आरक्षण के बाद बदला चंडीगढ़ का चुनावी गणित, अब टिकट के लिए दावेदारों में घमासान

आरक्षण के बाद बदला चंडीगढ़ का चुनावी गणित, अब टिकट के लिए दावेदारों में घमासान

35 वार्डों में 16 आरक्षित सीटों ने कई नेताओं की बदली रणनीति, सर्वे और जमीनी पकड़ के आधार पर उम्मीदवार चुनने की तैयारी

चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां अब खुले तौर पर दिखाई देने लगी हैं। वार्डों के आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही उन नेताओं और दावेदारों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, जो पिछले कई महीनों से टिकट की उम्मीद लगाए बैठे थे। अभी तक पार्टी कार्यालयों और नेताओं के घरों तक सीमित चल रही मुलाकातों और लॉबिंग ने अब वार्ड स्तर पर भी जोर पकड़ लिया है।

नगर निगम के 35 वार्डों में से 16 वार्ड आरक्षित और 19 सामान्य किए जाने के बाद सबसे ज्यादा हलचल टिकट वितरण को लेकर है। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों के सामने अब यह चुनौती है कि वे किन चेहरों पर भरोसा जताएं। मौजूदा पार्षदों के साथ पूर्व पार्षद, पार्टी के पदाधिकारी, आरडब्ल्यूए से जुड़े सक्रिय लोग और लंबे समय से चुनावी तैयारी कर रहे नए चेहरे टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुट गए हैं।

आरक्षण की नई व्यवस्था ने कई नेताओं की पूरी चुनावी रणनीति बदल दी है। कुछ मौजूदा पार्षद जिस वार्ड से दोबारा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वहां सीट का वर्ग बदलने के बाद अब उनके सामने नया विकल्प तलाशने की स्थिति बन गई है। दूसरी तरफ कुछ दावेदारों के लिए आरक्षण का परिणाम उम्मीद से बेहतर साबित हुआ है और उन्होंने टिकट हासिल करने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बढ़ाना शुरू कर दिया है।

अब वार्ड के बाद टिकट का गणित

आरक्षण का ड्रा निकलने के बाद राजनीतिक दलों के सामने अगला बड़ा काम उम्मीदवार चयन का है। अब तक जहां नेता अपने संभावित वार्ड में जनसंपर्क बढ़ाने और अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटे थे, वहीं अब पार्टी टिकट हासिल करना प्राथमिकता बन गया है।

दावेदारों ने अपने-अपने राजनीतिक संपर्क सक्रिय कर दिए हैं। स्थानीय नेताओं से मुलाकातों के अलावा पार्टी संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों तक अपनी दावेदारी पहुंचाने की कोशिश शुरू हो गई है। कई नेता अपने क्षेत्र में किए गए काम, सामाजिक गतिविधियों और संगठन में सक्रियता को टिकट का आधार बता रहे हैं।

राजनीतिक दलों के भीतर भी संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार करने का काम तेज हो गया है। पार्टी नेतृत्व के सामने केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता, स्थानीय समीकरण और संगठन के साथ तालमेल जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।

सर्वे बताएगा किस चेहरे पर लगाया जाए दांव

इस बार तीनों प्रमुख राजनीतिक दल उम्मीदवारों के चयन में जमीनी फीडबैक को अहम मान रहे हैं। पार्टी के अंदरूनी सर्वे, कार्यकर्ताओं की राय, संभावित उम्मीदवार की क्षेत्र में पकड़ और मतदाताओं के बीच उसकी स्वीकार्यता टिकट वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

भाजपा और कांग्रेस के स्तर पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर सर्वे कराए जाने और संगठन से फीडबैक लेने की चर्चा है। आम आदमी पार्टी भी ऐसे चेहरों की तलाश में है जो चुनावी मैदान में पार्टी का प्रभावी प्रतिनिधित्व कर सकें।

इसका मतलब यह है कि केवल वरिष्ठ नेता से करीबी या संगठन में पद होना टिकट की गारंटी नहीं होगा। पार्टी नेतृत्व यह देखना चाहेगा कि संबंधित दावेदार अपने वार्ड में कितना प्रभाव रखता है और चुनाव के दौरान वोटरों को अपने पक्ष में कितना लामबंद कर सकता है।

भाजपा में पुराने और नए चेहरों के बीच मुकाबला

भाजपा के लिए टिकट वितरण आसान नहीं रहने वाला है। पार्टी के पास मौजूदा पार्षदों और पुराने कार्यकर्ताओं का आधार है, वहीं संगठन के मंडल स्तर पर सक्रिय कई पदाधिकारी और नए दावेदार भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।

आरक्षित वार्डों ने भाजपा के भीतर भी कई दावेदारों की रणनीति बदल दी है। महिला आरक्षण वाले वार्डों में मौजूदा पार्षदों और वरिष्ठ नेताओं के परिवार से महिला उम्मीदवारों को आगे लाने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे में पार्टी को संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं, मौजूदा पार्षदों और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाना होगा।

भाजपा के लिए एक और चुनौती यह होगी कि टिकट वितरण के बाद संगठन में असंतोष पैदा न हो। बड़ी संख्या में दावेदार होने के कारण टिकट नहीं मिलने वाले नेताओं को पार्टी के पक्ष में बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

कांग्रेस में टिकट के साथ गुटीय संतुलन की परीक्षा

कांग्रेस में भी टिकट को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। पार्टी के कई पुराने कार्यकर्ता और पूर्व पार्षद अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। वहीं लंबे समय से वार्ड स्तर पर सक्रिय नए चेहरों ने भी टिकट के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं।

कांग्रेस के सामने उम्मीदवार चयन में एक साथ कई मोर्चों को साधने की चुनौती होगी। पार्टी को ऐसा चेहरा तलाशना होगा जो न केवल चुनाव जीतने की क्षमता रखता हो, बल्कि संगठन के विभिन्न धड़ों को भी स्वीकार्य हो।

कांग्रेस अध्यक्ष ने स्पष्ट किया है कि पार्टी के प्रति ईमानदारी और निष्ठा रखने वाले नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने कहा है कि टिकट वितरण में सर्वे को आधार बनाया जाएगा। इससे संकेत मिल रहा है कि पार्टी केवल सिफारिश या वरिष्ठ नेताओं के प्रभाव के आधार पर टिकट देने के बजाय जमीनी रिपोर्ट को भी महत्व देगी।

हालांकि टिकट के लिए दावेदारों की संख्या बढ़ने के साथ पार्टी के भीतर असंतोष की आशंका भी बनी रहेगी। टिकट की दौड़ में पीछे रह जाने वाले नेताओं को मनाना और उन्हें पार्टी के साथ बनाए रखना कांग्रेस नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी।

आप के सामने पिछला प्रदर्शन दोहराने की चुनौती

आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव खास महत्व रखता है। वर्ष 2021 के नगर निगम चुनाव में पहली बार मैदान में उतरने वाली आप ने 14 सीटें जीतकर चंडीगढ़ की राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी। इस बार पार्टी उस प्रदर्शन को दोहराने या उससे बेहतर करने की कोशिश करेगी।

आप की रणनीति में नए और युवा चेहरों को मौका देने पर जोर दिखाई दे रहा है। पार्टी ऐसे उम्मीदवार तलाश रही है जिनकी अपने वार्ड में व्यक्तिगत पहचान हो और जो मतदाताओं के साथ सीधे संपर्क में हों।

हालांकि पिछले निगम चुनाव के बाद चंडीगढ़ की राजनीति में कई बदलाव हुए हैं। पार्षदों के दल बदलने से विभिन्न पार्टियों की ताकत और समीकरण प्रभावित हुए हैं। इसलिए आप के सामने यह चुनौती भी होगी कि पिछले चुनाव की सीटों को बरकरार रखने के साथ बदले राजनीतिक समीकरणों का लाभ कैसे उठाया जाए।

पूर्व पार्षदों और आरडब्ल्यूए चेहरों की भी दावेदारी

टिकट की दौड़ सिर्फ मौजूदा पार्षदों तक सीमित नहीं है। पूर्व पार्षद भी दोबारा चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इसके अलावा आरडब्ल्यूए के पदाधिकारियों और स्थानीय सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय लोगों ने भी राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिए हैं।

कई वार्डों में ऐसे चेहरे सामने आ रहे हैं जो लंबे समय से सड़क, सफाई, पार्क, पानी, पार्किंग और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं। इन नेताओं का दावा है कि स्थानीय समस्याओं की जानकारी और जनता के साथ सीधा संपर्क उन्हें चुनाव में मजबूत उम्मीदवार बना सकता है।

पार्टियां भी ऐसे चेहरों को नजरअंदाज नहीं करना चाहतीं, क्योंकि नगर निगम चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि कई बार पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा प्रभाव डाल सकती है।

टिकट नहीं मिला तो बगावत का खतरा

उम्मीदवार चयन के साथ सबसे बड़ी चिंता टिकट से वंचित दावेदारों को लेकर है। राजनीतिक दलों को आशंका है कि टिकट नहीं मिलने की स्थिति में कुछ नेता निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं या दूसरी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।

नगर निगम चुनाव में कई वार्डों में मुकाबला बेहद करीबी रहता है। ऐसे में पार्टी के भीतर से निकलने वाला बागी उम्मीदवार आधिकारिक प्रत्याशी के वोटों में सेंध लगा सकता है। इसलिए भाजपा, कांग्रेस और आप के लिए टिकट वितरण से पहले संभावित बागियों की पहचान करना भी जरूरी होगा।

दावेदारों की बढ़ती संख्या के बीच पार्टियां यह भी आकलन कर रही हैं कि किस नेता को टिकट देने से संगठन मजबूत होगा और किसे टिकट न मिलने पर पार्टी के लिए ज्यादा नुकसान की संभावना है।

आरक्षण ने बदला कई नेताओं का प्लान

आरक्षण की नई व्यवस्था का सबसे सीधा असर मौजूदा पार्षदों और लंबे समय से चुनाव की तैयारी कर रहे नेताओं पर पड़ा है। जिन वार्डों में आरक्षण का स्वरूप बदल गया है, वहां कई दावेदारों को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है।

कुछ नेता अब पड़ोसी वार्डों में संभावनाएं तलाश रहे हैं, जबकि कुछ अपने परिवार के किसी सदस्य को मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। खासकर महिला आरक्षण वाले वार्डों में वरिष्ठ नेताओं के परिवार से महिला उम्मीदवारों के नाम तेजी से चर्चा में आ सकते हैं।

वहीं सामान्य वार्डों में दावेदारों की संख्या और बढ़ने की संभावना है, क्योंकि यहां पार्टी के पुराने और नए दोनों चेहरे टिकट हासिल करने की कोशिश करेंगे।

आने वाले दिनों में साफ होगी तस्वीर

वार्ड आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब राजनीतिक दलों का पूरा ध्यान उम्मीदवारों के चयन पर है। आने वाले दिनों में सर्वे, बैठकों और संगठनात्मक फीडबैक के आधार पर संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार होने की उम्मीद है।

चंडीगढ़ की चुनावी राजनीति में अब मुकाबला केवल भाजपा, कांग्रेस और आप के बीच नहीं रहेगा, बल्कि प्रत्येक पार्टी के भीतर टिकट के लिए चल रही प्रतिस्पर्धा भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है।

आरक्षण ने वार्डों का गणित तय कर दिया है, लेकिन असली चुनावी तस्वीर टिकट घोषित होने के बाद सामने आएगी। किस पार्टी का कौन सा चेहरा मैदान में उतरता है, किसे संगठन का समर्थन मिलता है और टिकट से नाराज दावेदार किस रणनीति पर चलते हैं—इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।

फिलहाल चंडीगढ़ की राजनीति में एक बात साफ है कि वार्डों का आरक्षण तय होने के साथ चुनाव की पहली बड़ी बाधा पार हो चुकी है। अब राजनीतिक दलों के सामने सबसे कठिन परीक्षा ‘सही वार्ड में सही उम्मीदवार’ चुनने की है। यही फैसला आने वाले नगर निगम चुनाव में पार्टियों की संभावनाओं की दिशा तय कर सकता है।