मई में महंगाई ने पकड़ी रफ्तार, RBI की बढ़ी चिंता; खाने-पीने का सामान और ट्रांसपोर्ट हुआ महंगा

मई में महंगाई ने पकड़ी रफ्तार, RBI की बढ़ी चिंता; खाने-पीने का सामान और ट्रांसपोर्ट हुआ महंगा

देश में खुदरा महंगाई दर एक बार फिर तेजी से बढ़ी है और मई 2026 के आंकड़ों ने नीति निर्माताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। साल की शुरुआत में जहां महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रित नजर आ रही थी, वहीं अब लगातार बढ़ते दामों ने आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। मई में खुदरा महंगाई दर 3.93% दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48% के मुकाबले काफी अधिक है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

जनवरी 2026 में खुदरा महंगाई केवल 2.74% थी, लेकिन उसके बाद से इसमें लगातार वृद्धि देखने को मिली है। चार महीनों के भीतर महंगाई लगभग 1.2 प्रतिशत अंक बढ़ चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी, परिवहन लागत में इजाफा और कुछ अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के महंगे होने से यह स्थिति पैदा हुई है।

मई के दौरान सबसे बड़ा असर खाद्य महंगाई में दिखाई दिया। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने कुल महंगाई दर को ऊपर धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उपभोक्ता खाद्य महंगाई अप्रैल के 4.20% से बढ़कर मई में 4.78% तक पहुंच गई। यह दर्शाता है कि रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं आम नागरिकों के लिए पहले की तुलना में अधिक महंगी हो रही हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई का असर शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक दिखाई दिया। गांवों में रहने वाले लोगों को खाद्य वस्तुओं के दामों में ज्यादा बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा। मई में ग्रामीण खाद्य महंगाई 4.85% दर्ज की गई, जबकि शहरों में यह 4.66% रही। कृषि उत्पादन, परिवहन लागत और स्थानीय आपूर्ति की चुनौतियों को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में सब्जियों, फलों, दालों और अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर परिवारों के मासिक बजट पर पड़ रहा है। विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण बनती जा रही है क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।

इस बार महंगाई के आंकड़ों में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है। गैर-जरूरी खर्चों से जुड़ी कुछ श्रेणियों में भी कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। विशेष रूप से ज्वेलरी और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि देखी गई। इस श्रेणी में महंगाई दर 56% से अधिक दर्ज की गई, जो सभी श्रेणियों में सबसे ज्यादा रही।

विशेषज्ञों के अनुसार सोने और अन्य बहुमूल्य धातुओं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है। सोने के दाम बढ़ने से आभूषणों की कीमतें भी काफी ऊपर चली गई हैं। विवाह सीजन और निवेश के रूप में सोने की बढ़ती मांग ने भी कीमतों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा है।

परिवहन क्षेत्र में भी लागत बढ़ने के संकेत मिले हैं। ईंधन की कीमतों और लॉजिस्टिक्स खर्चों में वृद्धि का असर विभिन्न उत्पादों की अंतिम कीमतों पर दिखाई दे रहा है। जब परिवहन महंगा होता है तो उत्पादों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने की लागत बढ़ जाती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

महंगाई के बढ़ते आंकड़ों ने भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति को लेकर चर्चाएं तेज कर दी हैं। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य खुदरा महंगाई को 4% के आसपास बनाए रखना है। हालांकि मई का आंकड़ा अभी भी निर्धारित दायरे के भीतर है, लेकिन यह लक्ष्य स्तर के बेहद करीब पहुंच चुका है। ऐसे में भविष्य की मौद्रिक नीति बैठकों में महंगाई एक प्रमुख मुद्दा बन सकती है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में कीमतों का दबाव कम नहीं हुआ तो रिजर्व बैंक को ब्याज दरों के संबंध में सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञों ने संभावना जताई है कि लगातार बढ़ती महंगाई की स्थिति में रेपो रेट में वृद्धि पर विचार किया जा सकता है। इससे ऋण लेना महंगा हो जाएगा, लेकिन महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

आने वाले महीनों में मौसम भी महंगाई की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है या वर्षा का वितरण संतुलित नहीं होता, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में खाद्यान्न और सब्जियों की कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

मौसम वैज्ञानिकों द्वारा अल नीनो जैसी परिस्थितियों की आशंका भी जताई जा रही है। यदि इसका प्रभाव बढ़ता है, तो खेती पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। कृषि उत्पादन में कमी का सीधा असर खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है, जिससे महंगाई और तेज हो सकती है।

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में हो रहे उतार-चढ़ाव भी भारत के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है और उसका प्रभाव घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है, तो परिवहन और उत्पादन लागत दोनों बढ़ सकती हैं। इससे खुदरा महंगाई दर में और उछाल आने की आशंका बनी रहती है।

कुछ बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि मौसम और ऊर्जा दोनों मोर्चों पर प्रतिकूल परिस्थितियां बनी रहीं, तो महंगाई दर आने वाले महीनों में 5% के स्तर को भी पार कर सकती है। हालांकि यह पूरी तरह से आर्थिक परिस्थितियों, सरकारी कदमों और वैश्विक बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

महंगाई को समझने के लिए कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी CPI की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यही सूचकांक यह बताता है कि आम उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में समय के साथ कितना बदलाव आया है। इसमें भोजन, कपड़े, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य दैनिक जरूरतों की वस्तुएं शामिल होती हैं।

सरकार और रिजर्व बैंक महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए CPI आधारित आंकड़ों का उपयोग करते हैं। इसी आधार पर ब्याज दरों और अन्य आर्थिक नीतियों से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं। वर्तमान में RBI को महंगाई को 4% के आसपास बनाए रखने का लक्ष्य दिया गया है, जबकि 2% से 6% के बीच का दायरा स्वीकार्य माना जाता है।

सामान्य भाषा में समझें तो 3.93% महंगाई का अर्थ यह है कि जिन वस्तुओं और सेवाओं पर एक वर्ष पहले औसतन 100 रुपये खर्च होते थे, उन पर अब लगभग 103.93 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यह एक औसत आंकड़ा है, इसलिए जरूरी नहीं कि हर वस्तु की कीमत इसी अनुपात में बढ़ी हो। कुछ वस्तुएं इससे कहीं ज्यादा महंगी हुई होंगी, जबकि कुछ की कीमतें स्थिर या कम भी हो सकती हैं।

फिलहाल मई के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि देश में मूल्य दबाव दोबारा बढ़ने लगा है। यदि खाद्य वस्तुओं, ईंधन और परिवहन लागत में तेजी जारी रहती है तो आने वाले महीनों में महंगाई अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में सरकार, रिजर्व बैंक और बाजार सभी की नजरें आगामी आर्थिक आंकड़ों और मानसून की स्थिति पर टिकी रहेंगी।