अमेरिका-ईरान युद्ध खत्म, 110 दिन बाद शांति समझौते पर लगी मुहर

अमेरिका-ईरान युद्ध खत्म, 110 दिन बाद शांति समझौते पर लगी मुहर

करीब चार महीने से अधिक समय तक चले तनाव, सैन्य हमलों और कूटनीतिक खींचतान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच आखिरकार शांति समझौता हो गया है। इस समझौते को पश्चिम एशिया में हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हुए इस ऐतिहासिक करार के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि क्षेत्र में स्थिरता लौटेगी और वैश्विक बाजारों पर पड़ा दबाव भी कम होगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वयं इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि दस्तावेज पर औपचारिक हस्ताक्षर पूरे हो चुके हैं। उनके मुताबिक अब युद्ध और टकराव की जगह बातचीत और सहयोग का रास्ता अपनाया जाएगा। दूसरी ओर ईरान ने भी समझौते को स्वीकार करते हुए कहा है कि अब सबसे महत्वपूर्ण चरण इसकी शर्तों को लागू करना होगा।

इस समझौते की खास बात यह रही कि कई चरणों में इसकी प्रक्रिया पूरी की गई। कुछ हस्ताक्षर डिजिटल माध्यम से हुए, जबकि अंतिम औपचारिक स्वीकृति फ्रांस में दी गई। जानकारी के अनुसार ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दस्तावेज को मंजूरी दी, जबकि अमेरिकी पक्ष ने भी अलग-अलग स्तरों पर अपनी सहमति दर्ज कराई।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने बताया कि समझौते के मसौदे को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि बातचीत का सबसे कठिन हिस्सा पूरा हो गया है, लेकिन वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तय शर्तों को किस तरह जमीन पर उतारा जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस करार का प्रभाव सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर तेल बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिलेगा। बीते कई महीनों से जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया था, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।

समझौते की सबसे अहम शर्त तत्काल युद्धविराम है। दोनों पक्षों ने सैन्य गतिविधियों को रोकने और अपने सहयोगी समूहों को भी तनाव कम करने के निर्देश देने पर सहमति जताई है। दस्तावेज में यह स्पष्ट किया गया है कि हस्ताक्षर के साथ ही सक्रिय सैन्य अभियान समाप्त माने जाएंगे। इससे पूरे क्षेत्र में हिंसा कम होने की उम्मीद बढ़ गई है।

परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी महत्वपूर्ण सहमति बनी है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम भंडार को सीमित करने के लिए तैयार हो गया है। इस प्रक्रिया की निगरानी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) करेगी। हालांकि इस विषय से जुड़े कई जटिल मुद्दों पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है और आगामी 60 दिनों में विस्तृत बातचीत जारी रहेगी।

प्रतिबंधों के मुद्दे पर भी दोनों देशों ने एक संतुलित रास्ता चुना है। समझौते के तहत तत्काल सभी आर्थिक प्रतिबंध नहीं हटाए जाएंगे। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि व्यापक राहत तभी दी जाएगी जब ईरान परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अपने वादों को पूरी तरह लागू करेगा। इसका मतलब है कि प्रतिबंधों में ढील चरणबद्ध तरीके से दी जा सकती है।

ऊर्जा क्षेत्र को इस समझौते से सबसे बड़ी राहत मिलने की संभावना है। दस्तावेज के अनुसार ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़ी कुछ आर्थिक और बैंकिंग बाधाओं को कम किया जाएगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव घट सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़ा है। यह मार्ग दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा व्यापारिक रास्तों में गिना जाता है। पिछले महीनों में यहां पैदा हुई अनिश्चितता ने वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित किया था। अब समझौते के तहत ईरान ने सामान्य समुद्री यातायात बहाल करने की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई है। योजना के अनुसार अगले 30 दिनों के भीतर जहाजों की आवाजाही को सामान्य बनाने की कोशिश की जाएगी।

समझौते में यह भी उल्लेख किया गया है कि एक निश्चित अवधि तक व्यापारिक जहाजों को विशेष राहत दी जाएगी ताकि वैश्विक व्यापार दोबारा रफ्तार पकड़ सके। हालांकि ईरानी वार्ताकारों ने संकेत दिया है कि भविष्य में समुद्री शुल्क व्यवस्था को लेकर अलग नीति अपनाई जा सकती है।

पुनर्निर्माण और आर्थिक सहयोग भी इस करार का अहम हिस्सा है। प्रस्तावित योजना के अनुसार भविष्य में लगभग 300 अरब डॉलर के क्षेत्रीय पुनर्निर्माण फंड को सक्रिय किया जा सकता है। यह तभी संभव होगा जब परमाणु मुद्दे पर व्यापक और स्थायी समझौता हो जाए। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इस फंड का उद्देश्य क्षेत्रीय विकास और स्थिरता को बढ़ावा देना होगा।

इसके अलावा वर्षों से फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों का मुद्दा भी चर्चा में रहा। अमेरिकी नेतृत्व ने संकेत दिया है कि यदि ईरान समझौते की शर्तों का पालन करता है तो भविष्य में इन संपत्तियों तक पहुंच का रास्ता खोला जा सकता है। हालांकि यह प्रक्रिया तत्काल नहीं होगी और कई चरणों की समीक्षा के बाद ही आगे बढ़ेगी।

अब दोनों देशों के सामने अगले 60 दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इसी अवधि में परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े लंबित मुद्दों पर आगे की बातचीत होगी। जरूरत पड़ने पर इस समयसीमा को बढ़ाया भी जा सकता है। हालांकि दोनों पक्षों ने यह अधिकार सुरक्षित रखा है कि यदि वार्ता अपेक्षित परिणाम नहीं देती तो वे अपने विकल्पों पर दोबारा विचार कर सकते हैं।

110 दिनों तक चले संघर्ष के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका और ईरान ने एक ऐसे व्यापक दस्तावेज पर सहमति बनाई है जिसमें युद्धविराम, परमाणु गतिविधियां, तेल कारोबार, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों को एक साथ शामिल किया गया है। दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का आधार बनेगा या आने वाले हफ्तों में नई चुनौतियां सामने आएंगी।