लुधियाना। शहर की लंबे समय से चली आ रही कचरा प्रबंधन की समस्या को दूर करने के लिए प्रस्तावित 1408 करोड़ रुपये के बड़े इंटीग्रेटेड सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट के रद्द होने के बाद पंजाब सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था तैयार कर दी है। अब लुधियाना में घर-घर से कचरा उठाने, उसे ट्रांसपोर्ट करने, लिफ्टिंग और प्रोसेसिंग का काम अलग से नई टेंडर प्रक्रिया शुरू करने के बजाय राज्य स्तर पर तय किए गए रेट कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर करवाने की तैयारी है।
लोकल गवर्नमेंट विभाग ने इसके लिए स्टेट लेवल रेट कॉन्ट्रेक्ट फ्रेमवर्क को मंजूरी देते हुए नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस व्यवस्था के तहत नगर निगम उन कंपनियों में से किसी एक का चयन कर सकेगा, जिन्हें सरकार ने पहले से निर्धारित प्रक्रिया के बाद सूचीबद्ध किया है। हालांकि कंपनी का चयन केवल सूची में शामिल होने के आधार पर नहीं होगा। संबंधित नगर निगम को एजेंसी की तकनीकी क्षमता, कर्मचारियों की उपलब्धता, वाहनों, मशीनरी और कचरा प्रोसेसिंग की व्यवस्था की जांच करनी होगी।
नई व्यवस्था को अंतिम रूप देने के लिए अब प्रस्ताव नगर निगम हाउस की बैठक में रखा जाएगा। हाउस की मंजूरी मिलने के बाद शहर में इसे लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। माना जा रहा है कि 15 अगस्त के बाद होने वाली आगामी निगम बैठक में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण निर्णय लिया जा सकता है।
सरकार की ओर से तैयार किया गया यह मॉडल नया नहीं है। मोहाली नगर निगम में स्टेट लेवल रेट कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का काम शुरू किया जा चुका है। इसी मॉडल को अब पंजाब के अन्य नगर निगमों और नगर परिषदों में लागू करने की दिशा में कदम उठाया गया है। इसका मकसद अलग-अलग शहरों में लंबे समय तक चलने वाली टेंडर प्रक्रिया और रेट को लेकर होने वाली जटिलताओं को कम करना है।
लुधियाना में इससे पहले डोर-टू-डोर कचरा संग्रह, कचरे की लिफ्टिंग, ट्रांसपोर्टेशन और प्रोसेसिंग के लिए एक व्यापक इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत करीब 1144 करोड़ रुपये रखी गई थी। उस समय कचरा प्रबंधन के लिए प्रति टन प्रतिदिन 3429 रुपये की दर प्रस्तावित थी। बाद में विभिन्न बदलावों के चलते परियोजना की अनुमानित लागत बढ़कर 1408 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
परियोजना की लागत बढ़ने के साथ कचरा प्रबंधन की प्रति टन प्रतिदिन दर भी बढ़कर करीब 4221 रुपये तक पहुंच गई थी। इतनी बड़ी लागत वाले प्रोजेक्ट को लेकर लगातार चर्चा होती रही और अंततः इसे आगे बढ़ाने के बजाय अब सरकार ने रेट कॉन्ट्रेक्ट मॉडल का रास्ता चुना है।
नए मॉडल में सरकार द्वारा निर्धारित अधिकतम दरों के आधार पर नगर निगम किसी योग्य कंपनी को काम सौंप सकेगा। उपलब्ध जानकारी के अनुसार सूचीबद्ध एजेंसियों में एक कंपनी ने प्रति टन प्रतिदिन करीब 3677 रुपये की दर दी है। ऐसे में यदि निगम आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद इस एजेंसी का चयन करता है तो पहले प्रस्तावित 4221 रुपये की तुलना में कम दर पर काम कराया जा सकता है।
हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि नोटिफिकेशन में निर्धारित दरों को अंतिम और अनिवार्य दर नहीं माना जाएगा। स्थानीय निकाय अपनी जरूरत, कचरे की मात्रा, उपलब्ध संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए सूचीबद्ध कंपनियों के साथ इससे कम दर पर भी बातचीत कर सकते हैं। इससे नगर निगमों को खर्च नियंत्रित करने की अतिरिक्त गुंजाइश मिलेगी।
राज्य स्तर पर तय रेट कॉन्ट्रेक्ट की अवधि फिलहाल एक वर्ष रखी गई है। नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से एक साल तक निर्धारित दरें प्रभावी रहेंगी। यदि विशेष परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं और सक्षम प्रशासनिक स्तर से मंजूरी मिलती है तो अनुबंध को एक और वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए यह शर्त रखी गई है कि विस्तारित अवधि में लागू दरें बाजार में उपलब्ध दरों से अधिक नहीं होनी चाहिए।
इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी कंपनी का सरकार की रेट कॉन्ट्रेक्ट सूची में शामिल होना उसे स्वतः काम पाने का अधिकार नहीं देगा। नगर निगम को एजेंसी की वास्तविक क्षमता की जांच करने के बाद ही काम सौंपने का निर्णय लेना होगा।
कंपनी के पास पर्याप्त मैनपावर है या नहीं, उसके पास कचरा उठाने के लिए कितने वाहन उपलब्ध हैं, मशीनरी की स्थिति क्या है और कचरे की प्रोसेसिंग के लिए उसके पास पर्याप्त सुविधा है या नहीं, इन सभी पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि केवल कम रेट देने वाली एजेंसी को ही काम न मिल जाए, बल्कि वह शहर की जरूरत के मुताबिक काम करने में सक्षम भी हो।
सरकार के दिशा-निर्देशों में यह व्यवस्था भी रखी गई है कि यदि सबसे कम दर यानी एल-1 पर आने वाली एजेंसी काम करने में असमर्थता जताती है या निर्धारित शर्तों के तहत काम लेने से इनकार करती है तो अगले योग्य बोलीदाता यानी एल-2 या एल-3 को नियमों के अनुसार अवसर दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य काम आवंटित करने में पारदर्शिता बनाए रखना है।
राज्य सरकार ने पंजाब ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रिक्योरमेंट एक्ट, 2019 के तहत निर्धारित नियमों के आधार पर स्टेट लेवल रेट तय किए हैं। लोकल गवर्नमेंट विभाग के सचिव घनश्याम थोरी की ओर से जारी नोटिफिकेशन में छह कंपनियों को सूचीबद्ध किए जाने और उनके लिए निर्धारित दरों का उल्लेख किया गया है।
रेट तय करते समय कंपनियों की क्षमता को भी ध्यान में रखा गया है। नगर निगमों को अपनी स्थानीय जरूरत के हिसाब से सूचीबद्ध एजेंसियों में से उपयुक्त कंपनी का चयन करना होगा। सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से अलग-अलग नगर निगमों को हर बार लंबी प्रक्रिया के जरिए नए सिरे से एजेंसी खोजने की जरूरत कम होगी।
लुधियाना के लिए यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि शहर में कचरा प्रबंधन लंबे समय से एक प्रमुख नागरिक मुद्दा बना हुआ है। शहर में रोजाना निकलने वाले कचरे का नियमित संग्रह, समय पर उठान, ट्रांसपोर्टेशन और वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग सुनिश्चित करना नगर निगम के लिए बड़ी चुनौती रही है।
डोर-टू-डोर कलेक्शन की व्यवस्था प्रभावी नहीं होने या कचरे की लिफ्टिंग में देरी होने पर कई इलाकों में सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा जमा होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसके अलावा कचरे की प्रोसेसिंग और निस्तारण को लेकर भी नगर निगम को लगातार दबाव का सामना करना पड़ता है।
नई व्यवस्था लागू होने की स्थिति में निगम को उम्मीद है कि कचरे के संग्रह से लेकर अंतिम प्रोसेसिंग तक की पूरी श्रृंखला को अधिक व्यवस्थित किया जा सकेगा। सरकार की ओर से निर्धारित रेट के कारण नगर निगम को खर्च का अनुमान लगाने में भी सुविधा होगी।
हालांकि इस मॉडल की सफलता काफी हद तक एजेंसी के चयन और उसकी निगरानी पर निर्भर करेगी। यदि पर्याप्त संख्या में वाहन, कर्मचारी और मशीनरी उपलब्ध नहीं होती तो कम रेट पर भी काम मिलने के बावजूद सफाई व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं आ पाएगा। इसी कारण सरकार ने निगमों को एजेंसियों की क्षमता की निष्पक्ष जांच करने के निर्देश दिए हैं।
नगर निगम हाउस की आगामी बैठक इस पूरी प्रक्रिया के लिए अहम मानी जा रही है। हाउस में प्रस्ताव आने के बाद पार्षदों के सामने स्टेट लेवल रेट कॉन्ट्रेक्ट, संभावित कंपनियों, लागत और शहर की जरूरतों से संबंधित जानकारी रखी जा सकती है। इसके बाद निगम तय करेगा कि उपलब्ध विकल्पों में से किस एजेंसी को काम सौंपना उचित रहेगा।
इससे पहले 1408 करोड़ रुपये के इंटीग्रेटेड प्रोजेक्ट को लेकर भी नगर निगम स्तर पर लंबी प्रक्रिया चली थी। परियोजना का उद्देश्य घर-घर कचरा उठाने से लेकर उसके परिवहन और प्रोसेसिंग तक पूरी व्यवस्था को एक ही ढांचे में लाना था। लेकिन बढ़ती अनुमानित लागत और अन्य कारणों के चलते अब सरकार ने राज्य स्तर पर तय रेट के आधार पर वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की है।
नए मॉडल से नगर निगम को एक और फायदा यह हो सकता है कि बाजार की परिस्थितियों के अनुसार रेट पर बातचीत की गुंजाइश बनी रहेगी। सरकार द्वारा तय अधिकतम दर से कम कीमत पर एजेंसी के साथ समझौता किया जा सकता है। इससे शहर की सफाई व्यवस्था को बनाए रखते हुए निगम पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को कम करने का प्रयास किया जा सकेगा।
सरकार की ओर से जारी निर्देशों में पारदर्शिता पर भी विशेष जोर दिया गया है। किसी भी कंपनी को केवल सिफारिश या मनमाने निर्णय के आधार पर काम देने के बजाय निर्धारित नियमों के अनुसार उसकी योग्यता और क्षमता का परीक्षण करना होगा। इस प्रक्रिया में निगम को अपने स्तर पर दस्तावेजों और संसाधनों की जांच करनी होगी।
लुधियाना के नागरिकों की नजर अब इस बात पर है कि नगर निगम हाउस इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेता है और चयन प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होती है। शहर के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि नई व्यवस्था के तहत डोर-टू-डोर कचरा संग्रह नियमित होता है या नहीं और कचरे की लिफ्टिंग तथा प्रोसेसिंग में कितना सुधार आता है।
यदि हाउस से प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो निगम सूचीबद्ध कंपनियों में से उपयुक्त एजेंसी का चयन कर सकता है। इसके बाद शहर में नई व्यवस्था के तहत कचरा प्रबंधन शुरू करने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। सरकार का दावा है कि स्टेट लेवल रेट कॉन्ट्रेक्ट मॉडल के जरिए नगर निगमों को एक तैयार विकल्प मिल गया है, जिससे लंबे समय तक चलने वाली अलग-अलग प्रक्रियाओं को कम किया जा सकता है।
फिलहाल 1408 करोड़ रुपये की प्रस्तावित इंटीग्रेटेड योजना के स्थान पर राज्य सरकार का नया रेट कॉन्ट्रेक्ट मॉडल लुधियाना की सफाई व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बदलाव है। एक ओर जहां पहले प्रस्तावित परियोजना में करीब 4221 रुपये प्रति टन प्रतिदिन की दर सामने आई थी, वहीं नई व्यवस्था में सूचीबद्ध कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धी दरों पर काम कराने की संभावना है। अब अंतिम फैसला नगर निगम हाउस की मंजूरी और उसके बाद होने वाली चयन प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
शहरवासियों को उम्मीद है कि नई व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित न रहकर जमीन पर भी दिखाई देगी और घर-घर से कचरा उठाने, सड़कों की सफाई, कचरे की समय पर लिफ्टिंग तथा वैज्ञानिक प्रोसेसिंग की व्यवस्था में वास्तविक सुधार आएगा। आने वाले दिनों में नगर निगम की बैठक और उसके बाद एजेंसी चयन की प्रक्रिया यह तय करेगी कि लुधियाना को कचरा प्रबंधन के लिए नया और प्रभावी मॉडल कितनी जल्दी मिलता है।




