भाद्रपद का पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को या 9 को? जानें सही तारीख, पूजा का समय और भौम प्रदोष का महत्व

भाद्रपद का पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को या 9 को? जानें सही तारीख, पूजा का समय और भौम प्रदोष का महत्व

हिंदू धर्म में भगवान शिव की उपासना के लिए प्रदोष व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। प्रत्येक महीने में दो बार प्रदोष व्रत आता है। यह व्रत कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाता है। हालांकि, प्रदोष व्रत की तारीख तय करने में केवल त्रयोदशी तिथि देखना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि प्रदोष काल के समय कौन सी तिथि चल रही है। इसी वजह से इस बार भाद्रपद महीने के पहले प्रदोष व्रत की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बन रही है।

कई लोगों के मन में सवाल है कि आखिर भाद्रपद कृष्ण पक्ष का पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को रखा जाएगा या 9 सितंबर को। पंचांग की गणना के अनुसार इस बार त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर को शुरू होकर अगले दिन 9 सितंबर को समाप्त होगी। चूंकि प्रदोष काल 8 सितंबर को ही पड़ रहा है, इसलिए इसी दिन व्रत रखना उचित माना जाएगा।

इस बार खास बात यह भी है कि प्रदोष व्रत मंगलवार के दिन पड़ रहा है। मंगलवार को आने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष या मंगल प्रदोष कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन भगवान शिव के साथ हनुमान जी की आराधना का भी विशेष महत्व माना गया है।

क्यों 8 सितंबर को ही रखा जाएगा व्रत?

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर को दोपहर 2 बजकर 42 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि अगले दिन यानी 9 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में उदया तिथि के आधार पर देखने पर त्रयोदशी 9 सितंबर को दिखाई देती है, लेकिन प्रदोष व्रत के लिए प्रदोष काल की स्थिति को अधिक महत्व दिया जाता है।

प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का वह विशेष समय होता है, जिसमें भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस बार त्रयोदशी तिथि के दौरान 8 सितंबर की शाम को प्रदोष काल पड़ रहा है। इसलिए व्रत और शिव पूजन 8 सितंबर को किया जाएगा।

यही वजह है कि केवल तिथि के समाप्त होने का समय देखकर 9 सितंबर को व्रत रखना सही नहीं होगा। धार्मिक पंचांग गणना के मुताबिक इस बार पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को ही मनाया जाएगा।

मंगलवार को पड़ रहा है प्रदोष, इसलिए कहलाएगा भौम प्रदोष

प्रदोष व्रत सप्ताह के जिस दिन आता है, उसके आधार पर उसका नाम भी अलग हो जाता है। सोमवार को आने वाला प्रदोष सोम प्रदोष, मंगलवार को पड़ने वाला भौम या मंगल प्रदोष और शनिवार को आने वाला प्रदोष शनि प्रदोष कहलाता है।

इस बार 8 सितंबर को मंगलवार होने के कारण भाद्रपद कृष्ण पक्ष का यह प्रदोष भौम प्रदोष व्रत होगा। धार्मिक मान्यताओं में मंगलवार और भगवान शिव से जुड़े इस संयोग को विशेष फलदायी माना जाता है।

भौम प्रदोष को खासतौर पर मंगल ग्रह से संबंधित परेशानियों और जीवन में आने वाली बाधाओं से राहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करने से भक्त को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

शिव पूजा के लिए कब रहेगा सबसे अच्छा समय?

प्रदोष व्रत में व्रत रखने के साथ भगवान शिव की पूजा के लिए सही समय का ध्यान रखना भी जरूरी माना जाता है। इस बार 8 सितंबर को शिव पूजा के लिए प्रदोष काल का समय शाम 6 बजकर 35 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक बताया गया है।

इस तरह भक्तों को भगवान शिव की पूजा के लिए करीब 2 घंटे 18 मिनट का समय मिलेगा। प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा इसी अवधि में करना शुभ माना जाता है।

इस दौरान भगवान शिव का अभिषेक किया जा सकता है। शिवलिंग पर जल और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करने के बाद बेलपत्र, फूल और धूप-दीप से पूजा की जाती है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान शिव के मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं।

9 सितंबर के मुहूर्त क्यों किए जा रहे हैं चर्चा में?

प्रदोष व्रत की तिथि को लेकर भ्रम की एक बड़ी वजह यह है कि त्रयोदशी तिथि 9 सितंबर की दोपहर तक बनी रहेगी। इसके अलावा अलग-अलग पंचांगों में दिन के दूसरे शुभ मुहूर्तों का उल्लेख भी मिलता है। इसलिए कई लोगों को लगता है कि व्रत 9 सितंबर को होना चाहिए।

बताया गया है कि 9 सितंबर को ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 31 मिनट से 5 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 54 मिनट से दोपहर 12 बजकर 44 मिनट तक बताया गया है।

इसके अलावा 9 सितंबर की रात निशिता काल रात 11 बजकर 56 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। हालांकि, इन मुहूर्तों का होना प्रदोष व्रत की तारीख को 9 सितंबर नहीं बनाता। प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा के लिए प्रदोष काल को ही प्राथमिकता दी जाती है।

इसलिए भक्तों को 8 सितंबर की शाम के प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन करना चाहिए।

भौम प्रदोष में किन बातों का रखा जाता है ध्यान?

प्रदोष व्रत को भगवान शिव को समर्पित व्रत माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार उपवास रखते हैं। कुछ लोग पूरे दिन निराहार रहते हैं, जबकि कुछ फलाहार करते हैं। व्रत की विधि परिवार और क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

शाम के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव की पूजा की जाती है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के साथ बेलपत्र अर्पित करना विशेष माना जाता है। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु शिव मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र या शिव स्तुति का पाठ भी करते हैं।

चूंकि इस बार प्रदोष मंगलवार को पड़ रहा है, इसलिए धार्मिक मान्यता के अनुसार शिव आराधना के साथ हनुमान जी की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल और लड्डू आदि अर्पित करने की परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है।

कर्ज और मंगल दोष से जुड़ी मान्यताएं

भौम प्रदोष को मंगल ग्रह से जोड़कर भी देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति को कर्ज से जुड़ी परेशानियों में राहत मिल सकती है। जमीन-जायदाद से जुड़े विवादों और रुकावटों को दूर करने के लिए भी इस दिन शिव आराधना को लाभकारी माना जाता है।

इसके अलावा भौम प्रदोष को शारीरिक ऊर्जा और साहस बढ़ाने वाला दिन भी माना जाता है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल ग्रह कमजोर माना जाता है, वे इस दिन भगवान शिव और हनुमान जी की पूजा करके मंगल ग्रह की शांति की कामना करते हैं।

हालांकि, ये सभी धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं। इनका उद्देश्य आस्था और आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा है।

भाद्रपद के पहले प्रदोष व्रत का सार

अगर इस बार प्रदोष व्रत की तारीख को लेकर आपके मन में भी 8 और 9 सितंबर को लेकर संशय है, तो पंचांग की गणना के अनुसार 8 सितंबर को ही भाद्रपद कृष्ण पक्ष का पहला प्रदोष व्रत रखा जाएगा। त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर को दोपहर 2:42 बजे से शुरू होकर 9 सितंबर को दोपहर 12:30 बजे तक रहेगी, लेकिन प्रदोष काल 8 सितंबर की शाम को होने के कारण व्रत इसी दिन किया जाएगा।

8 सितंबर को मंगलवार होने के कारण यह भौम प्रदोष कहलाएगा। भगवान शिव की पूजा का प्रमुख समय शाम 6:35 बजे से रात 8:52 बजे तक रहेगा। इस दौरान शिवलिंग का अभिषेक, बेलपत्र अर्पण, दीप-धूप और शिव मंत्रों का जाप किया जा सकता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार भौम प्रदोष का व्रत कर्ज, मंगल से संबंधित परेशानियों, जमीन-जायदाद के विवाद और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ हनुमान जी की पूजा करने की भी परंपरा है।

इसलिए यदि आप भाद्रपद के पहले प्रदोष व्रत की तैयारी कर रहे हैं, तो 8 सितंबर की शाम प्रदोष काल में शिव पूजन करना इस व्रत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

(Photo : AI Generated)