ किया जाता है। कई परिवार अमावस्या के दिन पीपल के पास जाकर प्रार्थना करते हैं और परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं।

इसके अलावा पशु-पक्षियों को भोजन कराने की परंपरा भी इस दिन से जुड़ी हुई है। गाय को भोजन कराया जा सकता है। कौए और कुत्ते को भी भोजन देने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा और जीवों के प्रति दया की भावना से जोड़ा जाता है।

भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा करें

भाद्रपद अमावस्या पर भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा भी की जा सकती है। घर के मंदिर में भगवान का जल और पंचामृत से अभिषेक करने के बाद पूजा की जाती है। इसके बाद पीला चंदन, तुलसी और फूल अर्पित किए जाते हैं।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप किया जा सकता है। श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और मंगल की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की उपासना से जीवन में सकारात्मकता और परिवार में सुख-शांति की कामना की जाती है।

महालक्ष्मी की पूजा के दौरान घर की आर्थिक समृद्धि और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। अमावस्या के दिन घर में साफ-सफाई रखने और पूजा स्थल को व्यवस्थित रखने पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

मछलियों और गायों की सेवा भी कर सकते हैं

अमावस्या पर जीवों की सेवा को भी पुण्य कार्य माना जाता है। श्रद्धालु किसी तालाब या नदी के किनारे जाकर मछलियों के लिए आटे की छोटी-छोटी गोलियां बनाकर डाल सकते हैं। इसका उद्देश्य जीवों को भोजन उपलब्ध कराना और सेवा की भावना को बढ़ावा देना है।

इसी तरह किसी गोशाला में जाकर गायों के लिए चारा उपलब्ध कराया जा सकता है। अगर प्रत्यक्ष रूप से सेवा करना संभव न हो तो गोशाला के संचालन और गायों की देखभाल के लिए अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग भी किया जा सकता है।

इस प्रकार अमावस्या के दिन पूजा के साथ-साथ सेवा और दान के कार्यों को भी महत्व दिया जाता है। धार्मिक परंपराओं में इन कार्यों का उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं बल्कि जरूरतमंदों और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना बढ़ाना भी माना गया है।

हनुमान जी की आराधना से करें दिन का समापन

भाद्रपद अमावस्या पर हनुमान जी की पूजा भी की जा सकती है। श्रद्धालु हनुमान मंदिर में दर्शन करने के साथ घर पर भी हनुमान जी के सामने दीपक जला सकते हैं। इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है। जिन लोगों के पास पर्याप्त समय हो, वे सुंदरकांड का पाठ भी कर सकते हैं। मान्यता के अनुसार हनुमान जी की आराधना साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ी हुई है।

इस तरह 10 सितंबर को कुशग्रहणी अमावस्या के अवसर पर कुशा संग्रह और धार्मिक कार्य किए जा सकते हैं, जबकि 11 सितंबर को अमावस्या तिथि के दौरान स्नान, दान और अन्य पुण्य कर्म किए जाएंगे। दो दिनों में पड़ रही इस अमावस्या के कारण श्रद्धालुओं को तिथि और स्थानीय पंचांग के अनुसार अपने धार्मिक कार्यों का समय तय करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूजा, तर्पण, दान और सेवा के कार्य श्रद्धा, सामर्थ्य और उचित विधि के साथ किए जाएं।