चंडीगढ़ में आयोजित 118वें अखिल भारतीय मेयर्स काउंसिल सम्मेलन में देश के अलग-अलग राज्यों से आए महापौरों ने शहरी विकास और नगर निकायों से जुड़ी चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। करीब 19 राज्यों से लगभग 30 महापौरों ने सम्मेलन में हिस्सा लिया। शहरी क्षेत्रों में नागरिक सुविधाओं के विस्तार, स्थानीय निकायों को मजबूत करने और शहरों के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन सम्मेलन के दौरान मेयरों के बीच होने वाली चर्चाओं से ज्यादा चंडीगढ़ नगर निगम की आंतरिक राजनीति सुर्खियों में रही।
सम्मेलन में भाजपा पार्षदों की सीमित मौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए। चंडीगढ़ नगर निगम में भाजपा सत्ता में है और मेयर सौरभ जोशी भी भाजपा से हैं। इसके बावजूद सम्मेलन में भाजपा के अधिकांश पार्षद नजर नहीं आए। उद्घाटन सत्र के दौरान भाजपा की पार्षद हरप्रीत कौर बबला ही मौजूद थीं। इसके करीब एक घंटे या उससे अधिक समय बाद भाजपा पार्षद बलविंदर सिंह बिल्लू भी सम्मेलन में पहुंचे। इसके बाद भी भाजपा के अन्य पार्षदों की मौजूदगी दिखाई नहीं दी।
दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी के पार्षदों ने सम्मेलन से पूरी तरह दूरी बनाए रखी। आप ने सम्मेलन के आयोजन और खर्च को लेकर प्रशासन पर सवाल उठाए। पार्टी का आरोप है कि शहर में बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कई काम लंबित हैं और इसके बावजूद पांच सितारा होटल में सरकारी खर्च पर सम्मेलन आयोजित कर जनता के पैसे का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सम्मेलन का उद्देश्य शहरी विकास पर चर्चा
अखिल भारतीय मेयर्स काउंसिल सम्मेलन का उद्देश्य देश के अलग-अलग शहरों के महापौरों और स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को एक मंच उपलब्ध कराना है। सम्मेलन में नगर निकायों की कार्यप्रणाली, शहरों में नागरिक सुविधाओं का विस्तार, शहरी बुनियादी ढांचा, कचरा प्रबंधन, सफाई व्यवस्था, यातायात और स्थानीय स्तर पर विकास की चुनौतियों जैसे विषयों पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया।
चंडीगढ़ में आयोजित सम्मेलन में विभिन्न राज्यों से पहुंचे महापौरों ने अपने-अपने शहरों में किए जा रहे कार्यों और सामने आ रही समस्याओं के बारे में अनुभव साझा किए। शहरों में तेजी से बढ़ती आबादी के साथ नागरिक सुविधाओं की मांग बढ़ रही है। ऐसे में नगर निकायों को आर्थिक और प्रशासनिक रूप से मजबूत करने की जरूरत पर भी चर्चा हुई।
हालांकि चंडीगढ़ के लिए सम्मेलन की राजनीतिक अहमियत इस वजह से ज्यादा रही कि आयोजन स्थल पर ही नगर निगम की सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के बीच दूरी साफ नजर आई।
भाजपा के गढ़ में भाजपा पार्षदों की गैरमौजूदगी
चंडीगढ़ नगर निगम में भाजपा के पास बहुमत है और मेयर का पद भी पार्टी के पास है। ऐसे में माना जा रहा था कि सम्मेलन में भाजपा पार्षदों की बड़ी संख्या मौजूद रहेगी। लेकिन उद्घाटन सत्र में स्थिति इसके उलट नजर आई।
सुबह के कार्यक्रम में भाजपा पार्षद हरप्रीत कौर बबला की मौजूदगी दर्ज हुई। इसके बाद काफी देर तक भाजपा का कोई अन्य पार्षद सम्मेलन स्थल पर दिखाई नहीं दिया। बाद में पार्षद बलविंदर सिंह बिल्लू कार्यक्रम में पहुंचे। इसके बावजूद पार्टी के अन्य पार्षदों की गैरमौजूदगी बनी रही।
भाजपा पार्षदों की इस दूरी को लेकर निगम और पार्टी के भीतर चर्चा शुरू हो गई। हालांकि पार्षदों की गैरमौजूदगी के पीछे अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं, लेकिन एक साथ इतने पार्षदों का सम्मेलन में नजर नहीं आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या भाजपा के भीतर बढ़ रही है नाराजगी?
सम्मेलन से भाजपा पार्षदों की दूरी के बीच पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं होने की चर्चाओं को भी बल मिला। बताया जा रहा है कि कई भाजपा पार्षदों को प्रेस वार्ता और मेयर सम्मेलन के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था।
सम्मेलन से पहले यूटी गेस्ट हाउस में मेयर सौरभ जोशी की ओर से प्रेस वार्ता की गई। इस दौरान सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर समेत कोई अन्य पार्षद उनके साथ नजर नहीं आया। निगम की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में इस स्थिति को भी कई तरह से देखा जा रहा है।
नगर निगम में मेयर के साथ सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ पार्षदों की सामूहिक मौजूदगी सामान्य तौर पर राजनीतिक एकजुटता का संकेत मानी जाती है। ऐसे में मेयर की प्रेस वार्ता और बाद के सम्मेलन में पार्षदों की सीमित भागीदारी ने पार्टी के अंदर संभावित मतभेदों की चर्चाओं को हवा दी।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि सभी पार्षदों की गैरमौजूदगी का कारण केवल निमंत्रण से जुड़ा मुद्दा था या इसके पीछे संगठनात्मक और राजनीतिक नाराजगी भी है। भाजपा की ओर से इस संबंध में कोई स्पष्ट सामूहिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
आप ने सम्मेलन को बताया जनता के पैसे की बर्बादी
आम आदमी पार्टी के पार्षदों ने सम्मेलन से दूरी बनाने का फैसला किया। आप की ओर से सम्मेलन के आयोजन को लेकर प्रशासन पर निशाना साधा गया।
आप नेताओं का आरोप है कि चंडीगढ़ में सड़कें, सफाई, पार्किंग, कचरा प्रबंधन और अन्य बुनियादी नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे अभी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं। ऐसे समय में पांच सितारा होटल में बड़े स्तर का सम्मेलन आयोजित करना शहर की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता।
आप का कहना है कि स्थानीय प्रशासन और नगर निगम को पहले शहर के रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने पर ध्यान देना चाहिए। पार्टी ने सम्मेलन के खर्च को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जनता से जुड़े संसाधनों का इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों पर नहीं होना चाहिए जिनका सीधा लाभ शहरवासियों को नजर नहीं आता।
आप पार्षदों का बहिष्कार इस बात का संकेत भी माना जा रहा है कि पार्टी आने वाले समय में नगर निगम की कार्यप्रणाली और भाजपा की नीतियों को लेकर अधिक आक्रामक रुख अपना सकती है।
कांग्रेस पार्षद सम्मेलन में पहुंचे
जहां भाजपा के अधिकांश पार्षद सम्मेलन से दूर रहे और आप ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया, वहीं कांग्रेस के कई पार्षद कार्यक्रम में पहुंचे। कांग्रेस पार्षद जसबीर सिंह बंटी, तरुणा मेहता सहित अन्य पार्षद सम्मेलन स्थल पर नजर आए।
कांग्रेस पार्षदों की मौजूदगी ने निगम की राजनीतिक तस्वीर को और दिलचस्प बना दिया। एक ओर सत्ता में मौजूद भाजपा के अधिकांश पार्षद कार्यक्रम में नहीं पहुंचे, दूसरी ओर विपक्षी कांग्रेस के पार्षदों ने सम्मेलन में भाग लिया।
इस स्थिति ने निगम के भीतर राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में यदि भाजपा पार्षदों की नाराजगी खुलकर सामने आती है तो इसका असर नगर निगम की राजनीति पर पड़ सकता है।
मेयर के लिए भी बढ़ सकती हैं चुनौतियां
मेयर सौरभ जोशी के लिए सम्मेलन का आयोजन एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर चंडीगढ़ को शहरी विकास से जुड़े संवाद का मंच देने का अवसर था, लेकिन दूसरी ओर कार्यक्रम में पार्टी पार्षदों की कम मौजूदगी ने राजनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी।
मेयर पद संभालने के बाद नगर निगम के भीतर विभिन्न मुद्दों पर भाजपा पार्षदों के साथ बेहतर समन्वय बनाए रखना उनके लिए महत्वपूर्ण होगा। यदि पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों में असंतोष बढ़ता है तो इसका असर सदन की कार्यवाही और महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि अभी तक भाजपा पार्षदों की नाराजगी को लेकर कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि गैरमौजूदगी किसी संगठित विरोध का हिस्सा थी। लेकिन एक साथ बड़ी संख्या में पार्षदों का सम्मेलन से दूर रहना राजनीतिक रूप से जरूर सवाल खड़े करता है।
निगम की राजनीति में बढ़ सकती है खींचतान
चंडीगढ़ नगर निगम में पिछले कुछ समय से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर राजनीतिक टकराव देखने को मिलता रहा है। शहर की सफाई व्यवस्था, सड़कों की स्थिति, पार्किंग, विकास कार्यों, वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक फैसलों को लेकर पार्षदों के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं।
अब मेयर सम्मेलन को लेकर भाजपा पार्षदों की गैरमौजूदगी ने इन चर्चाओं को एक नया मुद्दा दे दिया है। विपक्षी दल इस स्थिति को भाजपा की आंतरिक कमजोरी के तौर पर पेश कर सकते हैं, जबकि भाजपा के सामने संगठन के भीतर समन्वय मजबूत करने की चुनौती होगी।
अगर आने वाले दिनों में भाजपा पार्षदों की ओर से सम्मेलन में आमंत्रण, कार्यक्रम की व्यवस्था या मेयर के साथ समन्वय को लेकर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया आती है तो तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
प्रशासन के लिए भी उठे सवाल
सम्मेलन के आयोजन को लेकर आम आदमी पार्टी के विरोध के कारण प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है। आप का कहना है कि यदि सम्मेलन का खर्च प्रशासन या सार्वजनिक संसाधनों से किया गया है तो उसकी प्राथमिकता और उपयोगिता पर जवाब दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर सम्मेलन का उद्देश्य देश के विभिन्न शहरों के बीच अनुभव साझा करना और शहरी निकायों की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए विचारों का आदान-प्रदान करना बताया गया है। ऐसे में सम्मेलन की उपयोगिता और खर्च को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है।
फिलहाल 118वें अखिल भारतीय मेयर्स काउंसिल सम्मेलन में देशभर के महापौरों की मौजूदगी के बावजूद चंडीगढ़ की स्थानीय राजनीति ही चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई। भाजपा पार्षदों की सीमित भागीदारी, आप का पूर्ण बहिष्कार और कांग्रेस पार्षदों की मौजूदगी ने नगर निगम के भीतर चल रहे राजनीतिक समीकरणों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अब देखना होगा कि भाजपा अपने पार्षदों के बीच उठ रहे मतभेदों और नाराजगी की चर्चाओं को किस तरह संभालती है। वहीं आप इस मुद्दे को आने वाले दिनों में नगर निगम की कार्यप्रणाली और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक हथियार बनाती है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण होगा। सम्मेलन खत्म हो गया है, लेकिन इसके बहाने चंडीगढ़ निगम की सियासत में शुरू हुई चर्चा अभी खत्म होती नजर नहीं आ रही।



