श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर देशभर में अलग-अलग तरह के धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन्हीं में दही-हांडी का उत्सव खास आकर्षण का केंद्र रहता है। इस साल जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026 को मनाई जा रही है और इसके अगले दिन कई शहरों में दही-हांडी के आयोजन होंगे। खासतौर पर महाराष्ट्र में इस पर्व का उत्साह देखने लायक होता है। मुंबई, ठाणे, पुणे और आसपास के इलाकों में बड़ी-बड़ी हांड़ियां ऊंचाई पर लटकाई जाती हैं और उन्हें फोड़ने के लिए गोविंदा पथक मानव पिरामिड बनाते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर दही-हांडी की यह परंपरा शुरू कहां से हुई? क्या इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक वर्ष है? और महाराष्ट्र में यह सामान्य धार्मिक आयोजन से निकलकर इतना बड़ा सार्वजनिक उत्सव कैसे बन गया?
कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी है परंपरा
दही-हांडी की कहानी सीधे भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बाल कृष्ण को दही, दूध और मक्खन बेहद पसंद था। गोकुल में वे अपने सखाओं के साथ मिलकर गोपियों के घरों में पहुंचते और मौका मिलते ही मटकी में रखा मक्खन निकाल लेते थे।
कृष्ण की इन शरारतों से परेशान होकर गोपियों ने मक्खन और दही की मटकियां ऐसी जगह टांगनी शुरू कर दीं, जहां छोटे कृष्ण आसानी से पहुंच न सकें। लेकिन कृष्ण ने इसका भी रास्ता निकाल लिया। वे अपने दोस्तों को साथ लेकर आते और सभी बच्चे एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर ऊंचाई तक पहुंचते। इस तरह वे मानव पिरामिड बनाते और सबसे ऊपर मौजूद बच्चा मटकी को फोड़ देता।
आज दही-हांडी के आयोजन में इसी घटना का प्रतीकात्मक रूप दिखाई देता है। ऊंचाई पर लटकाई गई मटकी उस समय की माखन की मटकी को दर्शाती है, जबकि गोविंदा पथक कृष्ण और उनके सखाओं की सामूहिक कोशिश का प्रतीक माने जाते हैं।
मटकी के अंदर क्या रखा जाता है?
दही-हांडी में आम तौर पर मिट्टी या दूसरे बर्तन की मटकी को रस्सी के सहारे ऊंचाई पर बांधा जाता है। इसमें दही, मक्खन, मिश्री और प्रसाद जैसी चीजें रखी जाती हैं। कई जगह मटकी को फूलों और रंग-बिरंगी सजावट से भी सजाया जाता है।
जब गोविंदा पथक पिरामिड बनाकर ऊपर पहुंचता है और मटकी फोड़ देता है, तो उसके अंदर मौजूद दही और प्रसाद नीचे गिरता है। इसके बाद प्रसाद लोगों में बांटा जाता है। ढोल-ताशों की आवाज, भगवान श्रीकृष्ण के जयकारे और संगीत पूरे माहौल को उत्सव में बदल देते हैं।
हालांकि आज यह आयोजन काफी प्रतियोगी और भव्य हो चुका है, लेकिन इसकी मूल भावना कृष्ण की बाल लीला को याद करना ही मानी जाती है।
दही-हांडी का असली संदेश क्या है?
इस उत्सव को सिर्फ मनोरंजन या प्रतियोगिता के तौर पर देखना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देता है। दही-हांडी में सामूहिक प्रयास का विशेष महत्व है। पिरामिड बनाने वाले सभी सदस्यों को एक-दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है। नीचे मौजूद सदस्य पूरे ढांचे को सहारा देता है, जबकि बीच के प्रतिभागी संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। सबसे ऊपर मौजूद सदस्य का काम मटकी तक पहुंचकर उसे फोड़ना होता है।
यानी सफलता केवल ऊपर पहुंचने वाले व्यक्ति की नहीं होती। पूरी टोली की मेहनत मिलकर लक्ष्य हासिल करती है। इसी वजह से दही-हांडी को सहयोग, अनुशासन, नेतृत्व, धैर्य और टीम भावना का प्रतीक भी माना जाता है।
ऊंचाई पर लटकी मटकी को जीवन के कठिन लक्ष्य से जोड़कर भी देखा जाता है। लक्ष्य जितना ऊंचा होगा, उसे हासिल करने के लिए उतनी ही अधिक तैयारी और सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी।
महाराष्ट्र में कैसे लोकप्रिय हुआ यह उत्सव?
दही-हांडी की धार्मिक और लोक परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है, लेकिन महाराष्ट्र में इसका आधुनिक और बड़े स्तर वाला स्वरूप कब शुरू हुआ, इसका कोई एक प्रमाणित वर्ष उपलब्ध नहीं है। इतिहास से जुड़े स्रोतों और परंपराओं में इसके विकास को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
माना जाता है कि शुरुआती दौर में कृष्ण जन्माष्टमी से जुड़े ऐसे आयोजन स्थानीय स्तर पर गांवों, मंदिरों और मोहल्लों में होते थे। बच्चे या युवा मिलकर छोटी ऊंचाई पर रखी मटकी को फोड़ते थे। समय के साथ यह गतिविधि सामुदायिक उत्सव का रूप लेने लगी।
महाराष्ट्र में सार्वजनिक धार्मिक आयोजनों की संस्कृति मजबूत होने के साथ दही-हांडी भी लोगों के बीच लोकप्रिय होती गई। 19वीं शताब्दी के अंतिम दौर में सार्वजनिक स्तर पर विभिन्न धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का विस्तार हुआ। इसी वातावरण ने दही-हांडी जैसे स्थानीय उत्सवों को बड़े समुदाय तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि महाराष्ट्र में दही-हांडी की शुरुआत किसी एक व्यक्ति या एक निश्चित तारीख से हुई थी।
मुंबई ने बदल दिया उत्सव का स्वरूप
महाराष्ट्र में दही-हांडी को बड़े जनउत्सव में बदलने में मुंबई और उसके आसपास के शहरी इलाकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। शहर के अलग-अलग मोहल्लों, सामाजिक मंडलों और स्थानीय संस्थाओं ने जन्माष्टमी के मौके पर आयोजन शुरू किए।
धीरे-धीरे युवाओं की अलग-अलग टोलियां बनने लगीं। इन्हें गोविंदा पथक के नाम से पहचान मिली। इन टीमों ने मटकी फोड़ने के लिए नियमित अभ्यास शुरू किया। मुकाबला बढ़ने के साथ मटकी की ऊंचाई और पिरामिड की चुनौती भी बढ़ने लगी।
इसके बाद दही-हांडी में पुरस्कारों का चलन भी बढ़ा। अलग-अलग मंडल विजेता टीमों को नकद राशि और अन्य पुरस्कार देने लगे। इसने युवाओं के बीच प्रतियोगिता की भावना को और मजबूत किया।
मुंबई और ठाणे में देखते ही देखते दही-हांडी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में बदल गई। हजारों लोग गोविंदा पथकों का प्रदर्शन देखने पहुंचने लगे। ढोल-ताशे, बैंड, नृत्य और कृष्ण भक्ति के गीतों ने इसे धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक उत्सव भी बना दिया।
सार्वजनिक उत्सवों के बढ़ने से मिला नया मंच
महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणेश उत्सव जैसी परंपराओं के मजबूत होने के दौर में सामुदायिक आयोजनों की संस्कृति भी तेजी से विकसित हुई। इसी व्यापक सामाजिक माहौल का प्रभाव दही-हांडी जैसे आयोजनों पर भी पड़ा। मोहल्लों और स्थानीय मंडलों ने मिलकर बड़े कार्यक्रम आयोजित करने शुरू किए।
बाद के दशकों में राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक समूहों और निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ी। इससे कार्यक्रमों का आकार लगातार बड़ा होता गया। बड़े मंच, पुरस्कार, प्रायोजक और दर्शकों की संख्या ने दही-हांडी को एक बड़े सार्वजनिक इवेंट का रूप दे दिया।
टेलीविजन चैनलों और समाचार माध्यमों ने मुंबई की दही-हांडी को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया। इसके बाद सोशल मीडिया ने इस उत्सव की पहुंच और बढ़ा दी। अब महाराष्ट्र के अलावा भारत के कई अन्य हिस्सों में भी दही-हांडी के कार्यक्रम देखने को मिलते हैं।
महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी
समय के साथ दही-हांडी में भाग लेने वाले लोगों का दायरा भी बढ़ा है। पहले जहां पुरुष युवाओं की टोलियां ज्यादा दिखाई देती थीं, वहीं अब कई स्थानों पर महिलाओं और लड़कियों की टीमें भी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती हैं।
कई गोविंदा पथक महीनों पहले से अभ्यास करते हैं। टीम के सदस्य पिरामिड बनाते समय संतुलन, तालमेल और गति पर विशेष ध्यान देते हैं। कुछ आयोजनों में अलग-अलग आयु वर्गों के लिए भी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
महाराष्ट्र के बाहर रहने वाले मराठी समुदायों ने भी इस परंपरा को अपने स्थानीय स्तर पर अपनाया है। विदेशों में रहने वाले भारतीय और मराठी समुदायों के बीच भी जन्माष्टमी के दौरान दही-हांडी जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
आधुनिक दौर में सुरक्षा बनी बड़ी प्राथमिकता
दही-हांडी का रोमांच जितना अधिक है, उतना ही इसमें सावधानी की जरूरत भी होती है। कई लोगों के ऊपर चढ़कर मानव पिरामिड बनाना जोखिम भरा हो सकता है। ऊंचाई से गिरने या संतुलन बिगड़ने की स्थिति में चोट लगने का खतरा रहता है।
इसी कारण अब कई आयोजनों में सुरक्षा को पहले से ज्यादा महत्व दिया जाता है। प्रतिभागियों को अभ्यास कराने, प्रशिक्षित सदस्यों की मदद लेने और ऊंचाई को नियंत्रित रखने जैसे उपायों पर जोर दिया जाता है। आयोजन स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की कोशिश भी की जाती है।
यानी आधुनिक दही-हांडी में केवल जीत महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि प्रतिभागियों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी मानी जाती है।
धार्मिक परंपरा से बड़े सांस्कृतिक उत्सव तक
दही-हांडी का सफर धार्मिक कथा से शुरू होकर आज एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन तक पहुंच चुका है। इसकी जड़ें भगवान श्रीकृष्ण की माखन चोरी वाली बाल लीला में दिखाई देती हैं, जबकि महाराष्ट्र में इसका सार्वजनिक रूप धीरे-धीरे विकसित हुआ।
इस परंपरा का कोई एक प्रमाणित शुरुआती वर्ष नहीं माना जाता। स्थानीय धार्मिक आयोजनों से निकलकर यह पहले सामुदायिक कार्यक्रम बना और फिर मुंबई, ठाणे जैसे शहरों में बड़े प्रतियोगी उत्सव का रूप लेता गया।
आज दही-हांडी में भक्ति के साथ मनोरंजन, प्रतियोगिता और सामूहिक भागीदारी भी जुड़ गई है। ऊंचाई पर टंगी मटकी सिर्फ मक्खन या दही से भरा बर्तन नहीं रह गई, बल्कि वह एक ऐसे लक्ष्य का प्रतीक बन चुकी है जिसे मिल-जुलकर हासिल करना होता है।
यही वजह है कि दही-हांडी की सबसे बड़ी सीख भी सामूहिक प्रयास से जुड़ी है। पिरामिड की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुंचने वाला व्यक्ति भले ही मटकी फोड़ता हो, लेकिन उस सफलता के पीछे पूरी टोली का योगदान होता है। इसी एकता, विश्वास और सहयोग की भावना ने दही-हांडी को महाराष्ट्र के सबसे चर्चित और लोकप्रिय उत्सवों में शामिल कर दिया है।




