राजस्व घाटा अनुदान बंद होने के बाद केंद्र का बड़ा सहारा, ‘प्राइड ऑफ हिल्स’ पैकेज से हिमाचल को ₹2,395 करोड़ की राहत

राजस्व घाटा अनुदान बंद होने के बाद केंद्र का बड़ा सहारा, ‘प्राइड ऑफ हिल्स’ पैकेज से हिमाचल को ₹2,395 करोड़ की राहत

शिमला। लंबे समय से वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहे हिमाचल प्रदेश को केंद्र सरकार से बड़ी राहत मिली है। राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grant-RDG) बंद होने के बाद राज्य की आर्थिक स्थिति पर बढ़े दबाव के बीच केंद्र सरकार की ‘प्राइड ऑफ हिल्स’ विशेष वित्तीय सहायता योजना के तहत पहली किश्त के रूप में ₹2,395 करोड़ की अनटाइड ग्रांट जारी कर दी गई है। यह राशि राज्य सरकार के लिए ऐसे समय में आई है, जब विकास परियोजनाओं, कर्मचारियों के वेतन, सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढांचे पर बढ़ते खर्च के कारण वित्तीय प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए हिमाचल प्रदेश को ₹3,920 करोड़ की विशेष वित्तीय सहायता स्वीकृत की है। इस पैकेज की पहली किश्त के रूप में कुल स्वीकृत राशि का 60 प्रतिशत यानी ₹2,395 करोड़ राज्य को उपलब्ध कराया गया है। यह राशि अनटाइड ग्रांट के रूप में दी गई है, जिसका अर्थ है कि सरकार इसका उपयोग अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार विभिन्न विकास कार्यों, सार्वजनिक सेवाओं और वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में कर सकती है। इससे राज्य सरकार को योजनागत और गैर-योजनागत खर्चों के प्रबंधन में भी राहत मिलने की उम्मीद है।

राज्य सरकार के वित्तीय जानकारों का मानना है कि यह सहायता ऐसे समय में मिली है जब हिमाचल प्रदेश को अपने सीमित संसाधनों के बावजूद विकास की रफ्तार बनाए रखने, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का संचालन जारी रखने और बुनियादी सुविधाओं पर निवेश बढ़ाने की जरूरत है। ऐसे में यह पैकेज राज्य के लिए आर्थिक संबल साबित हो सकता है।

दरअसल, हिमाचल प्रदेश की वित्तीय व्यवस्था कई वर्षों तक राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) पर काफी हद तक निर्भर रही। यह अनुदान उन राज्यों को दिया जाता था जिनकी आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर होता है। 15वें वित्त आयोग की अवधि के दौरान हिमाचल प्रदेश को शुरुआत में लगभग ₹11,000 करोड़ तक का राजस्व घाटा अनुदान मिला था। हालांकि बाद के वर्षों में यह राशि चरणबद्ध तरीके से कम होती गई और अंतिम वर्ष में राज्य को लगभग ₹3,300 करोड़ ही प्राप्त हुए।

16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद केंद्र सरकार ने राजस्व घाटा अनुदान की व्यवस्था समाप्त कर दी। इस फैसले का हिमाचल प्रदेश सरकार ने लगातार विरोध किया। राज्य सरकार का तर्क था कि पर्वतीय राज्य होने के कारण यहां विकास कार्यों की लागत मैदानी राज्यों की तुलना में कहीं अधिक होती है, जबकि राजस्व जुटाने के संसाधन सीमित हैं। ऐसे में आरडीजी को समाप्त करना राज्य की वित्तीय स्थिति को और कमजोर कर सकता है।

राज्य सरकार ने इस मुद्दे को कई मंचों पर उठाया। केंद्र सरकार से अनुदान जारी रखने की मांग की गई। हिमाचल विधानसभा में इस संबंध में विशेष प्रस्ताव भी पारित किया गया और उसे केंद्र सरकार को भेजा गया। सरकार का कहना था कि पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों, कम औद्योगिक आधार और सीमित कर संग्रह क्षमता को देखते हुए हिमाचल को विशेष वित्तीय सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार द्वारा ‘प्राइड ऑफ हिल्स’ योजना के तहत विशेष वित्तीय सहायता दिए जाने को राज्य के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पैकेज राजस्व घाटा अनुदान का प्रत्यक्ष विकल्प तो नहीं है, लेकिन इससे राज्य सरकार को आर्थिक दबाव कम करने में निश्चित रूप से मदद मिलेगी।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए स्वीकृत ₹3,920 करोड़ की सहायता दो चरणों में जारी की जाएगी। पहली किश्त के रूप में 60 प्रतिशत राशि पहले ही जारी की जा चुकी है, जबकि शेष 40 प्रतिशत राशि नवंबर 2026 में दूसरी और अंतिम किश्त के रूप में जारी किए जाने की संभावना है। दूसरी किश्त भी अनुदान के रूप में मिलने से राज्य सरकार को वर्ष के दूसरे हिस्से में विकास परियोजनाओं और वित्तीय दायित्वों के निर्वहन में अतिरिक्त सहायता मिलेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि अनटाइड ग्रांट होने के कारण राज्य सरकार के पास इस राशि के उपयोग में अधिक लचीलापन रहेगा। सरकार इसे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, ग्रामीण विकास, आपदा प्रबंधन, सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार तथा अन्य प्राथमिक परियोजनाओं पर खर्च कर सकती है। साथ ही वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण रुकी या धीमी पड़ी योजनाओं को भी गति मिलने की संभावना है।

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति पिछले कुछ वर्षों में लगातार दबाव में रही है। प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान, सीमित औद्योगिक विकास, बढ़ते राजकोषीय दायित्व और कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों पर होने वाले भारी व्यय ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है। इसके अलावा सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार के लिए भी लगातार बड़े निवेश की आवश्यकता बनी रहती है।

राज्य पर सार्वजनिक ऋण का बोझ भी लगातार बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश पर कुल कर्ज का आंकड़ा अब ₹1.10 लाख करोड़ के करीब पहुंच चुका है। बढ़ते कर्ज के साथ ब्याज भुगतान और मूलधन की अदायगी का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अतिरिक्त वित्तीय सहायता राज्य सरकार के लिए राहत लेकर आई है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अनुदान मिलने से दीर्घकालिक वित्तीय चुनौतियों का समाधान नहीं होगा। राज्य को अपनी आय बढ़ाने, कर संग्रह प्रणाली को मजबूत करने, पर्यटन, जलविद्युत, कृषि आधारित उद्योगों और सेवा क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के साथ-साथ खर्चों के बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा। यदि वित्तीय अनुशासन और संसाधनों के प्रभावी उपयोग के साथ इस विशेष सहायता का उपयोग किया जाता है तो इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सकती है।

वहीं सरकार का मानना है कि केंद्र से मिली यह सहायता विकास की गति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे चल रही परियोजनाओं के लिए धन की उपलब्धता सुनिश्चित होगी, सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च जारी रखा जा सकेगा और राज्य की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।

राजनीतिक दृष्टि से भी इस पैकेज को अहम माना जा रहा है, क्योंकि राजस्व घाटा अनुदान बंद होने के बाद राज्य और केंद्र के बीच वित्तीय सहयोग को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में ‘प्राइड ऑफ हिल्स’ योजना के तहत मिली विशेष सहायता को हिमाचल प्रदेश की वित्तीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अब सभी की निगाहें नवंबर में जारी होने वाली दूसरी किश्त पर टिकी हैं। यदि निर्धारित समय पर शेष 40 प्रतिशत राशि भी जारी हो जाती है, तो राज्य सरकार को वित्त वर्ष के शेष महीनों में विकास योजनाओं को गति देने, लंबित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और बढ़ते वित्तीय दबाव से निपटने में और अधिक मजबूती मिल सकेगी। फिलहाल पहली किश्त के रूप में प्राप्त ₹2,395 करोड़ ने ऐसे समय में हिमाचल प्रदेश को बड़ी आर्थिक राहत दी है, जब राज्य अपनी वित्तीय चुनौतियों और बढ़ते कर्ज के बीच विकास की रफ्तार बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।