शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में किडनी की भूमिका बेहद अहम होती है। यह सिर्फ खून को साफ करने का काम ही नहीं करती, बल्कि शरीर में पानी, नमक, मिनरल्स और कई जरूरी तत्वों का संतुलन भी बनाए रखती है। जब किडनी ठीक तरह से काम करती है, तब शरीर के विषैले पदार्थ यूरिन के जरिए बाहर निकल जाते हैं। लेकिन यदि किडनी धीरे-धीरे अपनी कार्यक्षमता खोने लगे, तो इसका असर पूरे शरीर पर दिखाई देने लगता है।
पिछले कुछ वर्षों में क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान, बढ़ता तनाव, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याएं इस बीमारी के प्रमुख कारण बनकर सामने आई हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि CKD केवल किडनी तक सीमित बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती है। यही वजह है कि ऐसे मरीज कई तरह के संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इनमें शिंगल्स यानी हर्पीज जोस्टर संक्रमण सबसे प्रमुख माना जाता है।
भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं किडनी रोग के मामले
देश में किडनी से जुड़ी बीमारियां अब एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार भारत की लगभग 13 प्रतिशत से अधिक आबादी किसी न किसी स्तर पर क्रोनिक किडनी डिजीज से प्रभावित है। यानी लगभग हर आठवां व्यक्ति इस बीमारी की चपेट में आ सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि शुरुआती चरण में इस बीमारी के लक्षण बहुत हल्के होते हैं, इसलिए अधिकांश लोगों को समय रहते इसका पता नहीं चल पाता। जब तक बीमारी सामने आती है, तब तक किडनी का काफी नुकसान हो चुका होता है। ऐसे में मरीज को नियमित जांच, दवाइयों और खानपान पर विशेष ध्यान देना पड़ता है।
आखिर कैसे कमजोर पड़ जाती है शरीर की सुरक्षा प्रणाली?
किडनी केवल शरीर की सफाई ही नहीं करती, बल्कि शरीर के कई जैविक कार्यों को संतुलित रखने में भी मदद करती है। जब यह अंग ठीक से काम नहीं करता, तो शरीर में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में यूरिमिया कहा जाता है।
यूरिमिया के कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है। खासतौर पर टी-सेल आधारित इम्युनिटी कमजोर होने लगती है। यही टी-सेल्स वायरस और अन्य संक्रमणों से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब इनकी क्षमता कम हो जाती है, तब शरीर पुराने निष्क्रिय वायरस को भी नियंत्रित नहीं रख पाता। यही कारण है कि क्रोनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों में कई प्रकार के संक्रमणों का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक देखा जाता है।
शिंगल्स क्या है और क्यों होता है?
शिंगल्स एक वायरल संक्रमण है, जिसे हर्पीज जोस्टर भी कहा जाता है। इसका कारण वैरीसेला-जोस्टर वायरस होता है। यही वायरस बचपन में या जीवन के किसी भी समय होने वाले चिकनपॉक्स के लिए भी जिम्मेदार होता है।
दिलचस्प बात यह है कि चिकनपॉक्स ठीक होने के बाद भी यह वायरस पूरी तरह खत्म नहीं होता। यह शरीर की नसों के आसपास निष्क्रिय अवस्था में वर्षों तक मौजूद रह सकता है। यदि किसी कारण से व्यक्ति की इम्युनिटी कमजोर हो जाए, तो यही वायरस दोबारा सक्रिय होकर शिंगल्स का रूप ले लेता है। क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीजों में कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण इस वायरस के दोबारा सक्रिय होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
किन लोगों में जोखिम अधिक रहता है?
हालांकि शिंगल्स किसी भी व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा कहीं अधिक रहता है। इनमें—
- क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज
- डायबिटीज से पीड़ित लोग
- लंबे समय तक स्टेरॉयड लेने वाले मरीज
- कैंसर का इलाज करा रहे लोग
- अंग प्रत्यारोपण के बाद इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेने वाले मरीज
- बढ़ती उम्र के बुजुर्ग
इन सभी परिस्थितियों में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ सकती है, जिससे वायरस दोबारा सक्रिय होने की संभावना बढ़ जाती है।
शिंगल्स के शुरुआती संकेतों को न करें नजरअंदाज
इस संक्रमण की शुरुआत अक्सर त्वचा के किसी एक हिस्से में दर्द, जलन, झुनझुनी या खुजली से होती है। इसके बाद उसी स्थान पर लाल रंग के दाने निकलने लगते हैं, जो धीरे-धीरे पानी से भरे दर्दनाक छालों में बदल जाते हैं।
ये दाने आमतौर पर शरीर के केवल एक तरफ दिखाई देते हैं और चेहरे, गर्दन, छाती या कमर के आसपास अधिक देखने को मिलते हैं। कई मरीजों में बुखार, थकान, सिरदर्द और कमजोरी जैसी शिकायतें भी देखने को मिलती हैं।
दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है
शिंगल्स की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है पोस्ट-हर्पेटिक न्यूराल्जिया (PHN)। इस स्थिति में त्वचा के दाने और छाले पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद भी नसों में तेज दर्द महीनों तक बना रह सकता है। यह दर्द इतना ज्यादा हो सकता है कि मरीज के लिए सामान्य कपड़े पहनना, सोना या रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम करना भी मुश्किल हो जाता है।
‘शिंगल्स एक्शन वीक 2026’ से जुड़े एक वैश्विक सर्वे के अनुसार भारत में शिंगल्स का अनुभव कर चुके लगभग 43 प्रतिशत लोगों ने दर्द को बेहद असहनीय बताया। वहीं हर तीन में से एक मरीज ने स्वीकार किया कि इस बीमारी ने उनके कामकाज और सामाजिक जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
CKD मरीजों के लिए क्यों ज्यादा गंभीर है यह संक्रमण?
क्रोनिक किडनी डिजीज के मरीज पहले से ही कई तरह की दवाइयों और नियमित इलाज पर निर्भर रहते हैं। यदि ऐसे मरीज को शिंगल्स हो जाए, तो उनकी दिनचर्या और अधिक कठिन हो सकती है।
लगातार दर्द, त्वचा पर छाले और कमजोरी के कारण मरीज समय पर दवा नहीं ले पाता, डॉक्टर के पास जाना मुश्किल हो सकता है और खानपान भी प्रभावित होने लगता है। इससे किडनी की बीमारी का नियंत्रण भी बिगड़ सकता है।
यदि मरीज एंड-स्टेज रीनल डिजीज (ESRD) तक पहुंच चुका हो, तो संक्रमण का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि इस अवस्था में शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता काफी कमजोर हो जाती है।
इलाज के साथ बचाव भी है जरूरी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि क्रोनिक किडनी डिजीज का इलाज केवल दवाइयों तक सीमित नहीं होना चाहिए। संक्रमण से बचाव भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मरीजों को नियमित रूप से किडनी की जांच करानी चाहिए, डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाइयां समय पर लेनी चाहिए और ब्लड प्रेशर तथा ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना चाहिए। संतुलित आहार, पर्याप्त आराम और स्वच्छ जीवनशैली भी संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं।
वैक्सीनेशन क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण?
विशेषज्ञों के अनुसार शिंगल्स से बचाव के लिए टीकाकरण प्रभावी उपायों में शामिल है। यह वैक्सीन वायरस से होने वाले संक्रमण और उससे जुड़ी जटिलताओं की संभावना को काफी हद तक कम कर सकती है।
विशेष रूप से उन लोगों के लिए, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर है, डॉक्टर की सलाह के अनुसार वैक्सीनेशन पर विचार करना फायदेमंद हो सकता है। हालांकि हर मरीज की स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है, इसलिए टीका लगवाने से पहले नेफ्रोलॉजिस्ट या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लेना आवश्यक है।
किन बातों का रखें विशेष ध्यान?
यदि किसी व्यक्ति को क्रोनिक किडनी डिजीज है, तो उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत होती है। त्वचा पर अचानक दर्द, जलन, लाल दाने या छाले दिखाई दें, तो इन्हें सामान्य एलर्जी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते डॉक्टर से संपर्क करने पर संक्रमण का इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है, जिससे जटिलताओं का खतरा कम हो जाता है।
साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच, पर्याप्त पानी (डॉक्टर की सलाह के अनुसार), संतुलित भोजन, नियंत्रित ब्लड प्रेशर, डायबिटीज पर नियंत्रण और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना लंबे समय तक बेहतर स्वास्थ्य बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर, क्रोनिक किडनी डिजीज केवल किडनी की बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकती है। कमजोर इम्युनिटी के कारण शिंगल्स जैसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, जो मरीज की जिंदगी को काफी कठिन बना सकता है। इसलिए समय पर इलाज, नियमित निगरानी, स्वस्थ जीवनशैली और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार संक्रमण से बचाव के उपाय अपनाना हर किडनी मरीज के लिए बेहद जरूरी है।
(Photo: AI Generated)




