RBI Report: पश्चिम एशिया तनाव और कमजोर मॉनसून से बढ़ सकती है महंगाई, अर्थव्यवस्था पर भी नजर

RBI Report: पश्चिम एशिया तनाव और कमजोर मॉनसून से बढ़ सकती है महंगाई, अर्थव्यवस्था पर भी नजर

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट में देश की अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद कुछ प्रमुख जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। केंद्रीय बैंक का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक ऊर्जा बाजार में संभावित उतार-चढ़ाव और सामान्य से कमजोर मॉनसून की आशंका आने वाले समय में महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है और घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश तथा वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता भविष्य की वृद्धि को समर्थन दे सकती है।

आरबीआई के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले वित्त वर्ष में अपेक्षाकृत संतुलित प्रदर्शन किया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का प्रभाव भारतीय बाजार, आयात लागत, ऊर्जा कीमतों और खाद्य मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है। इसलिए आर्थिक गतिविधियों, महंगाई और वित्तीय स्थिरता पर लगातार नजर बनाए रखना आवश्यक होगा।

वार्षिक रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में है। पर्याप्त पूंजी, बेहतर बैलेंस शीट और नियामकीय सुधारों के कारण बैंक संभावित वैश्विक आर्थिक झटकों का सामना करने की बेहतर स्थिति में हैं।

पश्चिम एशिया का तनाव क्यों बढ़ा सकता है महंगाई का दबाव

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम बना हुआ है। यह क्षेत्र दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यदि संघर्ष लंबा चलता है या आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आ सकती है।

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा प्रभाव आयात लागत पर पड़ सकता है। इससे परिवहन, विनिर्माण, बिजली उत्पादन और अन्य क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंततः वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहती। इसका प्रभाव परिवहन लागत, कृषि उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों और लॉजिस्टिक्स पर भी पड़ता है, जिससे व्यापक स्तर पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है असर

आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि भू-राजनीतिक संघर्षों का प्रभाव केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहता। यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो कई आवश्यक कच्चे माल, औद्योगिक उत्पादों और व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ सकती है। विदेशी निवेश प्रवाह, विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता में बदलाव जैसे कारक उभरते देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं। भारत भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण इन घटनाक्रमों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता।

हालांकि, केंद्रीय बैंक का मानना है कि मजबूत घरेलू आर्थिक आधार और संतुलित नीतियों के कारण भारत इन चुनौतियों का अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से सामना करने की स्थिति में है।

कमजोर मॉनसून की आशंका से खाद्य महंगाई बढ़ने की चिंता

आरबीआई की रिपोर्ट में मौसम से जुड़े जोखिमों का भी उल्लेख किया गया है। यदि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से कमजोर रहता है या वर्षा का वितरण असमान होता है, तो इसका असर कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न, फल, सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका रहती है।

भारत में खाद्य मुद्रास्फीति का सीधा संबंध कृषि उत्पादन और मौसम की स्थिति से जुड़ा रहता है। यदि फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है, तो बाजार में आपूर्ति कम होने के कारण कीमतों में वृद्धि देखने को मिल सकती है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक ने कमजोर मॉनसून को महंगाई के प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर और संतुलित वर्षा न केवल कृषि उत्पादन बल्कि ग्रामीण आय और ग्रामीण उपभोग पर भी प्रभाव डालती है। इसलिए मॉनसून का प्रदर्शन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में अर्थव्यवस्था ने दिखाई मजबूती

वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन किया। घरेलू मांग, निवेश गतिविधियों और विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में सुधार ने विकास को समर्थन दिया।

आरबीआई के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि को कई घरेलू कारकों से मजबूती मिली है। इनमें बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक निवेश, उपभोक्ता मांग, सेवा क्षेत्र की गतिविधियां और निजी निवेश की संभावनाएं शामिल हैं।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां अधिक प्रतिकूल नहीं होतीं, तो आने वाले समय में भी भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी विकास गति बनाए रख सकती है।

मजबूत बैंकिंग प्रणाली, पूंजीगत निवेश और व्यापारिक समझौतों से विकास को मिल सकता है समर्थन

बैंकिंग क्षेत्र की स्थिति को बताया मजबूत

आरबीआई का कहना है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पिछले कुछ वर्षों में पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। बैंकों की पूंजी पर्याप्त स्तर पर बनी हुई है और उनकी बैलेंस शीट में भी सुधार देखा गया है। इससे संभावित आर्थिक झटकों का सामना करने की क्षमता बेहतर हुई है।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि विवेकपूर्ण नियामकीय सुधारों, जोखिम प्रबंधन और संतुलित ऋण वितरण के कारण वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता मजबूत हुई है। इससे बैंकिंग प्रणाली भविष्य में आने वाली अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करने के लिए बेहतर स्थिति में दिखाई देती है।

केंद्रीय बैंक का मानना है कि मजबूत बैंकिंग व्यवस्था आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण आधार का काम करती है, क्योंकि इससे उद्योगों, व्यवसायों और उपभोक्ताओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की क्षमता बनी रहती है।

घरेलू मांग और सरकारी पूंजीगत निवेश बने रहेंगे प्रमुख आधार

रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि को घरेलू मांग से लगातार समर्थन मिलने की संभावना है। देश की बड़ी आबादी, बढ़ता उपभोग और निवेश गतिविधियां आर्थिक विकास के प्रमुख कारक बने हुए हैं।

इसके अलावा सरकार द्वारा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, परिवहन, रेलवे, सड़क, ऊर्जा और अन्य सार्वजनिक निवेश कार्यक्रमों पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे निवेशों का प्रभाव रोजगार, उद्योग, निर्माण क्षेत्र और समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में वृद्धि से लंबे समय में उत्पादक क्षमता बढ़ती है और निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।

व्यापारिक समझौतों से निर्यात और निवेश को मिल सकता है लाभ

आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में प्रमुख देशों के साथ हो रहे व्यापारिक समझौतों का भी उल्लेख किया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि मुक्त व्यापार समझौते और आर्थिक सहयोग से भारत के निर्यात, निवेश और विनिर्माण क्षेत्र को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।

वैश्विक व्यापार में विविधीकरण और नए बाजारों तक पहुंच भारतीय उद्योगों के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है। इससे रोजगार सृजन और आर्थिक गतिविधियों में भी वृद्धि की संभावना रहती है।

महंगाई पर लगातार नजर बनाए रखने की जरूरत

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले वित्त वर्ष के अधिकांश समय खुदरा मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित स्तर पर रही। हालांकि वर्ष के अंतिम महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक परिस्थितियों के कारण महंगाई पर दबाव बढ़ने के संकेत दिखाई दिए।

केंद्रीय बैंक का मानना है कि यदि ऊर्जा कीमतों में तेजी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी एक साथ होती है, तो महंगाई को नियंत्रित रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए मौद्रिक नीति और अन्य आर्थिक उपायों के माध्यम से स्थिति पर लगातार नजर रखना आवश्यक होगा।

कृषि क्षेत्र के लिए मॉनसून रहेगा अहम

आरबीआई ने रिपोर्ट में कहा है कि भारत की कृषि व्यवस्था अब भी काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर निर्भर करती है। वर्षा का समय, मात्रा और भौगोलिक वितरण फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और कृषि आधारित उद्योगों को प्रभावित कर सकता है।

वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन काफी हद तक मॉनसून की प्रगति पर निर्भर करेगा। यदि वर्षा सामान्य रहती है तो खाद्य उत्पादन और ग्रामीण मांग को समर्थन मिल सकता है, जबकि कमजोर या असमान वर्षा से खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

आरबीआई ने नीतिगत सतर्कता पर दिया जोर

केंद्रीय बैंक का कहना है कि बदलते वैश्विक आर्थिक वातावरण में सतर्कता बनाए रखना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेजी से बदल रही परिस्थितियों, ऊर्जा कीमतों, मौसम संबंधी जोखिमों और वित्तीय बाजारों की गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर महंगाई और वित्तीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं।

आरबीआई का आकलन है कि मजबूत बैंकिंग प्रणाली, पर्याप्त पूंजी, संतुलित ऋण वृद्धि, घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश और संरचनात्मक सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था को दीर्घकाल में समर्थन प्रदान कर सकते हैं। हालांकि, वैश्विक अनिश्चितताओं और मौसम संबंधी जोखिमों को देखते हुए आर्थिक संकेतकों पर निरंतर निगरानी बनाए रखना आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगा।