चंडीगढ़: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चंडीगढ़ दौरे के दौरान एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने पंजाब और चंडीगढ़ की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री और चंडीगढ़ से कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के बीच दिखी आत्मीयता अब राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। मंच पर प्रधानमंत्री द्वारा तिवारी को विशेष तवज्जो देना, संबोधन में उनका उल्लेख करना और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद अलग से कुछ देर बातचीत करना कई तरह के सियासी संकेतों के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों की ओर से इस मुलाकात को लेकर कोई आधिकारिक राजनीतिक टिप्पणी नहीं की गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को चंडीगढ़ पहुंचे थे, जहां उन्होंने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर में कई विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। कार्यक्रम में मंच पर केवल चुनिंदा अतिथियों के लिए ही स्थान रखा गया था। इन नेताओं में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी की मौजूदगी भी खास रही। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में मनीष तिवारी का जिक्र करते हुए उन्हें “लोकसभा में हमारे साथी मनीष तिवारी” कहा। विपक्षी सांसद के लिए प्रधानमंत्री का यह संबोधन लोगों का ध्यान खींचने वाला रहा। वहीं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी अपने भाषण में तिवारी का उल्लेख करते हुए उन्हें सांसद के रूप में संबोधित किया।
कार्यक्रम का सबसे चर्चित पल तब आया जब समारोह समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मनीष तिवारी के पास पहुंचे। दोनों नेताओं ने हाथ मिलाया और कुछ समय तक आपस में बातचीत भी की। इस दौरान दोनों के आसपास कोई अन्य नेता मौजूद नहीं था। इस तस्वीर के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कई लोगों ने इसे लोकतांत्रिक शिष्टाचार बताया, जबकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में इस तरह की मुलाकात स्वाभाविक रूप से अटकलों को जन्म देती है।
दिलचस्प बात यह भी है कि हाल के महीनों में मनीष तिवारी केंद्र सरकार से जुड़े कुछ प्रमुख कार्यक्रमों में नजर नहीं आए थे। चाहे तीन नए कानूनों के लागू होने से जुड़ा कार्यक्रम हो या फिर 24 घंटे पेयजल आपूर्ति परियोजना का उद्घाटन, उन आयोजनों में उनकी अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी थी। ऐसे में इस बार प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मंच पर मिली अहमियत ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पंजाब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर असंतोष की चर्चाएं लगातार चल रही हैं। हाल ही में संगठन में हुए बदलावों के दौरान मनीष तिवारी को अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं मिलने की बातें भी सामने आई थीं। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को लेकर चली चर्चाओं और पार्टी संगठन में हुए फैसलों के बाद तिवारी की नाराजगी की खबरें भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी थीं।
कुछ दिन पहले मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक भावनात्मक पोस्ट साझा की थी, जिसने राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलों को जन्म दिया। उन्होंने लिखा था कि “काबिल होना ही अपने आप में एक बड़ी कमी है। काश मेरे पास लोगों और संस्थाओं की असुरक्षा की भावना को दूर करने का कोई तरीका होता। कांग्रेस ने पिछले 45 वर्षों में मुझे बहुत कुछ दिया है और मैंने भी अपनी पूरी जवानी पार्टी की सेवा में समर्पित कर दी। किस्मत को कौन टाल सकता है। जो होना है, वह होकर रहेगा।” इस पोस्ट को कई लोगों ने कांग्रेस नेतृत्व से उनकी नाराजगी के संकेत के रूप में देखा था, हालांकि तिवारी ने बाद में इस पर कोई विस्तृत राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं दी।
मनीष तिवारी लंबे समय से कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह केंद्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस के भीतर उनकी भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लुधियाना से चुनाव नहीं लड़ा था, जिसके बाद कांग्रेस ने वहां से रवनीत सिंह बिट्टू को उम्मीदवार बनाया। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उसी दौर से पार्टी नेतृत्व और तिवारी के बीच दूरी की चर्चाएं शुरू हुई थीं।
इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें श्री आनंदपुर साहिब से टिकट मिला और उन्होंने जीत दर्ज की। 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें चंडीगढ़ संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाया, जहां उन्होंने जीत हासिल की। सीट बदलने के फैसले को भी उस समय कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा गया था।
राजनीतिक गलियारों में समय-समय पर यह चर्चा भी होती रही है कि मनीष तिवारी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच व्यक्तिगत स्तर पर संवाद हमेशा सहज रहा है। हालांकि उन्होंने कभी भाजपा में शामिल होने जैसी किसी संभावना को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के साथ मंच पर दिखी सहजता और कार्यक्रम के बाद हुई अलग बातचीत ने इन चर्चाओं को एक बार फिर हवा दे दी है।
कार्यक्रम में जिन विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया, उनके शिलापट्टों पर भी चंडीगढ़ के सांसद के रूप में मनीष तिवारी का नाम अंकित था। यह संसदीय परंपरा का हिस्सा है, लेकिन मंच पर मिली प्रमुखता और प्रधानमंत्री के व्यवहार के साथ जोड़कर इसे भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।
फिलहाल इस मुलाकात को लेकर किसी भी राजनीतिक दल की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। न भाजपा ने इसे किसी नए राजनीतिक समीकरण का संकेत बताया है और न ही कांग्रेस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया दी है। फिर भी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी विपक्षी सांसद को सार्वजनिक मंच पर प्रधानमंत्री से इस तरह की तवज्जो मिलती है और वह ऐसे समय हो जब उसकी अपनी पार्टी में असंतोष की चर्चाएं चल रही हों, तो राजनीतिक कयास लगना स्वाभाविक है। आने वाले दिनों में पंजाब कांग्रेस के भीतर होने वाले घटनाक्रम और मनीष तिवारी की राजनीतिक सक्रियता पर सभी की नजर रहेगी, क्योंकि चंडीगढ़ के इस मंच से निकली तस्वीरों ने सियासी बहस को नई दिशा जरूर दे दी है।




