प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों मध्य एशिया के चार दिवसीय दौरे पर हैं। उनकी यात्रा का पहला पड़ाव उज्बेकिस्तान है, जहां वे राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री किर्गिस्तान का रुख करेंगे। उज्बेकिस्तान में अपने प्रवास के दौरान पीएम मोदी व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, शिक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं।
इस यात्रा को सिर्फ कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं माना जा रहा है। मध्य एशिया में बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच उज्बेकिस्तान की प्राकृतिक संपदा भारत सहित दुनिया के कई देशों के लिए महत्वपूर्ण हो गई है। यूरेनियम, प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा, चांदी, जस्ता और सीसा जैसे संसाधनों ने इस देश को आर्थिक और रणनीतिक रूप से खास बना दिया है।
मध्य एशिया में क्यों खास है उज्बेकिस्तान?
उज्बेकिस्तान समुद्र से नहीं जुड़ा हुआ देश है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। इसके आसपास कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और अफगानिस्तान स्थित हैं। यानी यह मध्य एशिया के कई देशों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क बिंदु है।
देश की अहमियत केवल भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं है। जमीन के नीचे मौजूद प्राकृतिक संसाधन इसकी अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत हैं। यही वजह है कि ऊर्जा, खनिज और औद्योगिक संसाधनों को लेकर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की नजर उज्बेकिस्तान पर बनी हुई है।
यूरेनियम बना सबसे महत्वपूर्ण संसाधन
उज्बेकिस्तान की प्राकृतिक संपदा में यूरेनियम का स्थान बेहद अहम है। यह देश दुनिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादकों और आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। यहां यूरेनियम का उत्पादन मुख्य रूप से नवोई क्षेत्र और मध्य किजिलकुम इलाके में किया जाता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025 में देश का यूरेनियम उत्पादन करीब 7,000 टन तक पहुंचने की बात सामने आई है। इसके अलावा सरकार आने वाले वर्षों में उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
यूरेनियम की वैश्विक मांग का बड़ा कारण परमाणु ऊर्जा है। दुनिया के कई देश कार्बन उत्सर्जन घटाने और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति के लिए परमाणु बिजली को महत्व दे रहे हैं। परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के तौर पर यूरेनियम की जरूरत होती है। ऐसे में जिन देशों के पास इसका बड़ा भंडार और उत्पादन क्षमता है, उनकी रणनीतिक अहमियत भी बढ़ती है।
भारत भी परमाणु ऊर्जा उत्पादन को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इसलिए उज्बेकिस्तान के साथ यूरेनियम और परमाणु ऊर्जा से जुड़े संभावित सहयोग को भविष्य के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
बिना बड़े पैमाने पर खुदाई के निकाला जाता है यूरेनियम
उज्बेकिस्तान में यूरेनियम निकालने के लिए इन-सीटू रिकवरी यानी इन-सीटू लीचिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक खनन में जमीन को बड़े स्तर पर खोदना पड़ सकता है, जबकि इस प्रक्रिया में भूमिगत अयस्क तक कुओं के जरिए पहुंच बनाई जाती है।
एक विशेष घोल को जमीन के भीतर मौजूद यूरेनियम वाले क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। यह प्रक्रिया यूरेनियम को घोल में लाने में मदद करती है। इसके बाद यूरेनियम युक्त तरल को सतह पर लाकर आगे प्रोसेस किया जाता है।
इस तकनीक की वजह से पारंपरिक खुले खनन की तुलना में सतह पर होने वाली खुदाई कम हो सकती है। उज्बेकिस्तान अपने यूरेनियम उद्योग में नई परियोजनाओं के जरिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है।
किजिलकॉक खदान से व्यावसायिक स्तर पर यूरेनियम उत्पादन शुरू होने की जानकारी भी सामने आई है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 1,200 टन यूरेनियम प्रति वर्ष बताई गई है और इसके करीब 15 वर्षों तक उत्पादन करने की संभावना जताई गई है।
सोने की खदानें भी देश की बड़ी ताकत
यूरेनियम के अलावा उज्बेकिस्तान सोने के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है। देश में सोने की कई महत्वपूर्ण खदानें मौजूद हैं। नवोई क्षेत्र की मुरुंताउ खदान को दुनिया की प्रमुख सोने की खदानों में शामिल किया जाता है।
सोने से उज्बेकिस्तान को महत्वपूर्ण निर्यात आय प्राप्त होती है। यही कारण है कि देश की अर्थव्यवस्था में इसका खास योगदान है। सोने के साथ-साथ यहां तांबा, चांदी, जस्ता और सीसा जैसे कई अन्य धात्विक खनिज भी पाए जाते हैं।
इन खनिजों का इस्तेमाल निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। इस तरह उज्बेकिस्तान की खनिज संपदा केवल किसी एक संसाधन पर निर्भर नहीं है, बल्कि यहां कई तरह के उपयोगी खनिज मौजूद हैं।
प्राकृतिक गैस के बिना अधूरी है उज्बेकिस्तान की कहानी
ऊर्जा क्षेत्र में उज्बेकिस्तान की सबसे बड़ी ताकतों में प्राकृतिक गैस भी शामिल है। देश में तेल के मुकाबले गैस का महत्व अधिक है। बिजली उत्पादन, उद्योग और घरेलू जरूरतों के लिए प्राकृतिक गैस का व्यापक इस्तेमाल होता है।
उज्बेकिस्तान केवल कच्ची गैस निकालकर बेचने के बजाय उसे घरेलू उद्योगों में इस्तेमाल कर ज्यादा मूल्य वाले उत्पाद तैयार करने की दिशा में भी बढ़ रहा है। प्राकृतिक गैस से पेट्रोकेमिकल और दूसरे औद्योगिक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
यदि गैस से बने तैयार या प्रोसेस्ड उत्पादों का निर्यात बढ़ता है, तो देश को कच्चे संसाधन की तुलना में अधिक आर्थिक लाभ मिल सकता है। यही रणनीति उज्बेकिस्तान को अपने प्राकृतिक संसाधनों से अधिक कमाई करने में मदद कर सकती है।
तेल है, लेकिन उत्पादन में कई चुनौतियां
उज्बेकिस्तान में तेल के भंडार भी हैं, लेकिन इसका उत्पादन प्राकृतिक गैस जितना बड़ा नहीं है। कुछ पुराने तेल क्षेत्रों में उत्पादन में कमी आई है। ऐसे में नए क्षेत्रों की खोज और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।
गहरे इलाकों में मौजूद तेल और गैस भंडार तक पहुंचने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती है। इसके लिए आधुनिक ड्रिलिंग, भूकंपीय सर्वेक्षण और बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
सरकार विदेशी निवेश और कंपनियों को ऊर्जा खोज के क्षेत्र में आकर्षित करने की कोशिश कर रही है। इससे पूंजी के साथ नई तकनीक भी देश में आ सकती है। भारत की कंपनियों के लिए भी ऊर्जा, इंजीनियरिंग और औद्योगिक सेवाओं में भविष्य के अवसर पैदा हो सकते हैं।
नए जमाने के खनिजों पर भी नजर
आज दुनिया सिर्फ पारंपरिक ऊर्जा संसाधनों की तलाश में नहीं है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और आधुनिक बिजली नेटवर्क के विस्तार के साथ महत्वपूर्ण खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
तांबा जैसे खनिज बिजली के नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा लिथियम, निकल और दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व भी बढ़ रहा है। उज्बेकिस्तान अपनी खनिज क्षमता का विस्तार करने और नए संसाधनों की खोज पर ध्यान दे रहा है।
भारत के लिए यह क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा उद्योग तेजी से विकसित हो रहे हैं। यदि भारत और उज्बेकिस्तान खनिजों की खोज, प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन के क्षेत्र में मिलकर काम करते हैं, तो दोनों देशों को फायदा हो सकता है।
भारत-उज्बेकिस्तान रिश्तों में व्यापार भी अहम मुद्दा
दोनों देशों के संबंध केवल खनिज और ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। भारत और उज्बेकिस्तान के बीच फार्मा, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में भी सहयोग मौजूद है।
उज्बेकिस्तान में भारतीय दवाओं की अच्छी मांग है। भारतीय कंपनियां चिकित्सा उपकरण, स्वास्थ्य सेवाओं और फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भी संभावनाएं तलाश सकती हैं।
दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 1.3 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है। हालांकि व्यापार को और विस्तार देने के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कनेक्टिविटी है। उज्बेकिस्तान तक भारत की सीधी समुद्री पहुंच नहीं है।
चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक नए परिवहन गलियारों के जरिए भारत इस समस्या को कम करने की कोशिश कर रहा है। बेहतर कनेक्टिविटी से व्यापार की लागत और समय दोनों घट सकते हैं।
परमाणु ऊर्जा भी बन सकती है भविष्य का बड़ा क्षेत्र
उज्बेकिस्तान अपने ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा की भूमिका बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। परमाणु बिजली क्षमता विकसित करने के लिए ईंधन, तकनीकी विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होगी।
भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में लंबे समय का अनुभव है। इसलिए दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण परमाणु सहयोग की संभावनाएं भविष्य में चर्चा का विषय बन सकती हैं। हालांकि ऐसे किसी भी सहयोग में अंतरराष्ट्रीय नियमों, परमाणु सुरक्षा और गैर-प्रसार से जुड़े मानकों का पालन जरूरी होगा।
पीएम मोदी के दौरे का बड़ा रणनीतिक संदेश
प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब मध्य एशिया का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। रूस, चीन, यूरोपीय देश, अमेरिका और तुर्की सभी इस क्षेत्र के साथ अपने संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
उज्बेकिस्तान इस पूरे क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बाजार है और इसे मध्य एशिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश भी बताया जाता है। बड़ी आबादी, प्राकृतिक संसाधन और रणनीतिक स्थिति इसे भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बनाते हैं।
भारत के लिए उज्बेकिस्तान ऊर्जा और खनिजों के अलावा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम है। अफगानिस्तान की बदलती स्थिति के कारण क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है।
इस लिहाज से पीएम मोदी की यात्रा को केवल एक सामान्य द्विपक्षीय दौरे के रूप में नहीं देखा जा सकता। यूरेनियम से लेकर सोने, गैस और महत्वपूर्ण खनिजों तक फैली उज्बेकिस्तान की प्राकृतिक संपदा भारत के लिए आने वाले वर्षों में नए आर्थिक और रणनीतिक अवसर खोल सकती है।




