इजराइल में किसके हाथ आएगी सत्ता की चाबी? नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए चाहिए 61 सीटें

इजराइल में किसके हाथ आएगी सत्ता की चाबी? नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए चाहिए 61 सीटें

इजराइल की राजनीति में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। संसदीय चुनाव में पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट को प्रधानमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। चुनाव से पहले सामने आए ओपिनियन पोल में आइजनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन को कई सर्वे में बढ़त मिली है। हालांकि, नेतन्याहू की वापसी की संभावनाएं भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। कुछ सर्वे में उनके गठबंधन को बेहतर स्थिति में दिखाया गया है, जबकि एक सर्वे में बहुमत मिलने का अनुमान भी जताया गया है।

इजराइल की राजनीति के लिए यह चुनाव कई मायनों में अहम है। देश पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा संकट, युद्ध, सैन्य सेवा से जुड़े विवाद और सरकार तथा न्यायपालिका के बीच टकराव जैसे मुद्दों का सामना कर रहा है। ऐसे में मतदाताओं के सामने केवल प्रधानमंत्री चुनने का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी तय होना है कि आने वाले समय में देश की सुरक्षा, सेना की जिम्मेदारियों और शासन व्यवस्था की दिशा क्या होगी।

चुनाव में मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि नेतन्याहू लंबे समय से इजराइल की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। दूसरी ओर, गादी आइजनकोट को सेना में लंबे अनुभव और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर उनकी भूमिका के कारण एक मजबूत विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

120 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 61 का आंकड़ा जरूरी

इजराइल में चुनाव का परिणाम केवल इस बात से तय नहीं होगा कि किस पार्टी को सबसे ज्यादा वोट मिले। असली चुनौती संसद में बहुमत का आंकड़ा हासिल करने की है। देश की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए किसी दल या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ता है।

इजराइल की राजनीतिक व्यवस्था में किसी एक पार्टी के लिए अपने दम पर बहुमत हासिल करना बेहद मुश्किल रहा है। देश के 76 साल के इतिहास में अब तक कोई भी राजनीतिक दल अकेले बहुमत हासिल नहीं कर पाया है। यही वजह है कि चुनाव के बाद गठबंधन की राजनीति सरकार गठन में अहम भूमिका निभाती है।

चुनाव से पहले आए छह ओपिनियन पोल में से चार में आइजनकोट के गठबंधन को ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इसके उलट, एक सर्वे में नेतन्याहू के गठबंधन को बढ़त दिखाई गई, जबकि दूसरे सर्वे में उसे बहुमत मिलने की संभावना जताई गई। इन अनुमानों से साफ है कि चुनावी मुकाबले में किसी एक पक्ष की जीत को निश्चित नहीं माना जा सकता।

मतदान के बाद सीटों का वास्तविक गणित सामने आएगा। इसके बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सा गठबंधन बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाता है। किसी गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें मिलना और सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं।

इजराइल में चुनाव का तरीका भारत से अलग

इजराइल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री के नाम पर वोट नहीं डालते। यहां चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को वोट दिया जाता है। प्रत्येक पार्टी चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार करती है। पूरे देश में पार्टी को मिलने वाले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में उसकी सीटें निर्धारित होती हैं।

हालांकि, चुनाव में हिस्सा लेने वाली हर पार्टी को संसद में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इसके लिए उसे कुल वैध मतों में से कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करने होते हैं। अगर कोई पार्टी इस निर्धारित सीमा तक नहीं पहुंचती, तो उसे संसद में कोई सीट नहीं मिलती।

उम्मीदवारों की सूची भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चुनाव से पहले पार्टी अपने उम्मीदवारों को एक निश्चित क्रम में रखती है। उदाहरण के तौर पर, किसी दल को 20 सीटें मिलती हैं, तो उसकी सूची में पहले 20 स्थानों पर मौजूद उम्मीदवार सांसद बन सकते हैं।

इस तरह मतदाताओं का वोट किसी एक उम्मीदवार के बजाय पार्टी की कुल ताकत तय करने में योगदान देता है। इसके बाद संसद में अलग-अलग दलों की सीटों के आधार पर सरकार बनाने की कोशिश होती है। कई दलों के बीच समझौते और समर्थन जुटाने की जरूरत ही इजराइल की राजनीति को जटिल बनाती है।

चुनाव में चार मुद्दे तय करेंगे मतदाताओं का रुख

1. हमास के हमले की जिम्मेदारी किसकी?

इजराइल के लिए 7 अक्टूबर 2023 का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा। उस दिन हमास ने देश पर बड़ा हमला किया था। इस हमले ने इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

हमले को रोकने में नाकामी को लेकर विपक्ष लंबे समय से सरकार से जवाब मांग रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सुरक्षा एजेंसियां और सरकार संभावित खतरे का समय रहते सामना नहीं कर सकीं। उसका कहना है कि इतनी बड़ी घटना की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

मूल खबर के मुताबिक, सरकार ने इस चूक की जांच के लिए आयोग गठित नहीं किया है। यही मुद्दा चुनावी बहस का हिस्सा बना हुआ है। विपक्ष चाहता है कि यह पता लगाया जाए कि सुरक्षा व्यवस्था में कहां गलती हुई और भविष्य में ऐसी घटना को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।

इस मामले में सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसलों पर मतदाताओं का रुख चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

2. धार्मिक समुदाय को सेना में भर्ती से छूट देने पर विवाद

इजराइल में सैन्य सेवा का मुद्दा भी लंबे समय से राजनीतिक बहस के केंद्र में है। देश में अधिकांश यहूदियों के लिए सेना में सेवा देना अनिवार्य है, लेकिन हरेदी समुदाय के कुछ लोगों को धार्मिक अध्ययन के आधार पर छूट मिलती रही है।

इजराइल की स्थापना के बाद धार्मिक संस्थानों में पढ़ाई करने वाले हरेदी समुदाय के लगभग 400 लोगों को सेना में भर्ती से छूट दी गई थी। इसका उद्देश्य धार्मिक शिक्षा और परंपराओं को सुरक्षित रखना था। समय के साथ इस छूट का दायरा बढ़ने से दूसरे समुदायों में असंतोष पैदा हुआ।

विरोध करने वालों का तर्क है कि जब देश युद्ध और सुरक्षा चुनौतियों से गुजर रहा है, तब सैन्य जिम्मेदारियों का बोझ सभी पर समान रूप से पड़ना चाहिए। उनके मुताबिक, सेना में भर्ती से छूट को सीमित करना जरूरी है।

नेतन्याहू के राजनीतिक समर्थन में हरेदी समुदाय की अहम भूमिका बताई जाती है। ऐसे में इस समुदाय को मिलने वाली छूट को लेकर उनका रुख राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।

इसके विपरीत, गादी आइजनकोट चाहते हैं कि हरेदी समुदाय के लोगों को भी सेना या नागरिक सेवा में योगदान देना चाहिए। इस मुद्दे पर दोनों नेताओं की सोच में अंतर चुनाव के दौरान चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है।

3. सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों को लेकर टकराव

इजराइल में सरकार और न्यायपालिका के बीच अधिकारों को लेकर विवाद भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर रहा है। नेतन्याहू सरकार ने गाजा युद्ध शुरू होने से पहले सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां कम करने के उद्देश्य से न्यायिक बदलावों की कोशिश की थी।

इन प्रयासों को लेकर देश में व्यापक विरोध और राजनीतिक बहस हुई थी। विरोधियों का मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर होने से सरकार की शक्तियों पर नियंत्रण प्रभावित हो सकता है। वहीं, न्यायिक व्यवस्था में बदलाव के समर्थक इसे शासन प्रणाली में सुधार के नजरिये से देखते रहे हैं।

यह विवाद केवल कानूनी व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसका संबंध लोकतांत्रिक संस्थाओं, सरकार की जवाबदेही और सत्ता के संतुलन से भी है। चुनाव में मतदाताओं के सामने यह सवाल है कि देश की न्यायिक व्यवस्था और सरकार के बीच अधिकारों का संतुलन किस तरह होना चाहिए।

4. युद्ध कब समाप्त होगा और देश कितना सुरक्षित है?

राष्ट्रीय सुरक्षा नेतन्याहू की राजनीति का प्रमुख आधार रही है। उन्होंने हमास के खिलाफ निर्णायक जीत का वादा किया था, लेकिन मूल खबर के अनुसार, हमास और लेबनान का हिजबुल्लाह अब भी सक्रिय हैं।

युद्ध और सुरक्षा की स्थिति ने इजराइल के राजनीतिक नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की है। मतदाता यह जानना चाहते हैं कि सैन्य अभियान के लक्ष्य किस हद तक पूरे हुए हैं और देश को स्थायी सुरक्षा दिलाने के लिए आगे क्या रणनीति अपनाई जाएगी।

आइजनकोट का सेना में लंबा अनुभव उन्हें इस बहस में एक महत्वपूर्ण दावेदार बनाता है। दूसरी ओर, नेतन्याहू अपने राजनीतिक अनुभव और सुरक्षा संबंधी नीतियों के आधार पर समर्थन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

नेतन्याहू और आइजनकोट का सैन्य जीवन भी चर्चा में

नेतन्याहू ने कमांडो यूनिट में दी थी सेवा

बेंजामिन नेतन्याहू का सेना से पुराना संबंध रहा है। वह 1967 में इजराइली सेना में शामिल हुए थे और उन्होंने विशेष सैन्य इकाई सायरेत मतकल में काम किया। यह यूनिट खुफिया अभियानों और बंधकों को छुड़ाने जैसे विशेष ऑपरेशनों के लिए जानी जाती है।

1972 में सबेना एयरलाइंस के विमान के अपहरण के बाद बंधकों को छुड़ाने के अभियान में भी नेतन्याहू शामिल रहे थे। उनके जीवन में सैन्य सेवा के दौरान परिवार को बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ा।

उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मौत हो गई थी। वह इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। यह घटना नेतन्याहू परिवार के इतिहास का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

आइजनकोट ने सैनिक के रूप में शुरू किया था करियर

गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में एक सामान्य सैनिक के तौर पर अपना सैन्य करियर शुरू किया था। करीब 38 वर्षों की सेवा के बाद वह 2015 में इजराइल के सेना प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे।

सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने सैन्य रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों की जिम्मेदारी संभाली। उनके नाम से जुड़ी रणनीतिक सोच को ‘आइजनकोट डॉक्ट्रिन’ कहा जाता है।

उनके निजी जीवन में भी गाजा युद्ध ने गहरा दुख पहुंचाया। दिसंबर 2023 में युद्ध के दौरान उनके बेटे गाल की मौत हो गई। इसके अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए।

दोनों नेताओं के सैन्य अनुभव और परिवारों ने युद्ध के कारण जो नुकसान झेला है, वह इजराइल की सुरक्षा संबंधी बहस को व्यक्तिगत पहलू भी देता है। हालांकि, चुनाव में मतदाताओं का फैसला केवल उनके सैन्य अतीत से नहीं, बल्कि मौजूदा नीतियों और भविष्य की योजनाओं से भी प्रभावित होगा।

चुनाव परिणाम से तय होगी इजराइल की अगली राजनीतिक दिशा

इजराइल के इस चुनाव में एक तरफ नेतन्याहू का राजनीतिक अनुभव और मौजूदा गठबंधन है, तो दूसरी तरफ आइजनकोट की चुनौती और बदलाव की मांग है। सैन्य सेवा, हमास के हमले की जांच, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और युद्ध की दिशा जैसे मुद्दे मतदाताओं के सामने हैं।

ओपिनियन पोल में आइजनकोट के गठबंधन को मिली बढ़त मुकाबले को रोचक बनाती है, लेकिन सर्वेक्षण अंतिम नतीजे की गारंटी नहीं होते। असली तस्वीर मतदान के बाद सीटों की संख्या और गठबंधन बनाने की क्षमता से सामने आएगी।

अगर किसी भी पक्ष को 61 सीटों का समर्थन नहीं मिलता, तो सरकार गठन के लिए दूसरे दलों के साथ बातचीत करनी पड़ सकती है। ऐसे में चुनाव के बाद होने वाले राजनीतिक समझौते भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे जितना मतदान का परिणाम।

आखिरकार, यह चुनाव केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी का मुकाबला नहीं है। इसके नतीजे यह संकेत देंगे कि इजराइल के लोग सुरक्षा, सैन्य जिम्मेदारियों, न्यायिक सुधार और युद्ध से जुड़े सवालों पर किस तरह का नेतृत्व चाहते हैं।