कोविड-19 महामारी के बाद बच्चों और युवाओं की डिजिटल आदतों में तेजी से बदलाव आया है। ऑनलाइन पढ़ाई, घर में अधिक समय बिताने और मनोरंजन के लिए मोबाइल व इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता ने स्क्रीन को बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बना दिया। महामारी के बाद भले ही स्कूल और सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू हो गई हों, लेकिन मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट का इस्तेमाल पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका है।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शॉर्ट-फॉर्म वीडियो यानी कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनट तक की रील्स और शॉर्ट वीडियो हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध इस तरह का कंटेंट तेजी से लोकप्रिय हुआ है। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा वीडियो अपने आप शुरू हो जाता है और यूजर बिना किसी विशेष प्रयास के लगातार स्क्रॉल करता रहता है।
बच्चों और किशोरों के लिए यह अनुभव खास तौर पर आकर्षक हो सकता है, क्योंकि इसमें लगातार नया कंटेंट, तेज विजुअल और तुरंत मनोरंजन मिलता है। हालांकि, विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के बीच इस बात पर चर्चा बढ़ रही है कि लंबे समय तक और अनियंत्रित स्क्रीन इस्तेमाल से बच्चों के ध्यान, नींद, शारीरिक गतिविधि और सामाजिक व्यवहार पर किस तरह का असर पड़ सकता है।
यह समझना जरूरी है कि हर बच्चा जो रील्स या शॉर्ट वीडियो देखता है, उसमें कोई समस्या विकसित होगी, ऐसा कहना सही नहीं है। असर कई बातों पर निर्भर कर सकता है, जैसे बच्चे की उम्र, स्क्रीन पर बिताया गया समय, कंटेंट का प्रकार, परिवार का माहौल, नींद, शारीरिक गतिविधि और बच्चे की व्यक्तिगत परिस्थितियां। चिंता मुख्य रूप से तब बढ़ती है जब स्क्रीन का इस्तेमाल पढ़ाई, नींद, खेलकूद, परिवार के साथ बातचीत और अन्य जरूरी गतिविधियों की जगह लेने लगे।
तेजी से बदलते कंटेंट से ध्यान लगाने की आदत प्रभावित हो सकती है
शॉर्ट वीडियो का फॉर्मेट इस तरह तैयार किया जाता है कि दर्शक कम समय में ज्यादा से ज्यादा कंटेंट देख सके। कुछ सेकंड में वीडियो का दृश्य बदल जाता है, नई आवाज आती है या नया विषय सामने आ जाता है। इसके बाद यूजर को तुरंत अगली सामग्री देखने का विकल्प मिल जाता है।
इस तरह का अनुभव बच्चों को लगातार नए उत्तेजक कंटेंट की ओर आकर्षित कर सकता है। जब बच्चा लंबे समय तक इसी तरह के तेज कंटेंट का आदी हो जाता है, तो सामान्य गतिविधियां उसे अपेक्षाकृत धीमी लग सकती हैं।
उदाहरण के लिए, किताब पढ़ना, किसी विषय को समझने के लिए लंबे समय तक बैठना या होमवर्क पूरा करना स्वाभाविक रूप से अधिक धैर्य मांगता है। वहीं, शॉर्ट वीडियो में कुछ ही सेकंड में मनोरंजन या जानकारी मिल जाती है। इस अंतर के कारण कुछ बच्चों को लंबे समय तक एक ही काम पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल महसूस हो सकता है।
हालांकि, किसी बच्चे में ध्यान की समस्या का कारण केवल मोबाइल या रील्स को मान लेना उचित नहीं होगा। नींद की कमी, तनाव, सीखने से जुड़ी कठिनाइयां और अन्य सामाजिक या भावनात्मक कारण भी एकाग्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
बच्चों के विकास में शुरुआती वर्षों का महत्व
बचपन और किशोरावस्था मस्तिष्क के विकास के लिए महत्वपूर्ण समय होते हैं। इस दौरान बच्चे लगातार नई चीजें सीखते हैं और उनके सोचने, समझने, भाषा, भावनात्मक नियंत्रण तथा सामाजिक व्यवहार से जुड़े कौशल विकसित होते हैं।
इन कौशलों के विकास में केवल डिजिटल स्क्रीन ही भूमिका नहीं निभाती। माता-पिता से बातचीत, दोस्तों के साथ खेलना, किताबें पढ़ना, रचनात्मक गतिविधियां, स्कूल का वातावरण और वास्तविक दुनिया के अनुभव भी महत्वपूर्ण होते हैं।
यदि स्क्रीन का इस्तेमाल इतना अधिक हो जाए कि बच्चा इन गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय न निकाल पाए, तो उसके विकास के कुछ पहलुओं पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ अक्सर स्क्रीन टाइम को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय बच्चे की उम्र और जरूरत के अनुसार संतुलित उपयोग पर जोर देते हैं।
किताब पढ़ना और लंबे समय तक ध्यान देना क्यों जरूरी हैं?
किताब पढ़ने जैसी गतिविधि में बच्चे को एक ही विषय पर लगातार ध्यान देना पड़ता है। उसे शब्दों को समझना, घटनाओं को जोड़ना और जानकारी को याद रखना होता है। यह प्रक्रिया तत्काल मनोरंजन देने वाले शॉर्ट वीडियो से अलग होती है।
कहानी पढ़ते समय बच्चा अपनी कल्पना का इस्तेमाल करता है। वह पात्रों और घटनाओं को अपने दिमाग में समझने की कोशिश करता है। इसी तरह किसी विषय की किताब पढ़ने से जानकारी को गहराई से समझने का अवसर मिलता है।
यदि बच्चा हर समय केवल तेज और छोटे कंटेंट का सेवन करता है, तो हो सकता है कि उसे लंबे समय तक पढ़ने की आदत विकसित करने में अधिक मेहनत करनी पड़े। इसलिए माता-पिता बच्चों को रोजाना कुछ समय किताब, कहानी या उम्र के अनुसार पढ़ने की गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
शॉर्ट वीडियो का लगातार इस्तेमाल कब चिंता का विषय बन सकता है?
हर स्क्रीन के इस्तेमाल को समस्या नहीं माना जाना चाहिए। चिंता तब अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है जब डिजिटल आदतें बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें।
कुछ संकेतों पर माता-पिता ध्यान दे सकते हैं। यदि बच्चा मोबाइल न मिलने पर लगातार बहुत चिड़चिड़ा रहता है, पढ़ाई या अन्य गतिविधियों से बचने लगता है, भोजन या सोने के समय भी स्क्रीन की मांग करता है या परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने में रुचि कम दिखाता है, तो उसकी डिजिटल आदतों की समीक्षा करना उपयोगी हो सकता है।
इसी तरह यदि बच्चा देर रात तक वीडियो देखने के कारण पर्याप्त नींद नहीं ले रहा है या सुबह उठने में परेशानी हो रही है, तो स्क्रीन टाइम को लेकर परिवार में स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं।
इन संकेतों का मतलब यह नहीं है कि बच्चे को निश्चित रूप से स्क्रीन एडिक्शन है। यदि व्यवहार में लगातार और गंभीर बदलाव दिखाई दें, तो माता-पिता बाल रोग विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से उचित सलाह ले सकते हैं।
नींद पर भी पड़ सकता है स्क्रीन टाइम का असर
बच्चों के विकास के लिए पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद बेहद जरूरी है। देर रात तक मोबाइल देखने की आदत नींद के समय को कम कर सकती है। कई बच्चे सोने से पहले वीडियो देखते रहते हैं और एक वीडियो के बाद दूसरा वीडियो देखने के कारण उनका सोने का समय लगातार आगे बढ़ता जाता है।
इसके अलावा, स्क्रीन पर लंबे समय तक व्यस्त रहने से बच्चे के सोने की नियमित दिनचर्या भी प्रभावित हो सकती है। अगले दिन नींद पूरी न होने पर बच्चा थका हुआ महसूस कर सकता है और स्कूल या पढ़ाई में ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है।
इसी वजह से बच्चों के लिए सोने से कुछ समय पहले स्क्रीन बंद करने की आदत विकसित करना उपयोगी माना जाता है। मोबाइल और टैबलेट को बेडरूम से बाहर रखना भी रात में अनावश्यक स्क्रीन इस्तेमाल को कम करने का एक व्यावहारिक तरीका हो सकता है।
मोबाइल की जगह बच्चों को क्या गतिविधियाँ दी जा सकती हैं?
स्क्रीन टाइम कम करने के लिए केवल मोबाइल छीन लेना पर्याप्त नहीं होता। बच्चों को उसके बदले ऐसी गतिविधियां भी देनी जरूरी हैं, जिनमें उन्हें आनंद आए और वे व्यस्त रह सकें।
उम्र के अनुसार किताब पढ़ना, ड्राइंग, पेंटिंग, संगीत, डांस, बोर्ड गेम, पहेलियां, क्राफ्ट और अन्य रचनात्मक गतिविधियां अच्छे विकल्प हो सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए माता-पिता के साथ कहानी पढ़ना या सुनाना भी उपयोगी हो सकता है।
बड़े बच्चों और किशोरों को खेलकूद, साइकिलिंग, तैराकी या किसी अन्य पसंदीदा शारीरिक गतिविधि में शामिल किया जा सकता है। इससे उन्हें मोबाइल से दूर रहने के साथ-साथ सक्रिय रहने का अवसर भी मिलता है।
आउटडोर गेम्स का महत्व समझना जरूरी
आज के समय में बच्चों के पास मनोरंजन के डिजिटल विकल्प पहले से कहीं अधिक हैं। इसके कारण कई बच्चे आउटडोर खेलों में पहले की तुलना में कम समय बिताते हैं।
बाहर खेलना बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। खेल के दौरान बच्चे दूसरे बच्चों के साथ बातचीत करना, नियमों का पालन करना, अपनी बारी का इंतजार करना और हार-जीत को स्वीकार करना सीखते हैं।
माता-पिता यदि खुद भी बच्चों के साथ पार्क में समय बिताएं या खेलों में शामिल हों, तो बच्चों को मोबाइल से दूर रखने में मदद मिल सकती है। परिवार की सक्रिय भागीदारी डिजिटल आदतों को बदलने में अधिक प्रभावी हो सकती है।
माता-पिता खुद भी बनें बच्चों के लिए उदाहरण
बच्चों की स्क्रीन आदतों को नियंत्रित करने में माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यदि घर में बड़े लोग हर समय मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों से फोन दूर रखने की अपेक्षा करना मुश्किल हो सकता है।
परिवार में कुछ ऐसे समय तय किए जा सकते हैं जब सभी सदस्य मोबाइल से दूरी बनाए रखें। उदाहरण के लिए, खाने की टेबल पर फोन का इस्तेमाल न करना या परिवार के साथ बातचीत के दौरान स्क्रीन बंद रखना एक अच्छी आदत हो सकती है।
माता-पिता बच्चों को यह समझा सकते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट पूरी तरह खराब नहीं हैं। इनका इस्तेमाल पढ़ाई, जानकारी और मनोरंजन के लिए किया जा सकता है, लेकिन हर गतिविधि के लिए स्क्रीन पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है।
बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम के स्पष्ट नियम बनाएं
स्क्रीन टाइम को लेकर घर में स्पष्ट नियम होने चाहिए। नियम बच्चे की उम्र और दिनचर्या के अनुसार बनाए जा सकते हैं। पढ़ाई, भोजन, शारीरिक गतिविधि और नींद के समय स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित रखने पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।
माता-पिता यह भी तय कर सकते हैं कि बच्चा किस तरह का कंटेंट देखेगा। उम्र के अनुसार उपयुक्त और सुरक्षित सामग्री का चयन करना जरूरी है। छोटे बच्चों को बिना निगरानी के इंटरनेट इस्तेमाल करने देने के बजाय माता-पिता को समय-समय पर उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।
सिर्फ समय की सीमा तय करना ही पर्याप्त नहीं है। कंटेंट की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शैक्षणिक और रचनात्मक सामग्री को मनोरंजन के साथ संतुलित किया जा सकता है।
अचानक मोबाइल पूरी तरह बंद करना हमेशा आसान नहीं होता
कई माता-पिता बच्चों की स्क्रीन आदत को लेकर परेशान होकर अचानक मोबाइल या टैबलेट पूरी तरह बंद कर देते हैं। इससे कुछ बच्चों में विरोध, गुस्सा या चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है।
इसके बजाय स्क्रीन टाइम को धीरे-धीरे कम करना अधिक व्यावहारिक हो सकता है। उदाहरण के लिए, यदि बच्चा रोजाना कई घंटे वीडियो देखता है, तो समय को चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सकता है। साथ ही उस समय के लिए कोई दूसरी गतिविधि उपलब्ध कराना जरूरी है।
बच्चे को यह भी समझाना चाहिए कि स्क्रीन टाइम कम करने का उद्देश्य उसे सजा देना नहीं, बल्कि उसकी दिनचर्या को बेहतर बनाना है।
डिजिटल ब्रेक की आदत हो सकती है फायदेमंद
बच्चों के लिए दिन में कुछ समय पूरी तरह स्क्रीन-मुक्त रखा जा सकता है। इस दौरान परिवार साथ बैठकर बातचीत कर सकता है, बच्चे खेल सकते हैं या कोई रचनात्मक काम कर सकते हैं।
छोटे-छोटे डिजिटल ब्रेक धीरे-धीरे बच्चों को यह समझने में मदद कर सकते हैं कि बिना मोबाइल के भी समय बिताना संभव है। परिवार यदि इन ब्रेक को नियमित दिनचर्या का हिस्सा बना दे, तो बच्चों के लिए इसे स्वीकार करना आसान हो सकता है।
कब विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए?
यदि बच्चा लगातार स्क्रीन का इस्तेमाल करता है और इससे उसकी पढ़ाई, नींद, सामाजिक संबंध या दैनिक गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं, तो माता-पिता को विशेषज्ञ की सलाह लेने पर विचार करना चाहिए।
यदि बच्चे में लंबे समय तक ध्यान की समस्या, व्यवहार में अचानक बदलाव, अत्यधिक चिड़चिड़ापन, सामाजिक गतिविधियों से पूरी तरह दूरी या नींद से जुड़ी गंभीर परेशानी दिखाई देती है, तो केवल स्क्रीन टाइम को इसका कारण मानने के बजाय बाल रोग विशेषज्ञ या संबंधित विशेषज्ञ से उचित मूल्यांकन कराना बेहतर होता है।
बच्चों के डिजिटल व्यवहार को समझने के लिए परिवार का वातावरण, स्कूल का अनुभव, मानसिक स्थिति और शारीरिक स्वास्थ्य जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
बच्चों को डिजिटल दुनिया से दूर नहीं, डिजिटल रूप से जिम्मेदार बनाना जरूरी
आज के समय में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है। शिक्षा, संचार और भविष्य के रोजगार के लिए डिजिटल कौशल महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसलिए लक्ष्य बच्चों को इंटरनेट और मोबाइल से पूरी तरह अलग करना नहीं, बल्कि उनका संतुलित और जिम्मेदार इस्तेमाल सिखाना होना चाहिए।
रील्स और शॉर्ट वीडियो मनोरंजन का एक माध्यम हैं, लेकिन इन्हें बच्चों की पूरी दिनचर्या पर हावी नहीं होने देना चाहिए। पढ़ाई, नींद, खेल, परिवार के साथ समय, सामाजिक संपर्क और रचनात्मक गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त समय जरूरी है।
जब परिवार स्क्रीन के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट सीमाएं तय करता है और बच्चों को मोबाइल के अलावा अन्य गतिविधियों के पर्याप्त विकल्प देता है, तो डिजिटल आदतों को अधिक संतुलित तरीके से विकसित किया जा सकता है।
(Photo: AI Generated)




