पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। 15 जुलाई को प्रस्तावित जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के “लॉन्ग मार्च” ने पूरे इलाके में राजनीतिक और सुरक्षा हलकों की चिंता बढ़ा दी है। प्रशासन को आशंका है कि यदि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी मुजफ्फराबाद की ओर कूच करते हैं, तो सुरक्षा बलों और आंदोलनकारियों के बीच सीधा टकराव हो सकता है। इसी संभावना को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने कई संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी है।
पिछले कुछ सप्ताह से पीओके के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन लगातार जारी हैं। आंदोलन की अगुवाई कर रही जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने साफ कर दिया है कि वह अपनी मांगों से पीछे हटने वाली नहीं है। संगठन का कहना है कि सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियों और बल प्रयोग का रास्ता अपनाया, लेकिन इससे लोगों का आक्रोश और बढ़ गया है।
रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फराबाद और रावलकोट समेत कई इलाकों में पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की संख्या बढ़ा दी गई है। जगह-जगह बैरिकेड लगाए गए हैं और प्रमुख सड़कों पर निगरानी कड़ी कर दी गई है ताकि प्रदर्शनकारियों को राजधानी की ओर बढ़ने से रोका जा सके। प्रशासन का दावा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिकता है, जबकि आंदोलनकारी इसे लोगों की आवाज दबाने की कोशिश बता रहे हैं।
JAAC ने अपने समर्थकों से अपील की है कि वे 15 जुलाई को शांतिपूर्ण तरीके से बड़ी संख्या में मार्च में शामिल हों। संगठन का कहना है कि उनका आंदोलन जनता के अधिकारों और लोकतांत्रिक मांगों के लिए है। कमेटी ने सरकार से प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार किए गए सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को बिना शर्त रिहा करने की मांग दोहराई है।
आंदोलन की प्रमुख मांगों में बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण, पीओके विधानसभा में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों से जुड़े मुद्दों पर पुनर्विचार, स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा कथित दमनात्मक कार्रवाई रोकना शामिल है। इसके अलावा JAAC अपनी 38 सूत्रीय मांगों को लागू करने की मांग भी लगातार उठा रही है। संगठन का कहना है कि जब तक इन मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक विरोध जारी रहेगा।
बीते महीने शुरू हुए इस आंदोलन ने धीरे-धीरे व्यापक जनसमर्थन हासिल कर लिया। शुरुआत में यह प्रदर्शन महंगाई और प्रशासनिक फैसलों के विरोध तक सीमित था, लेकिन बाद में इसमें राजनीतिक अधिकारों और स्थानीय स्वायत्तता जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए। आंदोलन का दायरा बढ़ने के साथ सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी तेज होता गया।
कई स्थानों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की खबरें सामने आईं। इन घटनाओं में लोगों के घायल होने और कुछ की मौत होने के दावे भी किए गए। इन घटनाओं के बाद स्थानीय आबादी में नाराजगी और बढ़ गई। आंदोलनकारी आरोप लगा रहे हैं कि सरकार बातचीत की बजाय बल प्रयोग का सहारा ले रही है।
रावलकोट इस पूरे आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां बड़ी संख्या में लोग लगातार सभाएं और विरोध कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। ईदगाह मैदान में हजारों लोगों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया है कि आंदोलन अब केवल कुछ संगठनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम लोगों की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है।
प्रदर्शन के दौरान कई स्थानीय नेताओं ने पाकिस्तान सरकार और सेना की नीतियों की खुलकर आलोचना की है। कुछ नेताओं का कहना है कि पीओके को लेकर अपनाई जा रही नीतियां स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विरोध की आवाज को दबाने के लिए प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है।
रावलकोट में आयोजित एक सभा के दौरान स्थानीय नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को लेकर लगातार भ्रम फैलाया जा रहा है। उनके अनुसार स्थानीय लोगों की पहचान और अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए तथा जनता की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर पाकिस्तान सरकार ने JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया है। सरकार का कहना है कि कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अधिकारियों का दावा है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल संभावित हिंसा को रोकने के उद्देश्य से मजबूत की गई है।
सरकार द्वारा संगठन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। JAAC का आरोप है कि इन गिरफ्तारियों का उद्देश्य आंदोलन को कमजोर करना है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि गिरफ्तार लोगों को रिहा नहीं किया गया तो विरोध प्रदर्शन और तेज किए जाएंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान स्थिति पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। यदि 15 जुलाई का लॉन्ग मार्च बड़ी संख्या में सफल रहता है, तो सरकार पर आंदोलनकारियों से बातचीत का दबाव बढ़ सकता है। वहीं यदि मार्च को रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया, तो हालात और अधिक तनावपूर्ण हो सकते हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि लंबे समय से आर्थिक समस्याएं, महंगाई और प्रशासनिक फैसलों को लेकर लोगों में असंतोष बढ़ रहा था। हाल के महीनों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। इसी कारण आंदोलन को व्यापक समर्थन मिलता दिखाई दे रहा है।
JAAC लगातार यह दावा कर रही है कि उसका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है और उसका उद्देश्य केवल जनता की मांगों को सरकार तक पहुंचाना है। संगठन ने समर्थकों से कानून का सम्मान करते हुए अनुशासन बनाए रखने की अपील की है, ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा से बचा जा सके।
हालांकि सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि बड़ी भीड़ के दौरान किसी भी छोटी घटना से हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं। इसी कारण संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है और अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच जल्द बातचीत शुरू नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में स्थिति और जटिल हो सकती है। मौजूदा घटनाक्रम ने पूरे पीओके का राजनीतिक माहौल गर्मा दिया है और हर किसी की नजर 15 जुलाई को होने वाले लॉन्ग मार्च पर टिकी हुई है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान सरकार प्रदर्शनकारियों को मार्च निकालने की अनुमति देगी या फिर इसे रोकने के लिए सख्त कार्रवाई करेगी। दूसरी ओर JAAC अपने कार्यक्रम पर अडिग दिखाई दे रही है। ऐसे में 15 जुलाई का दिन पीओके के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इस दिन होने वाली घटनाएं आने वाले समय की राजनीतिक दिशा तय कर सकती हैं।




