Gen-Z के बीच PM मोदी का नया अंदाज: भजन क्लबिंग में बजाई खंजरी, युवाओं से जुड़ने की कोशिशों के बीच चुनावी वोटर लिस्ट पर भी सियासत

Gen-Z के बीच PM मोदी का नया अंदाज: भजन क्लबिंग में बजाई खंजरी, युवाओं से जुड़ने की कोशिशों के बीच चुनावी वोटर लिस्ट पर भी सियासत

नई दिल्ली में शुक्रवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक अलग अंदाज देखने को मिला। दीन दयाल उपाध्याय पार्क में आयोजित ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम में मोदी युवाओं के बीच नजर आए। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने भजनों का आनंद लिया, तालियां बजाईं और हाथ में खंजरी लेकर संगीत की लय में शामिल हुए। यह आयोजन भारतीय जनसंघ के प्रमुख नेताओं में रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के मौके पर किया गया था।

इस कार्यक्रम की खासियत यह रही कि इसमें पारंपरिक भजन को सामान्य धार्मिक आयोजन की बजाय आधुनिक कॉन्सर्ट जैसी प्रस्तुति के साथ पेश किया गया। मंच पर संगीत, लाइटिंग और युवाओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम को सामान्य राजनीतिक या स्मृति समारोह से अलग रूप दिया। पीएम मोदी भी दर्शकों के बीच बैठकर कार्यक्रम का हिस्सा बने।

प्रधानमंत्री की इस भागीदारी को ऐसे समय में देखा जा रहा है, जब देश में युवा पीढ़ी, खासकर Gen-Z, राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण समूह बनती जा रही है। सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो, नए सांस्कृतिक ट्रेंड और युवाओं की बदलती भाषा अब राजनीतिक संवाद का भी हिस्सा बन रहे हैं।

भजन से लेकर रील तक, युवाओं की भाषा में संवाद

‘भजन क्लबिंग’ को लेकर प्रधानमंत्री पहले भी सार्वजनिक रूप से बात कर चुके हैं। जनवरी 2026 में ‘मन की बात’ में उन्होंने युवा पीढ़ी के बीच इस तरह के आयोजनों की चर्चा की थी। उन्होंने इस ट्रेंड को परंपरा, आध्यात्मिकता और आधुनिक जीवनशैली के मेल के तौर पर प्रस्तुत किया था।

शुक्रवार के कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी इसी कड़ी का अगला उदाहरण रही। यहां भजन पारंपरिक शैली में ही थे, लेकिन उनकी प्रस्तुति में कॉन्सर्ट जैसा माहौल बनाया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक कार्यक्रम में युवाओं ने संगीत के साथ ताल मिलाई और मंच से भक्ति गीतों की प्रस्तुति हुई।

मोदी का युवाओं से संवाद केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा है। पिछले कुछ समय में उनके सार्वजनिक संचार में सोशल मीडिया की भाषा और युवा संस्कृति से जुड़े कई संदर्भ दिखाई दिए हैं। ‘GRWM’ जैसे सोशल मीडिया फॉर्मेट से लेकर युवाओं के बीच इस्तेमाल होने वाले शब्दों तक, राजनीतिक संचार में डिजिटल संस्कृति की भूमिका लगातार बढ़ी है।

2029 की राजनीति में युवा वोटर क्यों महत्वपूर्ण हैं?

Gen-Z को लेकर राजनीतिक दलों की दिलचस्पी की एक बड़ी वजह देश की युवा आबादी है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्टों में 15 से 29 वर्ष की उम्र के युवाओं की संख्या करीब 36.74 करोड़ बताई गई है। यह आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 26 फीसदी हिस्सा बताई जाती है।

हालांकि, 15-29 वर्ष की पूरी आबादी को सीधे मतदाता मानना सही नहीं होगा, क्योंकि इस समूह में 18 वर्ष से कम उम्र के लोग भी शामिल हैं। चुनावी दृष्टि से 18 वर्ष और उससे अधिक उम्र के नागरिक ही मतदाता बन सकते हैं। इसके बावजूद युवाओं का यह बड़ा जनसांख्यिकीय आधार आने वाले वर्षों की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है।

2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों में चुनाव आयोग ने 18 से 29 वर्ष की उम्र के मतदाताओं की हिस्सेदारी 22.78 फीसदी दर्ज की थी। यानी उस चुनाव में करीब हर चार मतदाताओं में एक मतदाता इस आयु समूह से था।

यही वजह है कि राजनीतिक दलों के लिए युवाओं तक पहुंच केवल चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं रह गई है। कॉलेज कैंपस, सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम रील्स, डिजिटल अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और युवाओं से जुड़े मुद्दे राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन रहे हैं।

चुनावी प्रक्रिया को लेकर राहुल गांधी के आरोप

इसी बीच युवा वोटरों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट और Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच हुई।

राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए और ‘वोट चोरी’ शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनावी रोल में बदलाव से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए। यह उनके पहले के बयानों की ही कड़ी थी, जिसमें वह मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाते रहे हैं।

SIR को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच राजनीतिक विवाद लगातार जारी है। हाल में सामने आई एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों द्वारा SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। इसके बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अपने सवाल और तेज किए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ‘वोट चोरी’ जैसे आरोप राजनीतिक दावे हैं। इन्हें चुनाव आयोग की ओर से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि संबंधित राजनीतिक नेताओं के आरोपों के रूप में देखा जाना चाहिए।

Gen-Z और वोटर लिस्ट का मुद्दा

राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में युवाओं के वोटर के रूप में पंजीकरण से जुड़ा सवाल भी उठा। उनसे पूछा गया था कि SIR प्रक्रिया में Gen-Z के नए मतदाताओं के लिए नाम जुड़वाने की प्रक्रिया को लेकर क्या समस्या हो सकती है।

राहुल गांधी ने इसके जवाब में चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाया और कहा कि अगर किसी तरह से वोटों को प्रभावित किया गया है तो उससे चुनी गई सरकार और उसके फैसलों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। उनके बयान का केंद्र चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता था।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग से जुड़े विवादों पर अलग-अलग राजनीतिक दल अपनी-अपनी आपत्तियां सामने रख रहे हैं। इसलिए इस पूरे मामले में आरोप, जवाब और आधिकारिक प्रक्रिया—इन तीनों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

Gen-Z के बीच क्यों लोकप्रिय हो रहा ‘भजन क्लबिंग’?

अब सवाल यह है कि आखिर ‘भजन क्लबिंग’ क्या है और यह युवाओं के बीच चर्चा में क्यों आया?

सामान्य तौर पर भजन या कीर्तन को धार्मिक आयोजन, मंदिर या आध्यात्मिक सभा से जोड़ा जाता है। ‘भजन क्लबिंग’ इसी संगीत को आधुनिक कार्यक्रम की शैली में पेश करने का तरीका है। इसमें भक्ति गीतों के साथ लाइव म्यूजिक, लाइटिंग, स्टेज परफॉर्मेंस और कॉन्सर्ट जैसा माहौल बनाया जाता है।

यानी संगीत वही हो सकता है, लेकिन उसे सुनने और अनुभव करने का तरीका बदल जाता है। कार्यक्रम में युवा समूह के रूप में शामिल होते हैं, गीतों पर तालियां बजाते हैं और कई जगहों पर संगीत के साथ झूमते भी दिखाई देते हैं। इसी वजह से यह फॉर्मेट पारंपरिक भजन और आधुनिक लाइव म्यूजिक के बीच एक तरह का मेल माना जा रहा है।

मोदी के लिए यह कार्यक्रम क्यों चर्चा में आया?

शुक्रवार का आयोजन इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि इसमें प्रधानमंत्री स्वयं युवाओं के बीच दिखाई दिए। वह केवल मंच से संबोधन देने या कार्यक्रम देखने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि संगीत की प्रस्तुति में भी शामिल हुए। उन्हें खंजरी बजाते और भजनों की लय पर प्रतिक्रिया देते देखा गया।

कार्यक्रम पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती से जुड़ा था। जनसंघ के प्रमुख विचारकों में शामिल उपाध्याय की राजनीतिक विरासत भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा से जुड़ी हुई है। ऐसे में कार्यक्रम ने एक तरफ पार्टी की वैचारिक विरासत को सामने रखा और दूसरी तरफ उसे युवा पीढ़ी के लोकप्रिय सांस्कृतिक फॉर्मेट से जोड़ा।

राजनीति में बदल रहा है युवाओं से संवाद का तरीका

युवा मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश अब केवल घोषणापत्र या रोजगार जैसे मुद्दों तक सीमित नहीं है। राजनीतिक दल यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि युवा किस तरह की भाषा, वीडियो और सांस्कृतिक सामग्री से जुड़ते हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी भजन क्लबिंग जैसे नए सांस्कृतिक ट्रेंड में नजर आए, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी युवाओं और चुनावी अधिकारों से जुड़े सवाल उठा रहे हैं। दोनों घटनाएं अलग संदर्भों में हुईं, लेकिन इनके केंद्र में युवा पीढ़ी और लोकतांत्रिक भागीदारी का मुद्दा मौजूद है।

2029 के लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन देश की युवा आबादी और नए मतदाताओं का आकार राजनीतिक दलों को अभी से इस वर्ग तक पहुंच बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म, सांस्कृतिक कार्यक्रम और युवा-केंद्रित राजनीतिक संवाद इस कोशिश का बड़ा हिस्सा बन सकते हैं।

इस लिहाज से दिल्ली का ‘भजन क्लबिंग’ कार्यक्रम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा। इसने यह भी दिखाया कि परंपरा और आधुनिक युवा संस्कृति को एक ही मंच पर लाकर राजनीतिक संवाद के नए तरीके तलाशे जा रहे हैं।