हिमाचल प्रदेश में प्लास्टिक कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए अब अभियान शहरों से आगे गांवों तक पहुंचाया जाएगा। प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों को प्लास्टिक कचरे से मुक्त बनाने के लिए ‘प्लास्टिक मुक्त गांव योजना’ शुरू करने की तैयारी में है। पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से तैयार की जा रही इस योजना के तहत पंचायतों को केवल सामान्य साफ-सफाई के आधार पर नहीं, बल्कि प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक और प्रभावी प्रबंधन के मानकों पर परखा जाएगा।
योजना के तहत बेहतर प्रदर्शन करने वाली पंचायतों और गांवों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। उत्कृष्ट कार्य करने वाले क्षेत्रों को पुरस्कार देकर अन्य पंचायतों को भी प्लास्टिक कचरे के बेहतर प्रबंधन के लिए प्रेरित करने की योजना है। हालांकि पुरस्कार की श्रेणी और राशि अभी आधिकारिक तौर पर तय और घोषित नहीं की गई है।
सरकार का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक को खुले में फेंकने, जलाने या नालियों और जलस्रोतों में जाने से रोकना है। पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हिमाचल में प्लास्टिक कचरा लंबे समय तक पर्यावरण में बना रहता है। यह जंगलों, खड्डों, नालों और नदी-नालों तक पहुंचकर जल, मिट्टी और वन क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती पैदा करता है।
केवल सफाई नहीं, कचरा प्रबंधन होगा मुख्य कसौटी
प्रस्तावित योजना में गांवों की स्वच्छता को केवल सड़कों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई तक सीमित नहीं रखा जाएगा। पंचायतों को यह साबित करना होगा कि उनके क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे का संग्रह, पृथक्करण, भंडारण और उचित निपटान किस तरह किया जा रहा है।
इसके लिए पंचायत स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। गांवों में प्लास्टिक कचरे की स्थिति की नियमित समीक्षा की जाएगी और तय मानकों के आधार पर प्रदर्शन का आकलन किया जाएगा।
योजना के तहत प्रतिबंधित सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक, घरों से निकलने वाले कचरे की स्रोत पर छंटाई, नियमित या घर-घर कचरा संग्रह और एकत्र किए गए प्लास्टिक को सुरक्षित तरीके से रखने की व्यवस्था को महत्वपूर्ण मानक बनाया गया है।
इसके अलावा प्लास्टिक कचरे के सुरक्षित परिवहन और उसके अंतिम निपटान की व्यवस्था भी पंचायतों के प्रदर्शन का हिस्सा होगी। गांव में खुले स्थानों पर प्लास्टिक फेंकने या जलाने पर रोक के साथ सार्वजनिक स्थलों, जलस्रोतों और आसपास के क्षेत्रों की स्वच्छता पर भी नजर रखी जाएगी।
जलस्रोतों और जंगलों को बचाने पर जोर
हिमाचल के पहाड़ी इलाकों में प्लास्टिक कचरे की समस्या मैदानी क्षेत्रों से अलग है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा खुले स्थानों, जंगलों या नालों में पहुंच जाता है। बारिश के दौरान यही कचरा बहकर खड्डों और नदियों तक पहुंचता है। इससे जलस्रोतों में प्रदूषण बढ़ने के साथ प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था भी प्रभावित होती है।
प्लास्टिक लंबे समय तक नष्ट नहीं होता। ऐसे में एक बार खुले में पहुंचने के बाद इसके पर्यावरण में बने रहने की अवधि काफी लंबी होती है। सरकार की योजना का उद्देश्य इसी समस्या को गांव के स्तर पर रोकना है, ताकि प्लास्टिक कचरा पैदा होने के बाद उसका उचित संग्रह और प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।
योजना में सामुदायिक भागीदारी को भी अहम स्थान दिया गया है। पंचायतों के साथ स्थानीय लोगों, स्वयं सहायता समूहों, महिला मंडलों, युवक मंडलों और अन्य सामुदायिक संस्थाओं को जोड़कर प्लास्टिक कचरे के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर रहेगा।
पंचायतों को प्लास्टिक को संसाधन बनाने के लिए प्रोत्साहन
सरकार की योजना केवल प्लास्टिक कचरे को हटाने तक सीमित नहीं रहेगी। पंचायतों को प्लास्टिक को संसाधन के तौर पर दोबारा उपयोग करने की व्यवस्था विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा।
इसके तहत गांव में एकत्र होने वाले प्लास्टिक को अलग-अलग श्रेणियों में छांटकर उचित स्थान पर भेजने की व्यवस्था विकसित की जाएगी। उपयोग योग्य प्लास्टिक को रिसाइकिलिंग या अन्य निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से इस्तेमाल में लाने की कोशिश होगी।
इससे एक ओर गांवों में प्लास्टिक का जमाव कम होगा, वहीं दूसरी ओर कचरे का आर्थिक मूल्य भी तैयार किया जा सकेगा। सरकार की कोशिश है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरा केवल समस्या न रहे, बल्कि उसके उचित संग्रह और प्रसंस्करण के माध्यम से स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधि का आधार भी बने।
75 रुपये किलो तक प्लास्टिक कचरे की खरीद
प्लास्टिक कचरे को आर्थिक मूल्य देने के लिए सरकार बाय-बैक व्यवस्था भी चला रही है। शिमला नगर निगम के पायलट प्रोजेक्ट में पात्र प्लास्टिक कचरे की खरीद 75 रुपये प्रति किलो की दर से की जा रही है।
इस व्यवस्था को अब ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर लागू करने की योजना है। कुछ क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे की खरीद की व्यवस्था पहले से भी संचालित की जा रही है। योजना के विस्तार के बाद ग्रामीण इलाकों में एकत्र होने वाले प्लास्टिक को निर्धारित केंद्रों तक पहुंचाकर उसके उचित उपयोग की व्यवस्था की जा सकेगी।
सरकार की योजना में एकत्र प्लास्टिक के संभावित उपयोगों में सड़क निर्माण में बिटुमिन के साथ प्रसंस्कृत प्लास्टिक का इस्तेमाल भी शामिल है। इस तरह कचरे के निपटान के साथ उसके दोबारा उपयोग को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
3758 पंचायतों और 20,690 गांवों तक पहुंचेगा अभियान
हिमाचल प्रदेश में कुल 3,758 पंचायतें हैं, जिनके अंतर्गत 20,690 गांव आते हैं। सरकार के आंकड़ों के अनुसार 15,201 गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था चालू होने का दावा किया गया है, जबकि 15,965 गांवों में तरल कचरा प्रबंधन की व्यवस्था संचालित बताई जा रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कचरे की छंटाई के लिए 774 सेग्रीगेशन शेड यानी पृथक्करण शेड बनाए गए हैं। इसके अलावा प्रदेश में करीब 55 प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयां संचालित हैं।
अब प्रस्तावित ‘प्लास्टिक मुक्त गांव योजना’ के जरिए इन व्यवस्थाओं को और मजबूत करने की तैयारी है। सरकार का जोर इस बात पर रहेगा कि जहां कचरा प्रबंधन की व्यवस्था मौजूद है, वहां उसका नियमित और प्रभावी इस्तेमाल भी सुनिश्चित किया जाए।
गांवों में निगरानी और समीक्षा होगी सख्त
योजना के लागू होने के बाद पंचायतों की निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा। केवल कागजों में व्यवस्था होने के बजाय मौके पर कचरा प्रबंधन की स्थिति का आकलन किया जाएगा।
स्रोत पर कचरे की छंटाई हो रही है या नहीं, घरों से नियमित कचरा उठाया जा रहा है या नहीं, प्लास्टिक खुले में तो नहीं फेंका जा रहा, कचरे को जलाया तो नहीं जा रहा और जलस्रोतों के आसपास प्लास्टिक जमा तो नहीं है, इन सभी पहलुओं को समीक्षा में शामिल किया जाएगा।
सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता और ग्रामीणों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। इससे पंचायतों को लगातार बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करने की कोशिश होगी।
सामुदायिक भागीदारी को बनाया जाएगा आधार
प्लास्टिक मुक्त गांव की योजना को सफल बनाने के लिए केवल सरकारी तंत्र पर निर्भर रहने के बजाय ग्रामीण समुदाय की भागीदारी को भी जरूरी माना गया है। गांवों में लोगों को प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करने के साथ कचरे को अलग-अलग रखने की आदत विकसित करने पर जोर दिया जाएगा।
स्थानीय स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से यह तय किया जा सकेगा कि प्लास्टिक कचरा खुले में न पहुंचे। इसके लिए नियमित जागरूकता अभियान और निगरानी गतिविधियां चलाने की योजना है।
पर्यावरण विभाग का मानना है कि पहाड़ी राज्य में प्लास्टिक कचरे को नियंत्रित करना केवल स्वच्छता का विषय नहीं है, बल्कि जंगलों, जलस्रोतों और प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा है।
पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक डॉ. पुष्पेंद्र राणा के अनुसार हिमाचल को प्लास्टिक और कचरा मुक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। शहरों के साथ अब ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रहे कचरे को नियंत्रित करने के लिए ‘प्लास्टिक मुक्त गांव योजना’ शुरू की जा रही है। उनके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में निगरानी और समीक्षा व्यवस्था को भी सख्त किया गया है।
नई योजना के जरिए सरकार का लक्ष्य पंचायतों को केवल सफाई व्यवस्था तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की जिम्मेदारी से जोड़ना है। यदि पंचायतें निर्धारित मानकों पर बेहतर प्रदर्शन करती हैं तो उन्हें प्रोत्साहन और पुरस्कार दिए जाएंगे। इससे गांवों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा होने और प्रदेश को प्लास्टिक प्रदूषण से राहत मिलने की उम्मीद है।
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में जहां पर्यटन, जंगल और जलस्रोत पर्यावरण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं, वहां प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण का सीधा असर प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा पर पड़ेगा। अब सरकार की नई पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि योजना को पंचायत स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और ग्रामीण समुदाय इसमें कितनी सक्रिय भागीदारी करता है।




