लोकसभा में सोमवार को विपक्ष के भारी हंगामे के बीच ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल 2026 को मंजूरी दे दी गई। सदन में लगातार शोर-शराबे के कारण विधेयक पर विस्तृत चर्चा नहीं हो सकी और इसे बिना बहस के पारित कर दिया गया। सरकार का कहना है कि इस नए कानून का उद्देश्य ट्रिब्यूनलों की शक्तियों में बदलाव करना नहीं, बल्कि उनकी नियुक्ति व्यवस्था, प्रशासन और निगरानी को ज्यादा व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना है।
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को लेकर स्पष्ट किया कि इससे देश के किसी भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में कटौती या बदलाव नहीं किया जा रहा है। सरकार का जोर मुख्य रूप से नियुक्तियों की प्रक्रिया को संस्थागत बनाने और ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली को अधिक स्वतंत्र बनाने पर है।
इस विधेयक की खास बात यह है कि इसका सीधा संबंध सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने 2021 के ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट के कई प्रावधानों को संविधान के अनुरूप नहीं माना था। नए विधेयक के जरिए सरकार ने उस पुराने कानून को हटाने और ट्रिब्यूनल व्यवस्था के लिए नई संस्थागत व्यवस्था तैयार करने का प्रस्ताव रखा है।
16 प्रमुख ट्रिब्यूनलों के लिए बनेगा राष्ट्रीय आयोग
प्रस्तावित कानून में सबसे बड़ा बदलाव राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग के गठन को लेकर है। सरकार के अनुसार यह आयोग देश के 16 प्रमुख ट्रिब्यूनलों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रशासनिक कामों की निगरानी करेगा।
नए आयोग की जिम्मेदारियों में ट्रिब्यूनलों के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को देखना शामिल होगा। इसके साथ ही आयोग ट्रिब्यूनलों के कामकाज की समीक्षा करेगा और यदि किसी अध्यक्ष या सदस्य के खिलाफ शिकायत सामने आती है तो उसकी जांच से जुड़ी प्रक्रिया की निगरानी भी करेगा।
इन ट्रिब्यूनलों में प्रशासनिक मामलों, आयकर, उपभोक्ता विवाद, पर्यावरण, कंपनी कानून, सशस्त्र बलों और दूरसंचार जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े संस्थान शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि अलग-अलग ट्रिब्यूनलों के लिए एक समन्वित निगरानी व्यवस्था होने से नियुक्तियों और प्रशासनिक कामकाज में एकरूपता आएगी।
सरकार इसे ट्रिब्यूनल व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। वहीं विपक्ष इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सरकार से जवाब मांगता रहा है और संसद में इसी मुद्दे समेत अन्य विषयों पर चर्चा की मांग के दौरान हंगामा करता रहा।
ट्रिब्यूनल आखिर होते क्या हैं?
ट्रिब्यूनल को आसान भाषा में ऐसी अर्ध-न्यायिक संस्था के रूप में समझा जा सकता है, जो किसी खास क्षेत्र से जुड़े विवादों और मामलों का निपटारा करती है। इनका उद्देश्य सामान्य अदालतों पर मामलों का बोझ कम करना और विशेषज्ञता वाले विवादों का अपेक्षाकृत तेज समाधान उपलब्ध कराना है।
अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं। उदाहरण के लिए कर विवादों, कंपनी कानून, पर्यावरण, प्रशासनिक मामलों, सशस्त्र बलों और दूरसंचार से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष संस्थाएं मौजूद हैं।
इन संस्थाओं में न्यायिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के साथ-साथ संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए इनकी नियुक्ति प्रक्रिया और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।
सरकार का कहना है कि नया कानून इसी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए तैयार किया गया है। इसमें ट्रिब्यूनलों की मूल शक्तियों को छेड़ने के बजाय उनकी नियुक्ति और प्रशासन से जुड़े ढांचे को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या है कनेक्शन?
ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल 2026 को समझने के लिए 2021 के कानून और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को समझना जरूरी है।
केंद्र सरकार ने 2021 में ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट लागू किया था। इस कानून में ट्रिब्यूनलों के गठन, नियुक्तियों, कार्यकाल और दूसरी प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जुड़े कई प्रावधान किए गए थे। हालांकि इन प्रावधानों को लेकर न्यायपालिका में गंभीर आपत्तियां उठीं।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने 2021 के कानून के कई प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए उन्हें असंवैधानिक करार दिया। अदालत का जोर इस बात पर था कि ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए।
विशेष रूप से नियुक्ति व्यवस्था में सरकार की भूमिका और ट्रिब्यूनल सदस्यों के कार्यकाल से जुड़े प्रावधान विवाद के केंद्र में रहे। न्यायपालिका ने ट्रिब्यूनलों को स्वतंत्र और प्रभावी बनाए रखने के लिए जरूरी मानकों पर जोर दिया।
अब सरकार ने नए विधेयक में पुराने कानून को हटाने का प्रस्ताव रखा है। साथ ही दावा किया गया है कि नए प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और टिप्पणियों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।
चेयरपर्सन और सदस्यों के कार्यकाल में क्या बदलाव?
नए विधेयक में ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों के कार्यकाल को लेकर भी प्रावधान किए गए हैं।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत किसी ट्रिब्यूनल के चेयरपर्सन का कार्यकाल अधिकतम पांच साल या 70 वर्ष की उम्र तक, जो भी पहले हो, रखा जाएगा। वहीं अन्य सदस्यों के लिए अधिकतम कार्यकाल पांच वर्ष या 67 वर्ष की उम्र तक निर्धारित करने का प्रस्ताव है।
सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से ट्रिब्यूनलों में निरंतरता बनी रहेगी और नियुक्त पदाधिकारियों को अपने दायित्वों को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
2021 के कानून में कार्यकाल को चार वर्ष तक सीमित किए जाने को लेकर भी सवाल उठे थे। आलोचकों का कहना था कि इतना छोटा कार्यकाल ट्रिब्यूनल के सदस्यों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली और संस्थागत स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
नए बिल में सरकार ने इसी व्यवस्था को बदलते हुए पांच साल की अधिकतम अवधि का प्रस्ताव रखा है।
50 साल की उम्र वाली शर्त भी बनी थी विवाद का कारण
2021 के ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट में नियुक्तियों के लिए न्यूनतम उम्र से जुड़ा प्रावधान भी विवादित रहा था। उस व्यवस्था में ट्रिब्यूनल में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष रखी गई थी।
इस प्रावधान को लेकर यह तर्क दिया गया कि इससे कम उम्र के कई अनुभवी वकीलों, विशेषज्ञों और योग्य पेशेवरों के लिए ट्रिब्यूनल में नियुक्ति का अवसर सीमित हो सकता है।
ट्रिब्यूनलों में विशेषज्ञता और अनुभव दोनों की जरूरत को देखते हुए इस उम्र सीमा को लेकर सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी 2021 के कानून के प्रावधानों की समीक्षा के दौरान ऐसे मुद्दों पर गंभीर विचार किया गया।
नए विधेयक को पुराने विवादों से अलग व्यवस्था तैयार करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून न्यायपालिका की ओर से दिए गए निर्देशों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
पहले से चल रही नियुक्तियों पर क्या असर पड़ेगा?
नए कानून को लेकर एक अहम सवाल यह भी है कि जिन ट्रिब्यूनलों में 2021 के कानून के तहत नियुक्तियां हो चुकी हैं या प्रक्रिया चल रही है, उनका क्या होगा।
विधेयक में यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई है कि नए कानून के कारण पहले से चल रही नियुक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। यानी पुराने कानून के तहत शुरू हुई नियुक्ति प्रक्रिया को सिर्फ नए कानून के आने की वजह से खत्म नहीं किया जाएगा।
सरकार का उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था में अचानक व्यवधान पैदा करने के बजाय एक नई संस्थागत व्यवस्था तैयार करना है। इससे ट्रिब्यूनलों के कामकाज में निरंतरता बनाए रखने की कोशिश की गई है।
राष्ट्रीय आयोग बनाने में कितना खर्च आएगा?
प्रस्तावित राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल आयोग के गठन पर सरकार को शुरुआती तौर पर करीब 24.79 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा अन्य खर्च के लिए लगभग 2.35 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।
विधेयक में आने वाले वर्षों के खर्च का भी अनुमान दिया गया है। दूसरे और तीसरे वर्ष में इस खर्च में करीब 10 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होने की संभावना जताई गई है।
सरकार का मानना है कि एक केंद्रीकृत आयोग के जरिए नियुक्तियों और निगरानी से जुड़ी प्रक्रियाओं को व्यवस्थित किया जा सकेगा। इससे अलग-अलग ट्रिब्यूनलों की प्रशासनिक जरूरतों को एक व्यापक ढांचे के तहत संभालने में मदद मिलने की उम्मीद है।
लोकसभा में क्यों नहीं हो सकी चर्चा?
ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल ऐसे समय लोकसभा में आया जब सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ था। सोमवार को सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर विरोध और नारेबाजी शुरू कर दी।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सरकार की ओर से कहा कि सरकार छात्र आंदोलनों और उनसे जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए तैयार है। उन्होंने विपक्ष से सदन की कार्यवाही चलने देने की अपील भी की।
हालांकि विरोध जारी रहा और सदन में सामान्य तरीके से चर्चा का माहौल नहीं बन सका। इसी हंगामे के बीच ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल को लोकसभा की मंजूरी मिल गई।
विपक्ष की ओर से अन्य मुद्दों के साथ एफसीआरए से जुड़े विषयों पर भी विरोध दर्ज कराया गया। सरकार ने विपक्ष पर लगातार संसद की कार्यवाही बाधित करने का आरोप लगाया।
अब आगे क्या होगा?
लोकसभा से मंजूरी मिलने के बाद ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स बिल 2026 की संसदीय प्रक्रिया का अगला चरण महत्वपूर्ण होगा। सरकार की कोशिश है कि पुराने कानून को हटाकर ट्रिब्यूनलों की नियुक्ति और निगरानी के लिए नई संस्थागत व्यवस्था लागू की जाए।
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले से जुड़ा है। सरकार यह दावा कर रही है कि नए कानून में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए हैं जो अदालत के निर्देशों के अनुरूप हैं।
वहीं, ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और सरकार की भूमिका जैसे मुद्दे आगे भी चर्चा का विषय रह सकते हैं। फिलहाल लोकसभा में बिल पारित होने के बाद सदन की कार्यवाही मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई।




