धारा 66एफ के तहत दर्ज मामले को देखते हुए एनआईए जांच पर सात दिन में फैसला लेगा केंद्र; छात्र रवि राज की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने तय की समयसीमा
चंडीगढ़। लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) से जुड़े मामले में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की गंभीरता और इसमें लगाए गए कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पंजाब सरकार को 72 घंटे के भीतर मामले से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजने का निर्देश दिया है। साथ ही केंद्र सरकार को भी रिपोर्ट मिलने के सात दिन के भीतर यह निर्णय लेने को कहा है कि मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपी जानी चाहिए या नहीं।
बुधवार को मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए। अदालत के आदेश से अब मामले की जांच को लेकर राज्य और केंद्र सरकार दोनों की जिम्मेदारी तय हो गई है। पंजाब सरकार को निर्धारित समय में आवश्यक जानकारी और रिपोर्ट केंद्र के समक्ष रखनी होगी, जबकि केंद्र को तय समयसीमा के भीतर एनआईए जांच की जरूरत पर अपना निर्णय लेना होगा।
यह जनहित याचिका एलपीयू के छात्र रवि राज की ओर से दायर की गई है। याचिका में विश्वविद्यालय से जुड़े घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच करवाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का आग्रह है कि मामले की जांच ऐसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, जिससे पूरे घटनाक्रम के सभी पहलुओं की निष्पक्ष तरीके से पड़ताल हो सके और किसी भी प्रकार की आशंका की गुंजाइश न रहे।
धारा 66एफ के इस्तेमाल से बढ़ी मामले की गंभीरता
बुधवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू आया। अदालत को बताया गया कि पंजाब पुलिस ने मामले में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66एफ के तहत भी प्रावधान लागू किया है। यह धारा साइबर आतंकवाद से संबंधित अपराधों के लिए निर्धारित है। इसके दायरे में ऐसे गंभीर साइबर अपराध आते हैं, जिनका संबंध देश की सुरक्षा, संप्रभुता और महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों से हो सकता है।
धारा 66एफ का इस्तेमाल इस मामले में जांच के दायरे और एजेंसी की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण हो गया है। अदालत ने इस कानूनी प्रावधान पर विशेष ध्यान दिया, क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत धारा 66एफ में आने वाला अपराध राष्ट्रीय जांच एजेंसी अधिनियम की अनुसूचित अपराधों की सूची में शामिल है।
इसका अर्थ है कि यदि मामले में संबंधित कानूनी और तथ्यात्मक परिस्थितियां एनआईए जांच के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा करती हैं, तो केंद्र सरकार वैधानिक प्रक्रिया के तहत जांच एजेंसी को जिम्मेदारी सौंपने पर विचार कर सकती है। इसी वजह से हाईकोर्ट ने मामले को केवल राज्य पुलिस की जांच तक सीमित रखने के बजाय केंद्र सरकार की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना।
राज्य सरकार को पहले केंद्र के सामने रखनी होगी पूरी रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान एनआईए अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई। इस प्रक्रिया के अनुसार, जब किसी मामले में अनुसूचित अपराध से जुड़े तथ्य सामने आते हैं, तो राज्य सरकार को इसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजनी होती है। इसके बाद केंद्र सरकार उपलब्ध तथ्यों, अपराध की प्रकृति और अन्य प्रासंगिक पहलुओं का परीक्षण कर यह फैसला करती है कि जांच एनआईए को सौंपी जाए या राज्य की एजेंसी ही इसकी जांच जारी रखे।
हाईकोर्ट ने इसी वैधानिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए पंजाब सरकार को 72 घंटे की समयसीमा दी है। सरकार को इस अवधि में मामले से संबंधित रिपोर्ट केंद्र के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। अदालत का निर्देश है कि रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्र सरकार सात दिन के भीतर एनआईए जांच को लेकर अपना निर्णय करे।
इस तरह अदालत ने मामले में आगे की कार्रवाई के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित कर दी है। अब पंजाब सरकार की रिपोर्ट और केंद्र सरकार के निर्णय पर यह निर्भर करेगा कि मामले की जांच एनआईए के हाथों में जाती है या नहीं।
स्वतंत्र जांच की मांग लेकर अदालत पहुंचा छात्र
एलपीयू के छात्र रवि राज की ओर से दाखिल जनहित याचिका में मामले की निष्पक्ष जांच का मुद्दा उठाया गया है। याचिका में मांग की गई है कि घटनाक्रम की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से करवाई जाए, ताकि सभी तथ्यों और संभावित पहलुओं की गहराई से पड़ताल हो सके।
याचिका पर सुनवाई के दौरान धारा 66एफ का पहलू सामने आने के बाद मामला और महत्वपूर्ण हो गया। यह प्रावधान सामान्य साइबर अपराधों से अलग गंभीर प्रकृति के अपराधों से संबंधित है। ऐसे में अदालत ने एनआईए जांच से जुड़े कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए राज्य तथा केंद्र सरकार को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सीधे तौर पर जांच एनआईए को सौंपने का निर्देश नहीं दिया है। अदालत ने पहले पंजाब सरकार से रिपोर्ट मांगी है और उसके बाद केंद्र सरकार को एनआईए जांच पर निर्णय लेने की जिम्मेदारी सौंपी है। इसलिए अब केंद्र सरकार का फैसला इस मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम होगा।
अब केंद्र के फैसले पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट के आदेश के बाद एलपीयू मामले की जांच को लेकर अगली कार्रवाई पर सभी की निगाहें रहेंगी। पंजाब सरकार को 72 घंटे के भीतर रिपोर्ट भेजनी है, जबकि केंद्र सरकार को रिपोर्ट मिलने के सात दिन के अंदर निर्णय लेना होगा। निर्धारित समयसीमा के कारण मामले में आगे की प्रक्रिया अब समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगी।
अदालत ने इन निर्देशों के साथ मामले की सुनवाई स्थगित कर दी। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पंजाब सरकार अपनी रिपोर्ट में किन तथ्यों और जांच संबंधी पहलुओं को शामिल करती है तथा केंद्र सरकार एनआईए अधिनियम के प्रावधानों के तहत क्या निर्णय लेती है।
इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने जांच एजेंसी के चयन को लेकर कानूनी प्रक्रिया और समयसीमा दोनों स्पष्ट कर दी हैं। इससे मामले की जांच को लेकर अगली कार्रवाई का रास्ता तय होगा।




