मंडियों में एमएसपी से नीचे धान-बाजरा बिकने का दावा, सुरजेवाला ने खरीद व्यवस्था पर उठाए सवाल

मंडियों में एमएसपी से नीचे धान-बाजरा बिकने का दावा, सुरजेवाला ने खरीद व्यवस्था पर उठाए सवाल

सुरजेवाला बोले- सरकारी घोषणाओं और मंडियों के भाव में बड़ा अंतर, धान की सरकारी खरीद 1 अक्टूबर के बजाय 15 सितंबर से शुरू करने कीकांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला ने हरियाणा में खरीफ फसलों की खरीद व्यवस्था को लेकर प्रदेश सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किए जाने के बावजूद मंडियों में किसानों को निर्धारित दर के अनुरूप भाव नहीं मिल रहा है। सुरजेवाला ने कहा कि सरकारी घोषणाओं और मंडियों में फसलों की वास्तविक बिक्री कीमत के बीच अंतर होने से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सुरजेवाला के अनुसार खरीफ सीजन 2026-27 के लिए सामान्य धान का एमएसपी 2441 रुपये प्रति क्विंटल और ए-ग्रेड धान का एमएसपी 2461 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इसी तरह बाजरे का एमएसपी 2900 रुपये प्रति क्विंटल तय है। उनका दावा है कि इसके बावजूद प्रदेश की कई प्रमुख मंडियों में किसानों को इन दरों से काफी कम कीमत पर अपनी फसल बेचनी पड़ रही है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि किसानों को घोषित एमएसपी का वास्तविक लाभ सुनिश्चित किया जाए और जहां बाजार भाव एमएसपी से नीचे है, वहां सरकारी खरीद तत्काल शुरू की जाए। साथ ही उन्होंने भावांतर जैसी व्यवस्था के माध्यम से एमएसपी और बाजार भाव के बीच के अंतर की भरपाई करने की मांग भी उठाई।

धान के भाव में गिरावट का दावा

सुरजेवाला ने इंद्री, तरावड़ी, नीलोखेड़ी और असंध समेत कई मंडियों में धान के कथित भाव का हवाला देते हुए कहा कि मोटा धान लगभग 2100 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बिक रहा है। उनके अनुसार यह दर सामान्य धान के घोषित एमएसपी से काफी कम है।

उन्होंने पूसा 1509 और पूसा 1692 किस्मों के भाव में भी गिरावट का दावा किया। सुरजेवाला के मुताबिक महीने की शुरुआत में इन किस्मों का भाव लगभग 4200 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था, लेकिन अब यह घटकर करीब 3500 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गया है।

कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि किसान को अपनी उपज एमएसपी से नीचे बेचनी पड़ती है तो इसका सीधा असर उसकी कुल आमदनी पर पड़ता है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा परिस्थितियों में किसानों को प्रति एकड़ करीब 12 हजार रुपये तक का नुकसान हो सकता है।

हालांकि, इन भावों और नुकसान के आंकड़ों को सुरजेवाला ने अपने दावे के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने सरकार से मंडियों में किसानों को मिलने वाले वास्तविक भाव की निगरानी करने और एमएसपी व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू कराने की मांग की।

15 सितंबर से सरकारी खरीद शुरू करने की मांग

धान की सरकारी खरीद की निर्धारित तारीख एक अक्टूबर है। सुरजेवाला ने कहा कि किसान संगठन इससे पहले यानी 15 सितंबर से ही सरकारी खरीद शुरू करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि मंडियों में निजी खरीद एमएसपी से नीचे होती है और सरकारी खरीद समय पर शुरू नहीं होती तो किसानों को मजबूरी में कम भाव पर फसल बेचनी पड़ सकती है।

उन्होंने सरकार से सरकारी खरीद की शुरुआत की तारीख पर पुनर्विचार करने की मांग की। कांग्रेस नेता के मुताबिक मंडियों में धान की आवक बढ़ने के साथ ही खरीद व्यवस्था को सक्रिय किया जाना चाहिए, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े।

सुरजेवाला ने कहा कि फसल की कटाई के बाद किसान के सामने उसे सुरक्षित रखने की चुनौती भी रहती है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया में देरी होने पर वह बाजार में उपलब्ध भाव पर फसल बेचने के लिए मजबूर हो सकता है। उनके अनुसार एमएसपी घोषित करने का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब किसान को उस दर के आसपास या निर्धारित सरकारी खरीद के माध्यम से अपनी फसल बेचने का अवसर मिले।

बाजरे में 900 रुपये के अंतर का दावा

कांग्रेस नेता ने बाजरे की खरीद को लेकर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि सरकार ने खरीफ सीजन के लिए बाजरे का एमएसपी 2900 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है, लेकिन उनके अनुसार मंडियों में किसानों को लगभग 2000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है।

सुरजेवाला के मुताबिक एमएसपी और मंडी भाव के बीच करीब 900 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है। उन्होंने कहा कि इस अंतर का भार किसान पर नहीं डाला जाना चाहिए। यदि बाजार में बाजरे का भाव घोषित एमएसपी से नीचे रहता है तो सरकार को खरीद व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए या भावांतर के माध्यम से किसानों को अंतर की भरपाई करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसानों की आय और फसल की लागत को देखते हुए केवल एमएसपी घोषित करना पर्याप्त नहीं है। किसानों को उस घोषित कीमत का वास्तविक लाभ दिलाने के लिए खरीद केंद्रों, एजेंसियों और उठान व्यवस्था को समय पर सक्रिय करना भी जरूरी है।

‘मेरी फसल, मेरा ब्योरा’ के आंकड़ों पर भी सवाल

सुरजेवाला ने धान की खरीद व्यवस्था में पंजीकरण और सत्यापन से जुड़े आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि ‘मेरी फसल, मेरा ब्योरा’ पोर्टल पर करीब 24 लाख एकड़ धान का पंजीकरण हुआ है, लेकिन इसमें से 4.63 लाख एकड़ का मिलान अभी लंबित है।

उनके अनुसार यदि किसानों की फसल से संबंधित रिकॉर्ड का सत्यापन समय पर पूरा नहीं होता तो खरीद के दौरान उन्हें प्रशासनिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से लंबित सत्यापन की प्रक्रिया को जल्द पूरा करने की मांग की, ताकि मंडियों में फसल लेकर पहुंचने वाले किसानों को खरीद प्रक्रिया में किसी तरह की परेशानी न हो।

कांग्रेस नेता ने कहा कि डिजिटल पंजीकरण और सत्यापन की व्यवस्था का उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में पंजीकरण लंबित रहते हैं तो किसानों की फसल की खरीद पर इसका असर पड़ सकता है।

राइस मिलर्स के पंजीकरण का मुद्दा

सुरजेवाला ने धान की खरीद के बाद उसके उठान और भंडारण से जुड़ी व्यवस्था पर भी चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में कुल 1458 राइस मिलर्स में से केवल 280 ने ही पंजीकरण कराया है।

उन्होंने सरकार से राइस मिलर्स के साथ चल रहे गतिरोध को जल्द समाप्त करने की मांग की। उनका कहना है कि धान की खरीद केवल मंडी में फसल खरीदने तक सीमित नहीं है। खरीद के बाद फसल का उठान, मिलिंग और भंडारण भी पूरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि इन चरणों में किसी स्तर पर अड़चन आती है तो मंडियों में फसल का दबाव बढ़ सकता है और किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

कांग्रेस नेता ने सरकार से मिलर्स के साथ बातचीत कर लंबित मुद्दों का समाधान करने और खरीद से लेकर उठान तक की पूरी व्यवस्था को सुचारू बनाने की मांग की।

किसानों पर लागत और बाजार भाव का दबाव

सुरजेवाला ने कहा कि किसान पहले ही खेती की लागत, मजदूरी, डीजल, खाद और अन्य कृषि इनपुट पर खर्च कर रहा है। ऐसे में जब तैयार फसल का बाजार भाव घोषित एमएसपी से कम रहता है तो उसकी आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि धान और बाजरे की खरीद के लिए मंडी स्तर पर प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए बिचौलियों या निजी खरीदारों पर निर्भर न रहना पड़े।

उनके अनुसार सरकारी खरीद एजेंसियों की पर्याप्त मौजूदगी और समय पर खरीद शुरू होने से किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर सुरक्षा मिल सकती है। इसके अलावा मंडियों में फसल की आवक, खरीद, उठान और भुगतान की प्रक्रिया की नियमित निगरानी भी जरूरी है।

खरीद व्यवस्था में तालमेल की जरूरत

सुरजेवाला ने कहा कि धान खरीद का पूरा तंत्र कई स्तरों पर निर्भर करता है। इसमें किसान का फसल पंजीकरण, सत्यापन, मंडी में आवक, सरकारी एजेंसियों की खरीद, राइस मिलर्स का पंजीकरण, फसल का उठान और आगे की प्रक्रिया शामिल है। किसी एक स्तर पर भी देरी होने से पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि किसानों, आढ़तियों, मिलर्स और सरकारी खरीद एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जाए। साथ ही मंडियों में किसानों के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं समय से पूरी की जाएं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि धान और बाजरे की खरीद के दौरान किसानों को किसी भी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सरकार से अपील की कि एमएसपी की घोषणा को केवल कागजी प्रावधान तक सीमित न रखा जाए, बल्कि मंडियों में किसानों को उसकी वास्तविक कीमत दिलाने के लिए ठोस व्यवस्था की जाए।

सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग

सुरजेवाला ने अंत में सरकार से कई स्तरों पर तत्काल कदम उठाने की मांग रखी। इनमें धान की सरकारी खरीद 15 सितंबर से शुरू करना, मंडियों में एमएसपी से नीचे होने वाले कारोबार पर निगरानी, बाजरे में एमएसपी और बाजार भाव के अंतर की भरपाई के लिए भावांतर व्यवस्था, ‘मेरी फसल, मेरा ब्योरा’ के लंबित सत्यापन को पूरा करना और राइस मिलर्स के पंजीकरण से जुड़े गतिरोध को दूर करना शामिल है।

उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना खरीद व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। सरकार की ओर से घोषित एमएसपी और मंडियों में मिलने वाले वास्तविक भाव के बीच यदि अंतर बना रहता है तो इसका असर सीधे किसान की आय पर पड़ता है।

सुरजेवाला के इन आरोपों के बीच खरीफ सीजन की खरीद व्यवस्था को लेकर अब मुख्य चुनौती यह रहेगी कि मंडियों में फसल की आवक बढ़ने के साथ सरकारी खरीद, सत्यापन, मिलिंग और उठान की प्रक्रिया कितनी सुचारू रहती है। कांग्रेस नेता ने सरकार से मांग की है कि किसानों की संभावित परेशानी को देखते हुए खरीद तंत्र की सभी कड़ियों को समय रहते सक्रिय किया जाए, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने में कठिनाई न हो और घोषित एमएसपी का लाभ उन्हें वास्तविक रूप से मिल सके।