लुधियाना में धीरेंद्र शास्त्री का संदेश: ‘मेरे नहीं, बालाजी के बनो’, धर्मांतरण पर भी साधा निशाना

लुधियाना में धीरेंद्र शास्त्री का संदेश: ‘मेरे नहीं, बालाजी के बनो’, धर्मांतरण पर भी साधा निशाना

हनुमंत कथा के चौथे दिन उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, बोले- मंदिर के साथ सेवा और अस्पताल की व्यवस्था भी जरूरी

लुधियाना के चंडीगढ़ रोड स्थित वर्धमान मिल्स के सामने ग्लाडा मैदान में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की श्री हनुमान जी की कथा जारी है। कथा के चौथे दिन भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। लोग बालाजी के दरबार में नतमस्तक हुए और अपनी समस्याओं से जुड़ी अर्जियां लगाईं। आयोजन स्थल पर श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और व्यवस्था के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। शास्त्री के कार्यक्रम को लेकर शहर और आसपास के क्षेत्रों से भी लोग पहुंच रहे हैं।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने संबोधन में कहा कि दरबार लगाने का उनका उद्देश्य लोगों को अपने साथ जोड़ना नहीं है। वह चाहते हैं कि लोग उनके बजाय बालाजी से जुड़ें। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार श्रद्धालुओं का विश्वास हनुमान जी की भक्ति में मजबूत होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वह किसी चमत्कार का प्रदर्शन करने के लिए नहीं आए हैं। उनका प्रयास लोगों को हनुमान जी की महिमा समझाने और सनातन परंपरा से जोड़ने का है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि वे किसी व्यक्ति विशेष के अनुयायी बनने के बजाय भगवान के प्रति अपनी आस्था मजबूत करें।

‘दरबार का उद्देश्य मेरे साथ नहीं, बालाजी के साथ जोड़ना’

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा कि उनके दरबार को लेकर कई तरह की चर्चाएं और आलोचनाएं होती हैं। इसके बावजूद वह अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि दरबार लगाने का कारण यही है कि लोगों को बालाजी की भक्ति से जोड़ा जा सके।

उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य यह नहीं है कि लोग उनके नाम से जुड़े रहें। वह चाहते हैं कि लोग हनुमान जी को अपना आधार बनाएं। उनके मुताबिक, जब व्यक्ति भगवान की भक्ति से जुड़ता है तो उसे अपनी समस्याओं के लिए अलग-अलग जगह भटकने की जरूरत नहीं पड़ती।

शास्त्री ने कहा कि वह खुद भी लोगों को अपने पीछे चलने के लिए नहीं कहते। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि उनके चक्कर में पड़ने के बजाय हनुमान जी की महिमा और भक्ति को समझें।

धर्मांतरण को लेकर बोले- भय या दिखावे से मतांतरण उचित नहीं

अपने संबोधन में धीरेंद्र शास्त्री ने पंजाब में धर्मांतरण के मुद्दे को भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के गांवों और गलियों में कुछ लोग कथित तौर पर चमत्कार का दावा कर लोगों को प्रभावित करते हैं और धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करते हैं।

उन्होंने कहा कि वह किसी मजहब के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यदि किसी व्यक्ति का मतांतरण भय, दिखावे या किसी प्रायोजित तरीके से कराया जाता है तो वह इसका विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में व्यक्ति को अपने धर्म और आस्था का अधिकार है, लेकिन दबाव या लालच के माध्यम से धर्म परिवर्तन को उचित नहीं माना जाना चाहिए।

उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि सनातन परंपरा में आस्था रखने वाले लोगों को अपनी धार्मिक परंपराओं और मूल्यों को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोगों को अपनी आस्था के लिए इधर-उधर भटकने के बजाय अपने धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ना चाहिए।

‘हम अभिमान में नहीं, स्वाभिमान में बोल रहे’

धीरेंद्र शास्त्री ने अपने आलोचकों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर टिप्पणियां की जाती हैं और कई बार विरोध भी होता है। उन्होंने कहा कि वह इसे लेकर चिंतित नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि उनकी बातों को कई बार विवाद के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनका कहना है कि वह अपनी मान्यताओं के आधार पर बात करते हैं। उन्होंने भगवद्गीता का संदर्भ देते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए।

शास्त्री ने कहा कि वह अभिमान में नहीं बल्कि स्वाभिमान के साथ अपनी बात रखते हैं। उन्होंने धर्मांतरण को लेकर अपनी आपत्ति दोहराते हुए कहा कि वह इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाते रहेंगे।

हालांकि, उनके संबोधन के दौरान इस्तेमाल किए गए कई तीखे और व्यक्तिगत शब्दों को लेकर भी चर्चा रही। उन्होंने विरोध करने वालों को चुनौती देने वाले अंदाज में कहा कि उनके दरबार में आने वालों को वह उनके बारे में ऐसी बातें बताएंगे, जिनसे वे असहज हो जाएंगे।

‘मेरी नहीं, बजरंग बली की महिमा समझो’

शास्त्री ने कहा कि वह खुद को किसी चमत्कारी शक्ति के रूप में पेश नहीं करना चाहते। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि उनके पास आने के बजाय हनुमान जी की भक्ति को जीवन का आधार बनाएं।

उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि किसी बाबा के पास जाने से उनकी समस्याएं अपने आप समाप्त नहीं होंगी। वास्तविक आस्था भगवान के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह लोगों को अपने साथ जोड़ने के लिए दरबार नहीं लगा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि अगर भगवान की कृपा किसी साधारण व्यक्ति पर हो सकती है तो समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भी अपनी आस्था और मेहनत के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने अपने विदेश दौरों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह बिना अंग्रेजी जाने भी कई देशों में गए और वहां लोगों से मिले। उनके अनुसार यह सब भगवान की कृपा से संभव हुआ।

‘मंदिर नहीं, मंदिर में अस्पताल होना चाहिए’

धीरेंद्र शास्त्री ने धार्मिक संस्थानों के साथ सामाजिक सेवा को जोड़ने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज में मंदिरों के निर्माण के साथ-साथ सेवा की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उन्होंने संकल्प लिया है कि मंदिर बनाने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम होना चाहिए, जहां जरूरतमंदों को स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध हो सकें। उन्होंने अपने विचार को इस रूप में रखा कि अस्पताल में मंदिर होने के बजाय मंदिर में अस्पताल की व्यवस्था हो, जहां लोगों को दवा के साथ आध्यात्मिक सहारा भी मिल सके।

उनके अनुसार धार्मिक आस्था तभी समाज के लिए उपयोगी बनती है जब उससे जरूरतमंद लोगों की मदद का रास्ता भी निकलता हो। उन्होंने श्रद्धालुओं से सेवा कार्यों को धार्मिक जीवन का हिस्सा बनाने की अपील की।

गुरुद्वारों की लंगर और सेवा व्यवस्था का दिया उदाहरण

अपने संबोधन के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने सिख समुदाय की सेवा परंपरा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सनातन समाज को सिखों से सीखना चाहिए कि किस तरह लंगर के माध्यम से लोगों की सेवा की जाती है और बड़ी संख्या में आने वाले लोगों के लिए बैठने तथा भोजन की व्यवस्था की जाती है।

उन्होंने कहा कि जहां गुरुद्वारा होता है, वहां सेवा की भावना दिखाई देती है। इसी तरह मंदिरों को भी केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि सेवा का केंद्र बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सनातन समाज से आग्रह किया कि मंदिरों के माध्यम से जरूरतमंदों की सहायता की जाए और समाज में सेवा की भावना को मजबूत किया जाए।

‘हनुमान जी ने जिस काम के लिए भेजा, उसे करके जाऊंगा’

धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि उनके सामने कितनी भी चुनौतियां आएं, वह अपनी बात रखना जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, विरोध और आलोचना से वह अपना रास्ता नहीं बदलेंगे।

उन्होंने कहा कि उनके अनुसार हनुमान जी ने उन्हें जिस उद्देश्य के लिए भेजा है, वह काम पूरा करके ही जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति स्पष्ट और सीधे शब्दों में अपनी बात रखता है, उसके साथ विवाद होना स्वाभाविक है।

उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि वह अपनी बात को घुमा-फिराकर कहने के बजाय सीधे शब्दों में रखने में विश्वास करते हैं। इसी वजह से उनके बयानों पर विवाद भी होता है, लेकिन वह इससे पीछे हटने वाले नहीं हैं।

आज प्रेस वार्ता की भी संभावना

लुधियाना में चल रही हनुमंत कथा के चौथे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। कार्यक्रम के दौरान लोग बालाजी के दरबार में अपनी समस्याओं को लेकर अर्जियां भी लगा रहे हैं। कथा के दौरान भक्ति, धार्मिक आस्था और सेवा से जुड़े संदेशों पर जोर दिया जा रहा है।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री आज प्रेस वार्ता भी कर सकते हैं। ऐसे में पंजाब में धर्मांतरण, धार्मिक आस्था, सामाजिक सेवा और उनके लुधियाना दौरे से जुड़े मुद्दों पर वह आगे अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। कथा के आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी श्रद्धालुओं में उत्साह बना हुआ है।

शास्त्री ने अपने संबोधन के अंत में एक बार फिर कहा कि उनका उद्देश्य लोगों को अपने साथ जोड़ना नहीं बल्कि हनुमान जी की भक्ति से जोड़ना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धार्मिक आस्था के साथ सेवा को भी जीवन का हिस्सा बनाया जाए और मंदिरों को जरूरतमंदों की मदद का माध्यम बनाया जाए।