जालंधर। पंजाब की राजनीति में धार्मिक और सामाजिक संस्थानों का प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है, लेकिन जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लां की भूमिका अपने आप में अलग मानी जाती है। डेरा सीधे तौर पर चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखता है और किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार के पक्ष में सार्वजनिक अपील नहीं करता। इसके बावजूद पंजाब के प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता समय-समय पर यहां पहुंचते रहे हैं। यही वजह है कि डेरा सचखंड बल्लां को दोआबा की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सामाजिक केंद्र के रूप में देखा जाता है।
डेरा बल्लां की राजनीतिक अहमियत को समझने के लिए दोआबा क्षेत्र के सामाजिक और चुनावी समीकरणों पर नजर डालना जरूरी है। जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर यानी शहीद भगत सिंह नगर के क्षेत्रों में गुरु रविदास नामलेवा संगत की बड़ी संख्या है। यही सामाजिक आधार डेरा बल्लां को विशेष महत्व देता है। दोआबा की लगभग दो दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली मानी जाती है।
पंजाब में अनुसूचित जाति आबादी का अनुपात देश के कई राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। राज्य की 117 विधानसभा सीटों में 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाता कई क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए इस बड़े सामाजिक वर्ग से संवाद बनाए रखना चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
डेरा बल्लां इसी सामाजिक परिदृश्य में अपनी अलग पहचान रखता है। डेरा प्रबंधन ने सार्वजनिक रूप से राजनीतिक समर्थन देने की परंपरा नहीं अपनाई है। यहां से किसी पार्टी के पक्ष में मतदान करने का आह्वान नहीं किया जाता और न ही चुनावों के दौरान कोई औपचारिक राजनीतिक संदेश जारी किया जाता है। इसके बावजूद विभिन्न दलों के नेताओं का डेरा पहुंचना इस बात का संकेत माना जाता है कि वे इस धार्मिक-सामाजिक संस्थान के महत्व को समझते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डेरा बल्लां यात्राओं ने भी इसकी राष्ट्रीय स्तर की चर्चा को बढ़ाया है। 1 फरवरी 2026 को श्री गुरु रविदास जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी डेरा सचखंड बल्लां पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने डेरा प्रमुख संत निरंजन दास से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद लिया। प्रधानमंत्री द्वारा संत निरंजन दास के पैर छूने की तस्वीरें और वीडियो भी राजनीतिक तथा सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बने।
प्रधानमंत्री की इस यात्रा को केवल धार्मिक कार्यक्रम के तौर पर नहीं देखा गया, बल्कि पंजाब के सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में भी इसे महत्वपूर्ण माना गया। इसी दौरान संत निरंजन दास को पद्मश्री सम्मान दिए जाने का भी उल्लेख सामने आया। इससे डेरा बल्लां की गतिविधियों और सामाजिक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान मिली।
इसके बाद 17 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर जालंधर पहुंचे। इस अवसर पर उन्होंने श्री गुरु रविदास महाराज के नाम पर ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। कार्यक्रम के दौरान उनकी डेरा बल्लां के गद्दीनशीन संत निरंजन दास से मुलाकात भी हुई। लगातार दो मौकों पर प्रधानमंत्री की डेरा प्रमुख से मुलाकात ने एक बार फिर यह चर्चा तेज कर दी कि पंजाब की राजनीति में डेरा बल्लां की सामाजिक पहुंच कितनी व्यापक है।
हालांकि डेरा की अहमियत केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता भी अलग-अलग समय पर यहां पहुंच चुके हैं। जनवरी 2017 में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी डेरा सचखंड बल्लां पहुंचे थे। उन्होंने संत निरंजन दास से मुलाकात की थी। उस समय भी डेरा की यात्रा को पंजाब के दलित और रविदासिया समाज के साथ राजनीतिक संवाद के संदर्भ में देखा गया था।
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी भी डेरा बल्लां पहुंचे थे। उन्होंने संत निरंजन दास से मुलाकात की और डेरा परिसर में रात भी बिताई। चन्नी की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि वह स्वयं दलित समुदाय से आने वाले पंजाब के पहले मुख्यमंत्री बने थे। उनके डेरा पहुंचने को सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण माना गया।
शिरोमणि अकाली दल के नेता भी डेरा से दूरी बनाए नहीं रहे हैं। 31 दिसंबर 2021 को शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल डेरा बल्लां पहुंचीं। इसके अगले दिन आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी डेरा प्रमुख से मुलाकात की। लगातार दो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं की यात्राओं ने चुनाव से पहले डेरा की राजनीतिक चर्चा को और बढ़ा दिया था।
आम आदमी पार्टी ने सत्ता में आने के बाद भी डेरा के साथ अपने संपर्क को जारी रखा। 25 मार्च 2023 को अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने डेरा परिसर में श्री गुरु रविदास बाणी अध्ययन केंद्र की आधारशिला रखी। इस कार्यक्रम ने यह संकेत दिया कि डेरा और राज्य की राजनीतिक सत्ता के बीच सामाजिक एवं धार्मिक स्तर पर संवाद बना हुआ है।
कांग्रेस के कई अन्य प्रमुख नेता भी समय-समय पर डेरा पहुंचते रहे हैं। इनमें नवजोत सिंह सिद्धू, अरुणा चौधरी और मोहिंदर सिंह केपी जैसे नाम शामिल हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं की इन यात्राओं को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि डेरा बल्लां को किसी एक पार्टी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में पंजाब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद केवल सिंह ढिल्लों का डेरा बल्लां पहुंचना भी चर्चा में रहा। उन्होंने संत निरंजन दास से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया। इस यात्रा को भी भाजपा की ओर से दोआबा के सामाजिक आधार के साथ संवाद मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा गया।
डेरा बल्लां की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि वह खुद को प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से दूर रखता है। डेरा की ओर से किसी उम्मीदवार के पक्ष में खुला समर्थन नहीं दिया जाता। कोई राजनीतिक पार्टी यहां से चुनावी समर्थन मांगने का दावा सार्वजनिक रूप से नहीं करती। इसके बावजूद बड़े नेताओं का यहां पहुंचना बताता है कि डेरा का सामाजिक प्रभाव राजनीतिक दलों के लिए कितना मायने रखता है।
दोआबा क्षेत्र में रविदासिया समाज की मजबूत उपस्थिति डेरा की सामाजिक पहुंच का प्रमुख आधार है। गुरु रविदास की शिक्षाओं से जुड़े श्रद्धालुओं का बड़ा वर्ग डेरा सचखंड बल्लां से धार्मिक और सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ है। डेरा का प्रभाव केवल जालंधर तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि पंजाब के दूसरे हिस्सों और देश-विदेश में रहने वाले रविदासिया समुदाय तक इसकी पहुंच बताई जाती है।
पंजाब की चुनावी राजनीति में दलित मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है। राज्य में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 34 विधानसभा क्षेत्र हैं, लेकिन उनका प्रभाव इन सीटों तक सीमित नहीं है। कई सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाता चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। यही कारण है कि राजनीतिक दल दलित समाज के प्रमुख धार्मिक और सामाजिक केंद्रों के साथ संपर्क को महत्वपूर्ण मानते हैं।
डेरा बल्लां की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका न होने के बावजूद नेताओं की यात्राओं का एक संदेश जरूर जाता है। जब कोई बड़ा नेता डेरा पहुंचता है तो वह केवल संत से आशीर्वाद लेने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके जरिए समाज के एक बड़े वर्ग के साथ संवाद का संदेश भी जाता है। यही वजह है कि चुनावी मौसम में डेरा की गतिविधियों और राजनीतिक नेताओं की यात्राओं पर विशेष नजर रहती है।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि डेरा किसी राजनीतिक दल के पक्ष में मतदाताओं को निर्देशित करता है। डेरा प्रबंधन की ओर से किसी पार्टी के समर्थन की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए डेरा की राजनीतिक अहमियत को उसके प्रत्यक्ष चुनावी हस्तक्षेप के बजाय उसके सामाजिक प्रभाव और धार्मिक प्रतिष्ठा के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।
पंजाब की राजनीति में डेरा संस्कृति कोई नई घटना नहीं है। राज्य में अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक डेरों के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। विभिन्न समुदायों के बीच इन संस्थानों की सामाजिक पहुंच राजनीतिक दलों को उनके साथ संवाद स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है। डेरा सचखंड बल्लां की विशिष्टता यह है कि इसका सामाजिक आधार मुख्य रूप से गुरु रविदास की परंपरा से जुड़े समुदाय के बीच मजबूत है और दोआबा में इसका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।
राजनीतिक दलों के लिए डेरा बल्लां तक पहुंच बनाने का एक और कारण यह है कि पंजाब में दलित समुदाय केवल एक चुनावी समूह नहीं बल्कि राज्य के सामाजिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी पार्टी के लिए सत्ता हासिल करने के लिए विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। ऐसे में रविदासिया समाज से जुड़े प्रमुख धार्मिक केंद्रों के साथ संवाद राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनना स्वाभाविक है।
आने वाले चुनावों को देखते हुए डेरा बल्लां की भूमिका को लेकर चर्चा और बढ़ सकती है। पंजाब में राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में डेरा बल्लां जैसे प्रभावशाली धार्मिक-सामाजिक केंद्रों के साथ नेताओं की मुलाकातें राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाएंगी।
फिलहाल डेरा सचखंड बल्लां की सबसे बड़ी ताकत यही दिखाई देती है कि वह किसी एक राजनीतिक खेमे का हिस्सा बने बिना विभिन्न दलों के नेताओं के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, चरणजीत सिंह चन्नी, हरसिमरत कौर बादल और पंजाब के अन्य वरिष्ठ नेताओं तक की यात्राएं बताती हैं कि राजनीतिक दल डेरा की सामाजिक पहुंच को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए कहा जा सकता है कि डेरा बल्लां पंजाब की चुनावी राजनीति में कोई औपचारिक राजनीतिक शक्ति नहीं है, लेकिन सामाजिक प्रभाव के लिहाज से इसकी अहमियत काफी बड़ी है। दोआबा के मतदाताओं और व्यापक दलित समाज के बीच इसकी स्वीकार्यता के कारण बड़े राजनीतिक नेता यहां पहुंचना जरूरी समझते हैं। डेरा किसी पार्टी के पक्ष में खड़ा हुए बिना भी पंजाब के राजनीतिक विमर्श में अपनी जगह बनाए हुए है और यही इसकी सबसे बड़ी सियासी ताकत मानी जाती है।




