डॉ. एचएस धालीवाल बने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के नए कुलपति, कृषि शिक्षा और शोध का लंबा अनुभव

डॉ. एचएस धालीवाल बने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के नए कुलपति, कृषि शिक्षा और शोध का लंबा अनुभव

करीब 31 वर्षों से कृषि क्षेत्र में सक्रिय डॉ. धालीवाल ने बागवानी, फल विज्ञान और आधुनिक कृषि तकनीकों के विकास में दिया योगदान; शोध परियोजनाओं और नई किस्मों पर भी किया काम

लुधियाना। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना को नया वाइस चांसलर मिल गया है। बुधवार को चंडीगढ़ में हुई बैठक के बाद कृषि महाविद्यालय के पूर्व डीन डॉ. एचएस धालीवाल को विश्वविद्यालय का नया कुलपति नियुक्त किया गया। कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रखने वाले डॉ. धालीवाल की नियुक्ति को विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और शोध कार्यों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बागवानी एवं फल विज्ञान के विशेषज्ञ के रूप में उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान फसलों की नई किस्मों, उन्नत कृषि तकनीकों और शोध सुविधाओं के विकास में योगदान दिया है।

डॉ. धालीवाल की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब विश्वविद्यालय में नियमित कुलपति का पद रिक्त था। इससे पहले डॉ. सतबीर सिंह गोसल इस पद पर कार्यरत थे। उनका कार्यकाल 18 अगस्त को समाप्त हो गया था। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए रजिस्ट्रार को कार्यवाहक वाइस चांसलर की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब डॉ. धालीवाल की नियुक्ति के साथ विश्वविद्यालय को नया नेतृत्व मिल गया है।

कृषि क्षेत्र में लगभग 31 वर्षों का अनुभव रखने वाले डॉ. धालीवाल ने शिक्षण, अनुसंधान और प्रसार शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया है। इन तीनों क्षेत्रों में उन्होंने अकादमिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं। कृषि शिक्षा को बेहतर बनाने, वैज्ञानिक शोध को प्रोत्साहित करने और शोध के निष्कर्षों को किसानों तक पहुंचाने की दिशा में उनका अनुभव विश्वविद्यालय के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

बागवानी और फल विज्ञान में विशेषज्ञता

डॉ. एचएस धालीवाल की विशेषज्ञता बागवानी एवं फल विज्ञान में है। इस क्षेत्र में उन्होंने फलों की खेती, नई किस्मों के विकास और कृषि उत्पादन को बेहतर बनाने से जुड़े कार्यों में योगदान दिया। पंजाब में खेती के बदलते स्वरूप के बीच बागवानी और फल उत्पादन किसानों के लिए आय के वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र का अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ का विश्वविद्यालय के शीर्ष पद पर पहुंचना महत्वपूर्ण है।

पीएयू राज्य में कृषि शिक्षा और अनुसंधान का प्रमुख केंद्र है। विश्वविद्यालय में विकसित तकनीकों और कृषि संबंधी सिफारिशों का सीधा संबंध किसानों की खेती, उत्पादन और आमदनी से होता है। डॉ. धालीवाल ने अपने पेशेवर जीवन में शोध और तकनीकी विकास के साथ-साथ कृषि ज्ञान को व्यावहारिक स्तर तक पहुंचाने पर भी काम किया है।

फसलों की सिफारिशों में दिए 28 सुझाव

शोध और कृषि विकास के क्षेत्र में डॉ. धालीवाल की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की फसल संबंधी सिफारिशों में दिए गए 28 सुझाव शामिल हैं। इनमें केला और आंवला जैसी दो नई फसलों के साथ किन्नू सहित विभिन्न फलों की 11 किस्में भी शामिल हैं। फसलों और फलों की नई किस्मों को कृषि व्यवस्था से जोड़ने का उद्देश्य उत्पादन के विकल्पों को बढ़ाना और किसानों को खेती के विविध अवसरों से परिचित कराना है।

कृषि विश्वविद्यालयों में फसलों से जुड़ी सिफारिशें वैज्ञानिक परीक्षणों और शोध के आधार पर तैयार की जाती हैं। इनका महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि किसानों को नई फसलों, किस्मों और उत्पादन तकनीकों के बारे में जानकारी देने में ऐसी सिफारिशें मदद करती हैं। डॉ. धालीवाल ने इस प्रक्रिया में योगदान देते हुए विश्वविद्यालय के कृषि अनुसंधान को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई।

छह शोध परियोजनाओं का किया नेतृत्व

डॉ. धालीवाल ने छह शोध परियोजनाओं का नेतृत्व किया और कई परियोजनाओं में सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में भी काम किया। शोध परियोजनाओं के संचालन में वैज्ञानिकों के बीच समन्वय, उपलब्ध संसाधनों का उपयोग और निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप काम करना महत्वपूर्ण होता है। इन जिम्मेदारियों के जरिए उन्होंने शोध गतिविधियों के प्रबंधन का अनुभव हासिल किया।

उन्होंने शिक्षकों को प्रतिस्पर्धी शोध परियोजनाएं तैयार कर प्रस्तुत करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। उनके प्रयासों से शिक्षकों ने 16 प्रतिस्पर्धी शोध परियोजनाएं प्रस्तुत कीं, जिनमें से सात को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से मंजूरी मिली। शोध परियोजनाओं को मंजूरी मिलना विश्वविद्यालय के लिए नई अनुसंधान गतिविधियों को आगे बढ़ाने और शिक्षकों को अपने विषयों में नए प्रयोग करने के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

विश्वविद्यालयों में शोध का दायरा बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता होती है। प्रतिस्पर्धी परियोजनाओं के माध्यम से वैज्ञानिकों को अपने शोध प्रस्तावों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने और उनके लिए संसाधन जुटाने का अवसर मिलता है। डॉ. धालीवाल की इस क्षेत्र में सक्रियता उनके शोध संबंधी अनुभव को दर्शाती है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में 189 शोध प्रकाशन

डॉ. धालीवाल के नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में कुल 189 शोध प्रकाशन दर्ज हैं। इनमें से 81 शोध पत्र प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। ये प्रकाशन उनके लंबे अकादमिक और वैज्ञानिक कार्यकाल का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

शोध पत्रों के माध्यम से वैज्ञानिक अपने प्रयोगों, निष्कर्षों और नए विचारों को दूसरे विशेषज्ञों तथा शोधकर्ताओं के साथ साझा करते हैं। कृषि के क्षेत्र में ऐसे शोध खेती की समस्याओं को समझने, उत्पादन संबंधी चुनौतियों का समाधान खोजने और नई तकनीकों के विकास में मददगार होते हैं। डॉ. धालीवाल के शोध प्रकाशन बागवानी एवं फल विज्ञान के क्षेत्र में उनकी अकादमिक सक्रियता को रेखांकित करते हैं।

पत्ती विश्लेषण प्रयोगशाला की स्थापना में योगदान

डॉ. धालीवाल ने पीएयू में अत्याधुनिक पत्ती विश्लेषण प्रयोगशाला स्थापित करने में भी योगदान दिया। पौधों की पत्तियों का विश्लेषण उनकी पोषण संबंधी स्थिति और विकास से जुड़े पहलुओं को समझने में मदद करता है। इस प्रकार की प्रयोगशालाएं वैज्ञानिकों को पौधों की जरूरतों का अध्ययन करने और फसलों के बेहतर प्रबंधन से संबंधित शोध करने के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं।

इसके अलावा, वायरस मुक्त पौध तैयार करने वाली नर्सरी को राष्ट्रीय स्तर की मान्यता दिलाने में भी उन्होंने योगदान दिया। पौधों में वायरस से होने वाले संक्रमण को नियंत्रित करना बागवानी और फल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। स्वस्थ पौध सामग्री की उपलब्धता से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन संबंधी संभावनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

प्रयोगशाला और नर्सरी से जुड़े इन कार्यों से स्पष्ट होता है कि डॉ. धालीवाल का अनुभव केवल कक्षा में शिक्षण या शोध पत्र प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक सुविधाओं के विकास से जुड़े कार्यों में भी भागीदारी निभाई।

नए नेतृत्व से विश्वविद्यालय को उम्मीदें

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की भूमिका राज्य की कृषि व्यवस्था के लिए अहम है। विश्वविद्यालय कृषि शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ फसलों, बागवानी, मिट्टी, पौध संरक्षण और खेती की आधुनिक तकनीकों पर शोध करता है। यहां तैयार होने वाली वैज्ञानिक सिफारिशें किसानों तक पहुंचती हैं और खेती से जुड़ी समस्याओं के समाधान में उपयोगी हो सकती हैं।

नए कुलपति के सामने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध गतिविधियों और किसानों के साथ वैज्ञानिक संस्थान के संपर्क को मजबूत बनाए रखने जैसी जिम्मेदारियां रहेंगी। कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, उत्पादन लागत, संसाधनों के कुशल इस्तेमाल और खेती में विविधता जैसे विषय लगातार महत्व हासिल कर रहे हैं। ऐसे में कृषि अनुसंधान को व्यावहारिक जरूरतों के साथ जोड़ना विश्वविद्यालय के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना रहेगा।

डॉ. धालीवाल के पास शिक्षण, शोध और प्रसार शिक्षा के साथ प्रशासनिक कामकाज का भी अनुभव है। फसलों की सिफारिशों में योगदान, शोध परियोजनाओं का नेतृत्व, शोध प्रकाशन और प्रयोगशाला सुविधाओं के विकास से जुड़े उनके कार्य उनके अकादमिक अनुभव को सामने रखते हैं। अब कुलपति के रूप में उनकी नियुक्ति के बाद विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक कामकाज को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके पास होगी।

करीब तीन दशक के अनुभव के साथ डॉ. धालीवाल की नियुक्ति पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के लिए एक नया चरण है। उनके सामने अपने अनुभव का उपयोग करते हुए कृषि शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों तक तकनीक पहुंचाने की व्यवस्था को और प्रभावी बनाने का अवसर रहेगा।