दुनिया में जब भी सबसे बड़े खेल आयोजनों की बात होती है, तो दो नाम सबसे पहले सामने आते हैं—ओलंपिक गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स। दोनों प्रतियोगिताएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होती हैं, दोनों में खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और दोनों में पदकों की होड़ रहती है। यही वजह है कि अक्सर लोग इन दोनों आयोजनों को एक जैसा मान लेते हैं। हालांकि, इनकी संरचना, इतिहास, भाग लेने वाले देशों, खेलों और महत्व में कई बड़े अंतर हैं।
इन दिनों स्कॉटलैंड के ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन हो रहा है, जिसके चलते एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि आखिर कॉमनवेल्थ गेम्स और ओलंपिक गेम्स में वास्तविक अंतर क्या है। आइए आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं कि दोनों आयोजन कैसे अलग हैं और लोग इन्हें लेकर भ्रमित क्यों हो जाते हैं।
शुरुआत और इतिहास में बड़ा अंतर
सबसे पहले अगर इतिहास की बात करें तो ओलंपिक गेम्स की जड़ें हजारों साल पुराने प्राचीन ग्रीस से जुड़ी हुई हैं। आधुनिक ओलंपिक की शुरुआत वर्ष 1896 में हुई थी और तब से यह दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजन माना जाता है।
दूसरी ओर, कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत वर्ष 1930 में हुई थी। उस समय इसे ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था। बाद में समय के साथ इसका नाम बदलकर कॉमनवेल्थ गेम्स कर दिया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रमंडल देशों के बीच खेलों के माध्यम से सहयोग और मित्रता को बढ़ावा देना था।
यानी दोनों आयोजनों की शुरुआत अलग परिस्थितियों और अलग उद्देश्यों के साथ हुई थी।
कौन कराता है इन खेलों का आयोजन?
दोनों प्रतियोगिताओं के संचालन की जिम्मेदारी भी अलग-अलग संस्थाओं के पास होती है। ओलंपिक गेम्स का संचालन इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (IOC) करती है। यही संस्था मेजबान शहर का चयन करती है, नियम तय करती है और पूरे आयोजन की निगरानी करती है।
वहीं, कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) द्वारा कराया जाता है। यह संस्था केवल राष्ट्रमंडल देशों के खेलों का प्रबंधन करती है और इसकी कार्यप्रणाली IOC से पूरी तरह अलग होती है। यानी दोनों आयोजनों का संचालन अलग संस्थाओं द्वारा किया जाता है और इनके नियम भी स्वतंत्र रूप से बनाए जाते हैं।
किन देशों को मिलता है हिस्सा लेने का मौका?
सबसे बड़ा अंतर भाग लेने वाले देशों की संख्या और पात्रता में देखने को मिलता है। ओलंपिक गेम्स दुनिया का सबसे व्यापक खेल आयोजन है। इसमें लगभग हर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र देश भाग ले सकता है। वर्तमान समय में 200 से अधिक देशों के खिलाड़ी ओलंपिक में उतरते हैं। यही कारण है कि यहां प्रतिस्पर्धा का स्तर बेहद ऊंचा माना जाता है।
इसके विपरीत, कॉमनवेल्थ गेम्स में केवल वही देश और क्षेत्र हिस्सा लेते हैं जो कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस के सदस्य हैं। इनमें ज्यादातर वे देश शामिल हैं जो कभी ब्रिटिश शासन का हिस्सा रहे थे। कुल मिलाकर लगभग 70 से अधिक टीमें इस प्रतियोगिता में भाग लेती हैं। यही सीमा इसे ओलंपिक से अलग बनाती है।
ग्रेट ब्रिटेन और अलग-अलग टीमों का मामला
एक और दिलचस्प अंतर लोगों को अक्सर उलझन में डाल देता है। ओलंपिक गेम्स में इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड मिलकर “ग्रेट ब्रिटेन” के नाम से एक संयुक्त टीम बनाते हैं।
लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स में यही चारों क्षेत्र अलग-अलग टीमों के रूप में हिस्सा लेते हैं। इसलिए कई बार दर्शकों को लगता है कि एक ही देश अलग-अलग प्रतियोगिताओं में अलग तरीके से क्यों खेल रहा है। असल में यह कॉमनवेल्थ गेम्स की परंपरा और नियमों का हिस्सा है।
आयोजन का स्वरूप भी अलग
ओलंपिक गेम्स केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं हैं। इनके दो प्रमुख संस्करण होते हैं—समर ओलंपिक और विंटर ओलंपिक। समर ओलंपिक में एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक और अन्य पारंपरिक खेल शामिल होते हैं, जबकि विंटर ओलंपिक में स्कीइंग, आइस हॉकी, फिगर स्केटिंग और बर्फ पर खेले जाने वाले अन्य खेल आयोजित किए जाते हैं।
दूसरी ओर, कॉमनवेल्थ गेम्स का केवल समर संस्करण आयोजित होता है। इसका कोई नियमित विंटर संस्करण नहीं है। यही वजह है कि ओलंपिक का दायरा कॉमनवेल्थ गेम्स की तुलना में कहीं अधिक व्यापक माना जाता है।
खेलों की सूची में भी दिखाई देता है फर्क
हालांकि दोनों प्रतियोगिताओं में कई लोकप्रिय खेल समान हैं, पूरी सूची एक जैसी नहीं होती। दोनों आयोजनों में एथलेटिक्स, तैराकी, मुक्केबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन और भारोत्तोलन जैसे खेल शामिल होते हैं।
लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स में लॉन बॉल्स और नेटबॉल जैसे खेल भी खेले जाते हैं, जिन्हें ओलंपिक में जगह नहीं मिली है। इसके विपरीत, ओलंपिक में स्केटबोर्डिंग, स्पोर्ट क्लाइम्बिंग, सर्फिंग और अन्य आधुनिक खेल शामिल किए जा चुके हैं, जबकि ये कॉमनवेल्थ गेम्स का हिस्सा नहीं होते। इसलिए दोनों आयोजनों का खेल कार्यक्रम भी अलग-अलग नज़र आता है।
प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा का स्तर
खिलाड़ियों के नजरिए से देखें तो ओलंपिक पदक जीतना सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। दुनिया के लगभग हर शीर्ष खिलाड़ी का सपना ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतना होता है, क्योंकि यहां दुनिया के हर कोने से सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन होती है और एक पदक हासिल करना वर्षों की मेहनत का परिणाम माना जाता है।
वहीं, कॉमनवेल्थ गेम्स भी सम्मानजनक प्रतियोगिता है, लेकिन इसकी प्रतिस्पर्धा सीमित देशों के बीच होती है। इसलिए इसे ओलंपिक जितनी वैश्विक प्रतिष्ठा नहीं मिलती। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि यहां जीत आसान होती है। कई खेलों में कॉमनवेल्थ स्तर पर भी कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है।
दोनों में क्या-क्या समान है?
अंतर के बावजूद दोनों आयोजनों में कई समानताएं भी मौजूद हैं। दोनों प्रतियोगिताएं सामान्य तौर पर चार-चार साल के अंतराल पर आयोजित की जाती हैं। दोनों में खिलाड़ियों का मार्च पास्ट होता है, उद्घाटन और समापन समारोह आयोजित किए जाते हैं तथा पदक तालिका बनाई जाती है।
देशों के खिलाड़ी अपने राष्ट्रीय ध्वज के साथ मैदान में प्रवेश करते हैं और स्वर्ण, रजत तथा कांस्य पदकों के लिए मुकाबला करते हैं। यही समानताएं कई बार दर्शकों को भ्रमित कर देती हैं कि दोनों प्रतियोगिताएं लगभग एक जैसी हैं।
आखिर लोग क्यों हो जाते हैं कंफ्यूज?
इस सवाल का जवाब दोनों आयोजनों की प्रस्तुति में छिपा है। उद्घाटन समारोह, खिलाड़ियों की परेड, मेजबान शहर, रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, पदक समारोह और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा—इन सभी चीजों का प्रारूप काफी हद तक समान दिखाई देता है।
इसके अलावा दोनों के नाम में “गेम्स” शब्द होने से भी आम लोगों को लगता है कि दोनों आयोजन एक ही तरह के हैं। लेकिन जब इनके नियम, पात्रता, इतिहास और महत्व को विस्तार से देखा जाता है, तब स्पष्ट हो जाता है कि दोनों की पहचान अलग-अलग है।
भारत के लिए दोनों आयोजनों का महत्व
भारत दोनों प्रतियोगिताओं में नियमित रूप से हिस्सा लेता है। कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का प्रदर्शन अक्सर मजबूत रहता है। शूटिंग (जब शामिल हो), कुश्ती, बॉक्सिंग, बैडमिंटन, वेटलिफ्टिंग और टेबल टेनिस जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ी लगातार पदक जीतते रहे हैं।
वहीं, ओलंपिक में भी भारत ने हाल के वर्षों में अपनी उपस्थिति मजबूत की है। एथलेटिक्स, नीरज चोपड़ा जैसे खिलाड़ियों की सफलता, हॉकी, शूटिंग, बैडमिंटन और अन्य खेलों में पदकों ने देश की उम्मीदें बढ़ाई हैं। दोनों प्रतियोगिताएं भारतीय खिलाड़ियों के लिए अलग-अलग स्तर पर महत्वपूर्ण हैं और युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव प्रदान करती हैं।
(Photo: AI Generated)




