चंडीगढ़: हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के लंबे समय से लंबित अधिकारों और विभिन्न अंतरराज्यीय मामलों को लेकर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने शुक्रवार को पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर हिमाचल प्रदेश से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की। इस बैठक को राज्य के हितों से जुड़े मामलों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के समक्ष चंडीगढ़ में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी, नए हिमाचल सदन के निर्माण, भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से जुड़े वित्तीय एवं ऊर्जा संबंधी बकाया, शानन हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना और अन्य लंबित प्रशासनिक विषयों को प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि इन सभी मामलों का समाधान संवैधानिक व्यवस्था, कानूनी प्रावधानों और सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप होना चाहिए।
राज्य के अधिकारों को लेकर सरकार का स्पष्ट रुख
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि हिमाचल प्रदेश हमेशा से संवैधानिक मूल्यों और संघीय ढांचे का सम्मान करता आया है। राज्य सरकार का उद्देश्य किसी प्रकार का विवाद खड़ा करना नहीं, बल्कि उन मामलों का समाधान सुनिश्चित करना है जो वर्षों से लंबित हैं और जिनका सीधा संबंध प्रदेश के विकास, संसाधनों तथा आर्थिक हितों से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लंबे समय से निर्णय लंबित है। यदि इन विषयों पर समय रहते सकारात्मक पहल होती है तो इससे न केवल हिमाचल प्रदेश को लाभ मिलेगा, बल्कि विभिन्न राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और विश्वास भी मजबूत होगा।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्यों के बीच लंबित विषयों का समाधान संवाद, सहयोग और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। यही सहकारी संघवाद की वास्तविक भावना भी है।
चंडीगढ़ में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का मुद्दा फिर उठा
बैठक में सबसे प्रमुख विषय चंडीगढ़ में हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का रहा। मुख्यमंत्री ने कहा कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के अनुसार हिमाचल प्रदेश भी पुराने पंजाब का उत्तराधिकारी राज्य है। इसलिए हस्तांतरित क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात के आधार पर राज्य को चंडीगढ़ में उसका वैधानिक हिस्सा मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ केवल पंजाब और हरियाणा का प्रशासनिक केंद्र नहीं है, बल्कि इसका विकास अविभाजित पंजाब के साझा संसाधनों से हुआ था। ऐसे में हिमाचल प्रदेश का भी इस शहर पर वैधानिक अधिकार बनता है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि पिछले कई दशकों से इस विषय पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा होती रही है, लेकिन अब तक कोई अंतिम समाधान सामने नहीं आ पाया है। उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया कि इस विषय पर सकारात्मक पहल कर हिमाचल प्रदेश को उसका वैधानिक अधिकार दिलाने की दिशा में आवश्यक प्रयास किए जाएं।
क्यों महत्वपूर्ण है चंडीगढ़ में हिस्सेदारी का सवाल?
राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से चंडीगढ़ का महत्व काफी अधिक है। यह पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी होने के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश भी है। हिमाचल प्रदेश के कई प्रशासनिक, शैक्षणिक और चिकित्सा संबंधी कार्य भी चंडीगढ़ से जुड़े रहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस विषय पर कोई समाधान निकलता है तो इससे भविष्य में विभिन्न प्रशासनिक व्यवस्थाओं और परिसंपत्तियों के उपयोग से जुड़े कई मुद्दों को स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है।
नए हिमाचल सदन के निर्माण की आवश्यकता पर जोर
मुख्यमंत्री सुक्खू ने बैठक में चंडीगढ़ में नए हिमाचल सदन के निर्माण का मुद्दा भी विस्तार से उठाया। उन्होंने बताया कि वर्तमान हिमाचल भवन का निर्माण कई वर्ष पहले हुआ था और अब यह प्रदेश से आने वाले लोगों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने में पर्याप्त नहीं रह गया है।
उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ हिमाचल प्रदेश के हजारों लोगों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं का प्रमुख केंद्र है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग विभिन्न सरकारी कार्यों, न्यायिक मामलों, उच्च शिक्षा संस्थानों तथा प्रमुख अस्पतालों में उपचार के लिए यहां पहुंचते हैं।
मुख्यमंत्री के अनुसार, विशेष रूप से पीजीआई चंडीगढ़ सहित अन्य बड़े चिकित्सा संस्थानों में इलाज के लिए आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नए हिमाचल सदन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ प्रशासन के साथ चर्चा के बाद सेक्टर-52 में लगभग 4.736 एकड़ भूमि इस परियोजना के लिए उपयुक्त मानी गई है। उन्होंने इस प्रस्ताव को शीघ्र स्वीकृति दिलाने का अनुरोध भी किया।
बीबीएमबी से जुड़े वित्तीय और ऊर्जा मामलों पर भी चर्चा
मुख्यमंत्री ने बैठक में भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से जुड़े मामलों को भी प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही हिमाचल प्रदेश के 7.19 प्रतिशत हिस्से को मान्यता दे चुका है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, प्रदेश लंबे समय से ऊर्जा हिस्सेदारी और उससे संबंधित वित्तीय दावों के समाधान की प्रतीक्षा कर रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य को लगभग 13,066 मिलियन यूनिट बिजली तथा उससे जुड़े वित्तीय लाभ प्राप्त होने का मामला कई वर्षों से लंबित है।
उन्होंने इस विषय पर शीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि इससे राज्य की ऊर्जा व्यवस्था और वित्तीय स्थिति को मजबूती मिल सकती है।
बीबीएमबी का हिमाचल के लिए क्या महत्व है?
भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड उत्तर भारत की प्रमुख जल और विद्युत परियोजनाओं का संचालन करता है। इससे जुड़े निर्णयों का प्रभाव पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों पर पड़ता है।
हिमाचल प्रदेश लंबे समय से अपने हिस्से के बिजली लाभ और वित्तीय दावों को लेकर विभिन्न मंचों पर अपनी बात रखता रहा है। राज्य सरकार का मानना है कि लंबित मामलों के समाधान से प्रदेश की विकास योजनाओं को अतिरिक्त संसाधन मिल सकते हैं।
शानन हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना पर सरकार का पक्ष
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने मंडी जिले में स्थित शानन हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना का मुद्दा भी विस्तार से उठाया।
उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती मंडी रियासत कभी भी संयुक्त पंजाब का हिस्सा नहीं रही थी। वर्ष 1948 में इसका भारत संघ में विलय हुआ और बाद में इसे हिमाचल प्रदेश में शामिल किया गया।
मुख्यमंत्री का कहना था कि शानन परियोजना जिस क्षेत्र में स्थित है, वह पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 में वर्णित हस्तांतरित क्षेत्रों का हिस्सा नहीं था। इसलिए उस अधिनियम के आधार पर इस परियोजना पर अधिकार का दावा उचित नहीं माना जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना के संचालन के लिए दी गई 99 वर्ष की लीज़ 2 मार्च 2024 को समाप्त हो चुकी है। राज्य सरकार का मत है कि लीज़ समाप्त होने के बाद उससे जुड़े अधिकारों की भी पुनर्समीक्षा आवश्यक है और इस विषय पर कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप आगे निर्णय लिया जाना चाहिए।
कानूनी और संवैधानिक आधार पर समाधान की मांग
मुख्यमंत्री सुक्खू ने दोहराया कि हिमाचल प्रदेश अपने सभी दावों को कानूनी और संवैधानिक आधार पर रख रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसी टकराव की पक्षधर नहीं है, बल्कि सभी विषयों का समाधान बातचीत और संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से चाहती है।
उन्होंने कहा कि यदि राज्यों के बीच आपसी सहयोग और संवाद बना रहे तो अधिकांश जटिल विषयों का समाधान सहज तरीके से संभव है। इससे संघीय व्यवस्था भी अधिक मजबूत होगी।
विकास और प्रशासनिक जरूरतों पर भी दिया जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल प्रदेश तेजी से विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पर्यटन, जलविद्युत, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में लगातार गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे में राज्य के प्रशासनिक हितों और संसाधनों से जुड़े मामलों का समयबद्ध समाधान आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ से जुड़े बुनियादी ढांचे, आवासीय सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं का विस्तार भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए ताकि प्रदेश के नागरिकों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
राज्यपाल से सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा
मुख्यमंत्री ने बैठक के दौरान राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से आग्रह किया कि वे इन सभी विषयों पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए संबंधित स्तरों पर आवश्यक सहयोग प्रदान करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि संवैधानिक संस्थाओं और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय से लंबे समय से लंबित विषयों का समाधान संभव है।
राज्य सरकार का मानना है कि चंडीगढ़ में हिस्सेदारी, नए हिमाचल सदन, बीबीएमबी से जुड़े दावे और शानन परियोजना जैसे विषय केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं हैं, बल्कि इनका संबंध प्रदेश के दीर्घकालिक विकास, संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग और जनता के हितों से भी जुड़ा हुआ है।
आने वाले समय में इन मुद्दों पर केंद्र, संबंधित राज्यों और संवैधानिक संस्थाओं के स्तर पर होने वाली आगे की कार्रवाई पर सभी की नजर रहेगी। यदि इन विषयों पर सकारात्मक प्रगति होती है तो इसका प्रभाव हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक, आर्थिक और विकास संबंधी हितों पर भी देखने को मिल सकता है।




